लोमड़ी की 7 कहानियाँ | 7 Best Fox Moral Story In Hindi

फ्रेंड्स, इस पोस्ट में हम बच्चों के लिए लोमड़ी की कहानी (Lomadi Ki Kahani) शेयर कर रहे हैं. सभी कहानियाँ लोमड़ी का चरित्र-चित्रण करती हुई रोचक और शिक्षाप्रद है.

Lomadi Ki Kahani

Lomadi Ki Kahani

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लोमड़ी और बिल्ली की कहानी

एक बिल्ली और लोमड़ी में अच्छी मित्रता थी. वे अक्सर एक साथ समय बिताया करते थे. साथ खाते, साथ खेलते और ढेर सारी बातें करते उनके दिन बड़े मज़े से गुजर रहे थे.

लोमड़ी ख़ुद को बहुत चतुर समझती थी और जब भी चतुराई की बात चलती, वो बिल्ली को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ती थी. बिल्ली को कभी-कभी ये बात बुरी भी लगती थी. लेकिन मित्रता के कारण वह इन बातों को तूल नहीं दिया करती थी.

एक दिन दोनों दोपहर के खाने के बाद एक पेड़ की छांव में आराम कर रहे थे. दोनों में बात चल पड़ी कि अगर अचानक कोई शिकारी जानवर उन पर हमला कर दे, तो वे अपने बचाव के लिए क्या करेंगे.

बिल्ली बोली, “मुझे तो ऐसी परिस्थिति से बचने का केवल एक ही तरीका आता है. मैं तो वहीं करूंगी.”

यह सुनकर लोमड़ी हँस पड़ी और कहने लगी, “बस एक ही तरीक़ा. अरे बिल्ली रानी, एक तरीके से तुम शिकारी जानवरों से कैसे बचोगी? मुझे देखो, मुझे तो उनसे बचने के हज़ारों तरीके आते हैं. तुम कहो, तो तुम्हें भी एक-दो तरीके बता दूं.”

बिल्ली बोली, “नहीं, ज्यादा तरीके जानकार मैं क्या करूंगी. जो मुझे आता है, वो अब तक कारगर सिद्ध हुआ है. मैं उससे ही अपना बचाव कर लूंगी.”

“हाँ, वैसे भी तुम्हें वे सब तरीके सीखने में कठिनाई होगी. अक्ल जो कम है.” कहकर लोमड़ी हँसने लगी.

बिल्ली को बात बुरी लगी, वह बोली, “जो भी हो, उसी तरीके से मैं अब तक बचते आ रही हूँ. भगवान ने चाहा, तो आगे भी बचूंगी.”

तभी उन्होंने देखा कि एक शिकारी कुत्ता उनकी ओर दौड़ता हुआ आ रहा है. दोनों डर गए और सोचने लगे कि अगर उन्होंने फ़ौरन अपना बचाव नहीं किया, तो शिकारी कुत्ता उन्हें चीर-फाड़ कर रख देगा.

बिल्ली को तो ऐसी परिस्थिति में बचाव का एक ही तरीका आता था और उसने वही तरीका अपनाया. फ़ौरन एक पेड़ पर चढ़ गई. हज़ारों तरीके जानने वाली लोमड़ी सोचती रही कि क्या करूं.

शिकारी कुत्ता निकट पहुँच रहा था और लोमड़ी तय नहीं कर पा रही थी कि कौन सा तरीका अजमाए. इतने में शिकारी कुत्ता लोमड़ी के निकट पहुँच गया और उसकी बोटी-बोटी नोंच दी.

सीख 

एक कारगार तरीका उन सारे तरीकों से बेहतर है, जो किसी काम के नहीं.


लोमड़ी और बीमार शेर की कहानी

जंगल का राजा शेर बूढ़ा हो चला था. उसकी शक्ति क्षीण हो गई थी. उसमें इतना बल शेष नहीं था कि जंगल में जाकर शिकार कर सके. इस स्थिति में उसके समक्ष भूखे मरने की नौबत आ गई थी.

एक दिन अपनी गुफ़ा में बैठा भूखा शेर (Lion) सोचने लगा कि यदि यही स्थिति रही, तो उसकी मृत्यु निकट है. उसे कोई न कोई उपाय सोचना होगा, ताकि बैठे-बिठाये ही भोजन की व्यवस्था हो जाये. वह सोचने लगा और कुछ ही देर में उसे एक उपाय सूझ गया.

