स्व. लाल बहादुर शास्त्री के 2 प्रेरक प्रसंग | Lal Bahadur Shastri Ke Prerak Prasang

फ्रेंड्स, इस पोस्ट में हम भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्व. लाल बहादुर शास्त्री के प्रेरक प्रसंग (Lal Bahadur Shastri Ke Prerak Prasang) शेयर कर रहे हैं। यहाँ पढ़ें लाल बहादुर शास्त्री के जीवन की घटनायें, लाल बाहदुर शास्त्री से जुड़े किस्से, लाल बाहदुर शास्त्री की कहानियाँ.

Lal Bahadur Shastri Ke Prerak Prasang
Lal Bahadur Shastri Ke Prerak Prasang

Lal Bahadur Shastri Ke Prerak Prasang 

कर्त्तव्य-पालन स्व. लाल बहादुर शास्त्री का प्रेरक प्रसंग

बात उन दिनों की है, जब लाल बहादुर शास्त्री रेल मंत्री थे. रेल मंत्री होकर भी उनका रहन-सहन बिल्कुल साधारण था. वे स्वयं नियमों का सख्ती से पालन करते थे और दूसरों से भी भी यही अपेक्षा रखते थे.

एक बार उन्हें बनारस से ट्रेन पकड़नी थी. लेकिन, लाख कोशिशों के बाद भी वे समय पर स्टेशन पर नहीं पहुँच सके. ट्रेन के जाने का सिग्नल हो चुका था. लेकिन जैसे ही गार्ड को पता चला कि मंत्री महोदय स्टेशन पहुँचने ही वाले है, उसने हरी झंडी नीची कर दी और शास्त्री जी का इंतजार करने लगा.

उधर सभी यात्री परेशान थे कि सिग्नल होने के बावजूद भी ट्रेन चल क्यों नहीं रही है? थोड़ी देर में शास्त्री जी स्टेशन पहुँच गए और अपने कोच की ओर बढ़ने लगे. उन्हें देख वह गार्ड भागा-भागा उनके पास पहुँचा और बोला, “सर, जैसे ही मैंने सुना कि आप आ रहे है, मैंने ट्रेन चलने नहीं दी.”

यह सुनकर शास्त्री जी ने गार्ड की दृष्टि घुमाई और फिर बिना कुछ कहे ट्रेन पर चढ़ गए. गार्ड बहुत खुश था. उसे लग रहा था कि मंत्री जी उसके कार्य से खुश हो गए है और अब उसकी तरक्की निश्चित है. लेकिन अगले ही दिन उसे ड्यूटी ठीक से न करने के आरोप में पदमुक्त कर दिया गया.

शास्त्री जी नियमों की अवहेलना उचित नहीं मानते थे. उनका मानना था कि ऊँचे से ऊँचे पद पर बैठे व्यक्ति को भी नियमों का कड़ाई से पालन करना चाहिए. उन्हें ये नागवार गुजरा कि उनके कारण उस ट्रेन में सवार सैकड़ों यात्रियों को असुविधा हुई. इसलिए उन्होंने इसके जिम्मेदार गार्ड को पदमुक्त करने का आदेश दे दिया.

सीख  

दोस्तों, इस प्रेरक प्रसंग से ये शिक्षा मिलती है कि अपने कर्तव्यों के प्रति हमें सदैव ईमानदार रहना चाहिए.

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सादगी की मूरत स्व. लाल बहादुर शास्त्री का प्रेरक प्रसंग

एक बार भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री एक अधिवेशन में सम्मिलित होने भुवनेश्वर गए. अधिवेशन में जाने से पहले वे जब स्नान कर रहे थे, तब दयाल महोदय उनके सूटकेस से उनका खादी का कुर्ता निकालने लगे. उनकी ये भावना थी कि शास्त्री जी का कपड़े ढूंढने में अधिक समय व्यर्थ न हो.

उन्होंने एक कुर्ता निकाला. देखा कि वह फटा हुआ था. उन्होंने वह कुर्ता ज्यों का त्यों तह करके वापस सूटकेस में रख दिया और उसमें से दूसरा कुर्ता निकाला. परन्तु ये देखकर वे चकित रह गए कि वह कुर्ता पहले वाले कुर्ते से भी अधिक फटा हुआ था और कई जगहों से सिला भी हुआ था.

उन्होंने शास्त्री जी के सारे कुर्ते देखे. कोई भी कुर्ता साबुत नहीं था. ये देख दयाल जी के अचम्भे की कोई सीमा नहीं रही. साथ ही वे परेशान भी हो गए कि अब शास्त्री जी क्या पहन कर अधिवेशन में जायेंगे.

जब शास्त्री जी स्नान कर बाहर आये, तो उन्हें दयाल जी की परेशानी का सबब पता चला. उन्होंने बड़ी ही सादगी से उन्हें समझाया, “इसमें चिंता की कोई बात ही नहीं है. अभी जाड़े का मौसम है. जाड़े में फटे और उधड़े कपड़े कोट के नीचे पहने जा सकते है.”

अधिवेशन के उपरांत शास्त्री जी कपड़े की एक मिल के भ्रमण पर गए. मिल मालिक ने उन्हें कई खूबसूरत साड़ियाँ दिखाई. शास्त्री जी ने साड़ियों को देखते हुए पूछा, “साड़ियाँ तो अच्छी है. पर इनकी कीमत क्या है?”

मिल मालिक ने उत्तर दिया, ”जी! एक महज आठ सौ रुपये की है और एक हजार की.”

इस पर शास्त्री जी बोले, “भाई! फिर तो ये बहुत महँगी है. मुझ जैसे गरीब के लायक कुछ साड़ियाँ दिखाइये.”

“आप कैसी बातें कर रहे है? आप गरीब कहाँ? आप तो देश के प्रधानमंत्री है. वैसे भी ये साड़ियाँ तो हम आपको भेंट करने वाले है.” मिल मालिक बोला.

“नहीं भाई! मैं देश का प्रधानमंत्री अवश्य हूँ. किन्तु गरीब हूँ. मेरा स्वाभिमान मुझे भेंट स्वीकार करने की अनुमति नहीं देता. आप मुझे मेरी हैसियत के मुताबित ही साड़ियाँ दिखाइये.” यह कहकर शास्त्री जी ने अपने हिसाब से सस्ती साड़ियाँ ही अपने परिवार के लिए खरीदी.

लाल बहादुर शास्त्री के सादगी पूर्ण विचारों के समक्ष दयाल जी नतमस्तक हो गए.

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