बिलाल की ज़िद : कश्मीरी लोक कथा | Bilal Ki Zid Folk Tale Of Kashmir In Hindi

फ्रेंड्स, इस पोस्ट में हम कश्मीरी कहानी “बिलाल की ज़िद” (Bilal Ki Zid Kashmiri Lok Katha) शेयर कर रहे है. यह कहानी बिलाल नामक एक लड़के की है, जो अपना नाम बदलना चाहता है. उसकी माँ उसे ही अपना नाम चुनने को कह देती है. वह की नाम चुनता है? जानने के लिए पढ़िये कश्मीर की ये मज़ेदार लोक कथा  : 

Bilal Ki Zid Kashmiri Lok Katha

Bilal Ki Zid Kashmiri Lok Katha
Bilal Ki Zid Kashmiri Lok Katha

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एक गाँव में एक लड़का रहता थ. माता-पिता ने बड़े प्यार से उसका नाम ‘बिलाल’ रखा  था. मगर उसे यह नाम पसंद नहीं था. इसका कारण उसके दोस्त थे, जिन्होंने उसके कान में यह बात डाल दी थी कि यह नाम सुंदर नहीं है.

तबसे बिलाल अपने माता-पिता से यह ज़िद करने लगा था कि उसका नाम बदल दिया जाये. माता-पिता ने समझा कर देख लिया, लेकिन बिलाल नहीं माना. यहाँ तक कि एक दिन वह भूख हड़ताल पर बैठ गया कि जब तक उसका नाम नहीं बदला जायेगा, वो खाना नहीं खायेगा.

माता-पिता विवश हो गये. उन्होंने उससे कहा, “ठीक है, हम तुम्हारा नाम बदल देंगे. तुम बता दो, कौन सा नाम रखना चाहते हो, ताकि तुम्हारी ही पसंद का नाम हो और बाद में तुम हम पर कोई इल्ज़ाम न दो.”

बिलाल ख़ुश हो गया. मगर तुरंत उसे कोई नाम न सूझा. वह बोला, “शाम तक सोच कर बताता हूँ.”

कहकर वह घूमने निकल गया. इधर-उधर घूमते हुए भी वह अपने लिए नया नाम सोच रहा था. रास्ते में उसने देखा कि एक शवयात्रा जा रही है. उसने एक आदमी को रोककर पूछा, “कौन मर गया?”

जवाब मिला, “अमरनाथ!”

बिलाल हैरान रह गया, “हें…नाम अमरनाथ, फिर भी मर गया.”

फिर वह आगे बढ़ा, तो एक बाज़ार पड़ा, जहाँ एक बुढ़िया सब्जी बेच रही थी. वह उसके पास गया और पूछा, “अम्मा! नाम क्या है तुम्हारा?”

बुढ़िया ने जवाब दिया, “रानी!”

‘नाम रानी और बेच रही है सब्जी.’ बिलाल ने सोचा और आगे बढ़ गया. कुछ दूर जाने पर एक पहलवान का अखाड़ा आया, जहाँ दंगल चल रहा था. कई हट्ठे-कट्ठे पहलवान वहाँ मौजूद थे. बिलाल ने एक पहलवान का नाम पूछा, तो उसे बताया गया, “वो यहाँ का सबसे तगड़ा पहलवान है, चींटी सिंह!”

ये सुनकर बिलाल को हँसी आ गई – ‘इतना लंबा-चौड़ा, तगड़ा पहलवान और नाम चींटी सिंह!’

फिर वह सोचने लगा –

“अमरनाथ तो स्वर्ग सिधार गया

सब्जी बेचे रानी

आया नया जमान

चींटी सिंह करे पहलवानी”

शाम हो चुकी थी. दिन भर इधर-उधर फिरकर वह थक चुका था. आखिर वह घर को लौट आया. घर पहुँचने पर माँ ने पूछा, “बेटा! बता क्या नाम रखूं तेरा? अब तो तूने सोच ही लिया होगा.”

बिलाल माँ से बोला, “माँ! तूने बड़े प्यार से नाम रखा ही मेरा. वही ठीक है. वैसे भी नाम में क्या रखा है. इंसान अपने कर्म से नाम रोशन करता है. मैं बिलाल ही भला.”

बिलाल की बात सुनकर माँ ख़ुश हो गई और उस गले से लगा लिया.

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