एक चिड़िया की सहायता से उसने पूरे जंगल में अपने बीमार होने की खबर फैला दी. जंगल के राजा शेर के बीमार होने की ख़बर सुनकर जंगल के जानवर उसका हाल-चाल पूछने उसके पास पहुँचने लगे. शेर इसी ताक में था. जैसे ही कोई जानवर उससे मिलने गुफ़ा में प्रवेश करता, वह उसे दबोच कर मार डालता और छककर उसका मांस खाता.

हर दिन कोई न कोई जानवर उसे देखने आता रहता और शेर को गुफ़ा में ही शिकार हाथ लग जाता. उसके दिन बड़े आराम से गुजरने लगे. अब उसे भोजन के लिए जंगल में भटकने की आवश्यकता नहीं रह गई थी. बिना मेहनत के उसे अपनी ही गुफ़ा में भरपेट भोजन मिलने लगा था. कुछ ही दिनों में वह अच्छा मोटा हो गया.

एक सुबह एक लोमड़ी उसे देखने आई. लोमड़ी चालाक थी. वह गुफ़ा के अंदर नहीं गई, बल्कि गुफ़ा के द्वार पर खड़ी हो गई. वहीं से उसने शेर से पूछा, “वनराज! आपकी तबियत कैसी है? क्या अब आप अच्छा महसूस कर रहे हैं?”

“कौन हो मित्र? अंदर तो आओ. मैं बीमार बूढ़ा शेर बाहर तक तुमसे मिलने नहीं आ सकता. मेरी दृष्टि भी कमज़ोर है. मैं तुम्हें यहाँ से ठीक से देख भी नहीं सकता. आओ मेरे पास आओ. मुझसे आखिरी बार मिल लो. मैं कुछ ही दिनों का मेहमान हूँ.” शेर ने फ़ुसलाकर लोमड़ी को गुफ़ा के अंदर बुलाने का प्रयत्न किया.

शेर के बोलते समय लोमड़ी बड़े ही ध्यान से गुफ़ा के आस-पास का नज़ारा ले रही थी. शेर की बात ख़त्म होते ही वह बोली, “वनराज! मुझे क्षमा करें. मैं अंदर नहीं आ सकती. आपकी गुफ़ा में अंदर जाते हुए जानवरों के पैरों के निशान तो हैं, किंतु बाहर आते हुए नहीं. इसका अर्थ मैं समझ गई हूँ. सब कुछ जानते-बूझते हुए भी यदि मैं अंदर आ गई, तो उस जानवरों की तरह मारी जाऊंगी, जिनके पैरों के ये निशान हैं. इसलिए मैं जा रही हूँ.”

लोमड़ी ने जंगल में जाकर बूढ़े शेर की करतूत सभी जानवरों को बता दी. उसके बाद कोई भी जानवर शेर से मिलने नहीं गया. इस तरह अपनी बुद्धिमानी से लोमड़ी ने न सिर्फ़ अपनी जान बचाई, बल्कि जंगल के अन्य जानवरों को भी शेर के हाथों मरने से बचा लिया.

सीख  

बुद्धिमान व्यक्ति दूसरों की गलतियों से सबक लेते हैं.


लोमड़ी और कौवा की कहानी

एक लोमड़ी भोजन की तलाश में जंगल में भटक रही थी. एक पेड़ के पास से गुजरते हुए उसकी नज़र ऊँची डाल पर बैठे कौवे पर पड़ी. वह ठिठक गई. ऐसा नहीं था कि लोमड़ी ने पहले कौवा नहीं देखा था. लेकिन जिस चीज़ ने उसका ध्यान आकर्षित किया था, वह उस कौवे की चोंच में दबा हुआ रोटी का टुकड़ा था.

अब कहीं और जाने की ज़रुरत नहीं. ये रोटी अब मेरी है.’ – चालाक लोमड़ी ने मन ही मन सोचा और पेड़ के नीचे जाकर खड़ी हो गई. फिर ऊपर सिर उठाकर मीठी आवाज़ में कौवे से बोली, “शुभ-प्रभात मेरे सुंदर दोस्त.”

