लोहे की गर्म सलाखें : अकबर बीरबल की कहानी | Red Hot Test Akabr Birbal Story In Hindi

मित्रों, इस “Akbar Birbal Moral Stories”  में एक अमीर आदमी अपने पड़ोसी को सजा दिलाने के मकसद से उस पर चोरी का इल्ज़ाम लगता है और अकबर से न्याय की गुहार लगाता है. पड़ोसी बीरबल की मदद से कैसे इस मुसीबत से बाहर निकलता है. यदि इस कहानी में बताया गया है. पढ़िये पूरी कहानी (Hindi Akbar Birbal Story) :

Akbar Birbal Moral Stories Hindi

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akbar birbal moral stories in hindi | Source : Akbar Birbal PNG

एक बार एक अमीर आदमी अपने पड़ोसी की शिकायत लेकर बादशाह अकबर (Akbar) के दरबार पहुँचा. वह न्याय की गुहार लगाते हुए अकबर से बोला, “जहाँपनाह! ये मेरा पड़ोसी महमूद है. इसने मेरे घर से कीमती सोने का हार चुराया है. न्याय कीजिये जहाँपनाह. मुझे मेरा हार वापस दिलाइये और इसे कड़ी से कड़ी सजा दीजिये.”

अमीर आदमी अपने पड़ोसी महमूद को जानबूझकर चोरी के इल्ज़ाम में फंसाकर सज़ा दिलवाना चाहता था.

अकबर ने अमीर आदमी की बात सुनकर महमूद से पूछा, “क्यों महमूद, ये सच है क्या?”

“नहीं बादशाह सलामत! मैं बेकुसूर हूँ. मैंने कोई चोरी नहीं की है. ये आदमी मुझे फंसाना चाहता है.” महमूद गिड़गिड़ाते हुए बोला.

“नहीं, जहाँपनाह! मैंने इसे अपनी आँखों से हार चुराते हुए देखा है. यही चोर है.” अमीर आदमी चिल्लाते हुए बोला, “यदि ये चोर नहीं है, तो साबित करके दिखाये. आप इसे लोहे की गर्म सलाखें अपने हाथों में पकड़ने के लिए कहें. ये सच कह रहा है, तो अल्लाह इसके हाथ जलने से बचा लेगें और मैं मान लूंगा कि ये चोर नहीं है. लेकिन यदि इसके हाथ जल गए, तो साफ़ हो जायेगा कि ये झूठ बोल रहा है और हार इसी ने चुराया है.”

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अकबर ने महमूद की ओर देखा. अमीर आदमी की ये बात सुनकर वह डर गया था और बोला, “बादशाह सलामत! मुझे आज का वक़्त दें. मैं एक बार अपने घर पर देख लेता हूँ. यदि वह हार मिल गया, तो इसे दे दूंगा. नहीं तो, लोहे की गर्म सलाखें पकड़कर अपनी बेगुनाही साबित करूंगा.”

अकबर ने उसे एक दिन का समय दे दिया. वह घर पहुँचा, तो बहुत परेशान था. वह समझ नहीं पा रहा था कि कैसे स्वयं को इस मुसीबत से बचाये. अंत में उसने बीरबल के पास जाने का मन बनाया.

बीरबल (Birbal) के घर पहुँचकर उसने उसे सारी बात बताई और इस मुसीबत से निकलने के लिए कोई रास्ता सुझाने की गुजारिश की. बीरबल ने उससे कुछ कहा और वह अपने घर चला आया.

अगले दिन वह अकबर के दरबार में हाज़िर हुआ. अमीर आदमी भी वहाँ मौजूद था. अकबर ने उससे पूछा, “क्यों? क्या तुम अपने घर पर हार ढूंढ पाए.”

“नहीं हुज़ूर! मेरे घर वह हार नहीं है.” महमूद इत्मिनान से बोला.

“तो क्या तुम लोहे की गर्म सलाखें पकड़ने के लिये तैयार हो?” अकबर ने फिर पूछा.

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“जी हुज़ूर! मैं तैयार हूँ. लेकिन मैं चाहता हूँ कि जिस तरह मैं लोहे की गर्म सलाखें पकड़कर अपनी सच्चाई साबित करूंगा, उसी तरह ये अमीर आदमी भी इन गर्म सलाखों को पकड़कर साबित करे कि ये सच्चा है. ये सच्चा होगा, तो अल्लाह इसके हाथ भी नहीं जलने देंगे. आप पहले इसे ये गर्म सलाखें पकड़ने के लिए कहें.”

ये सुनना था कि अमीर आदमी के पसीने छूटने लगे. वह बोला, “जहाँपनाह, ऐसा लगता है कि वह हार मैंने घर पर ही कहीं रख दिया है. मैं घर जाकर एक बार फिर से देखता हूँ.”

अकबर समझ गए कि दाल में कुछ काला है. उन्होंने सैनिकों को भेजकर अमीर आदमी के घर वह हार ढूंढवाया. वह हार उसके घर पर ही मिला. अमीर आदमी का कपट देख अकबर ने सजा के तौर पर उसे वह हार महमूद को देने का आदेश दिया. अमीर आदमी पछताकर रह गया.

सीख (Moral of the story)

बुरे काम का बुरा नतीज़ा.


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