लोमड़ी की आवाज़ सुनकर कौवे ने अपना सिर नीचे झुकाया और लोमड़ी को देखा. लेकिन अपनी चोंच उसने कसकर बंद रखी और लोमड़ी के अभिवादन का कोई उत्तर नहीं दिया.

“तुम कितने सुंदर हो दोस्त…” लोमड़ी ने अपनी बोली में पूरी मिठास झोंक दी, “देखो तुम्हारे पंख कैसे चमक रहे हैं? तुम जैसा सुंदर पक्षी मैंने आज तक नहीं देखा. तुम विश्व के सबसे सुंदर पक्षी हो. मेरे ख्याल से तुम तो पक्षियों के राजा हो.”

कौवे ने अपनी इतनी प्रशंषा आज तक नहीं सुनी थी. वह बहुत खुश हुआ और गर्व से फूला नहीं समाया. लेकिन उसने अपनी चुप्पी नहीं तोड़ी.  

इधर लोमड़ी प्रयास करती रही, “दोस्त! मैं सोच रही हूँ कि जो पक्षी इतना सुंदर है, इसकी आवाज़ कितनी मीठी होगी? क्या तुम मेरे लिए एक गीत गुनगुना सकते हो?”

लोमड़ी के मुँह से अपनी आवाज़ की प्रशंषा सुनकर कौवे से रहा न गया. वह गाना गाने के लिए मचल उठा. लेकिन जैसे ही उसने गाना गाने के लिए अपना मुँह खोला, उसकी चोंच में दबा रोटी का टुकड़ा नीचे गिर गया.

नीचे मुँह खोले खड़ी लोमड़ी इसी फिराक़ में थी. उसने रोटी झपट ली और चलती बनी.

सीख 

चापलूसों से बचकर रहो.


लोमड़ी और सारस की कहानी

 

एक जंगल में एक चालाक लोमड़ी रहती थी. उसे दूसरे जानवरों को मूर्ख बनाने में बड़ा आनंद प्राप्त होता था. वह आये-दिन कोई न कोई युक्ति सोचती और किसी न किसी जानवर को उसमें फंसाकर मज़े लिया करती थी. जंगल के सारे जानवर उसका स्वभाव समझ चुके थे. इसलिए उससे कन्नी काटने लगे थे.

एक दिन एक सारस (Crane) जंगल में आया और नदी किनारे रहने लगा. लोमड़ी (Fox) के नज़र जब सारस पर पड़ी, तो वह सोचने लगी – जंगल के दूसरे जानवर तो मुझसे कन्नी काटने लगे हैं. ये सारस जंगल में नया आया प्रतीत होता है. क्यों न इसे मूर्ख बनाकर मज़े लूं?

वह सारस के पास गई और बोली, “मित्र! इस जंगल में नये आये मालूम पड़ते हो. तुम्हारा स्वागत है.”

“सही पहचाना मित्र. मुझे यहाँ आये अभी कुछ ही दिन हुए हैं. मैं यहाँ किसी से परिचित भी नहीं हूँ. तुमने मेरा स्वागत किया, इसलिए तुम्हारा धन्यवाद.” सारस ने उत्तर दिया.

लोमड़ी ने सारस के समक्ष मित्रता का प्रस्ताव रखा. सारस का उस जंगल में कोई मित्र नहीं था. उसने लोमड़ी की मित्रता स्वीकार कर ली. लोमड़ी ने उससे मीठी-मीठी बातें की और वापस जाते-जाते अपने घर भोज के लिए आमंत्रित कर गया.

नियत दिन को उपहार लेकर सारस लोमड़ी के घर पहुँचा. लोमड़ी उसका स्वागत करते हुए बोली, “आओ मित्र! आज मैंने तुम्हारे लिए स्वादिष्ट खीर तैयार की है.”

अंदर बुलाकर उसने दो तश्तरियां लगाई और उसमें खीर परोस दी. लंबी चोंच वाले सारस ने तश्तरी से खीर खाने का प्रयास किया, लेकिन खा नहीं पाया. उधर लोमड़ी झटपट तश्तरी में से खीर चाट गई.

अपनी तश्तरी में से खीर ख़त्म करने के बाद वह सारस से बोली, “खीर तो बहुत स्वादिष्ट है मित्र. लेकिन तुम खा क्यों नहीं रहे हो?”

सारस संकोचवश बस इतना ही कह पाया, “आज मेरे पेट में दर्द है मित्र. इसलिए मैं ये स्वादिष्ट खीर खा नहीं पाया. लेकिन भोज के लिए तुम्हारा बहुत-बहुत धन्यवाद.”

सारस अपमान का घूंट पीकर वहाँ से चला आया. उधर लोमड़ी सारस को मूर्ख बनाकर बहुत खुश हुई.

कुछ दिनों बाद सारस ने लोमड़ी को भोज पर आमंत्रित किया. नियत दिन को लोमड़ी बिना कोई उपहार लिए ही सारस के घर पहुँच गई. सारस के उसे अंदर बुलाया और बोला, “मित्र! मैंने भी भोज में खीर बनाया है. आशा है तुम्हें उसका स्वाद पसंद आएगा.”

खीर सुनकर लोमड़ी के मुँह में पानी आ गया और वह खीर परोसने की प्रतीक्षा करने लगी. कुछ देर में सारस ने सुराही में खीर भरकर परोस दी. सुराही में खीर देखकर लोमड़ी का मुँह उतर गया. उसके लिए सुराही से खीर खा पाना असंभव था. वह चुपचाप सारस का मुँह देखने लगी, जो अपनी लंबी चोंच से झटपट सुराही में रखा खीर पी गया.

खीर ख़त्म कर सारस बोला, “क्या बात है मित्र? तुम खा क्यों नहीं रहे हो? क्या तुम्हें खीर पसंद नहीं?”

लोमड़ी समझ गई कि सारस ने उससे अपने अपमान का बदला लिया है. वह खिसियाते हुए बोली, “नहीं मित्र! वो क्या है कि आज मेरे पेट में दर्द है.” और वहाँ से भाग खड़ी हुई.

सीख 

इस कहानी से सीख मिलती है कि जैसा करोगे, वैसा भरोगे. जैसे को तैसा.  


लोमड़ी और अंगूर की कहानी

एक जंगल में एक लोमड़ी रहती थी. एक दिन वह भूखी-प्यासी भोजन की तलाश में जंगल में भटक रही थी. भटकते-भटकते सुबह से शाम हो गई, लेकिन वह शिकार प्राप्त न कर सकी. 

शाम होते-होते वह जंगल के समीप स्थित एक गाँव में पहुँच गई. वहाँ उसे एक खेत दिखाई पड़ा. भूख से बेहाल लोमड़ी खेत में घुस गई. वहाँ एक ऊँचे पेड़ पर अंगूर की बेल लिपटी हुई थी, जिसमें रसीले अंगूर के गुच्छे लगे हुए थे.

अंगूर देखते ही लोमड़ी (Fox) के मुँह से लार टपकने लगी. वह उन रस भरे अंगूरों को खाकर तृप्त हो जाना चाहती थी. उसने अंगूर के एक गुच्छे पर अपनी दृष्टि जमाई और जोर से उछली. ऊँची डाली पर लिपटी अंगूर (Grapes) की बेल पर लटका अंगूर का गुच्छा उसकी पहुँच के बाहर था. उसका प्रयास व्यर्थ रहा.

उसने सोचा क्यों न एक प्रयास और किया जाए. इस बार वह थोड़ा और ज़ोर लगाकर उछली. लेकिन इस बार भी अंगूर तक पहुँचने में नाकाम रही. कुछ देर तक वह उछल-उछल कर अंगूर तक पहुँचने का प्रयास करती रही. लेकिन दिन भर की जंगल में भटकी थकी हुई भूखी-प्यासी लोमड़ी आखिर कितना प्रयास करती?

वह थककर पेड़ के नीचे बैठ गई और ललचाई नज़रों से अंगूर को देखने लगी. वह समझ कई कि अंगूर तक पहुँचना उसने बस के बाहर है. इसलिए कुछ देर अंगूरों को ताकने के बाद वह उठी और वहाँ से जाने लगी.

वह अंगूर खाने का विचार त्याग चुकी थी. पास ही एक पेड़ पर बैठा बंदर उसे बहुत देर से देख रहा था. उसे जाते हुए देख वह खुद को रोक नहीं पाया और पूछ बैठा, “क्या हुआ लोमड़ी बहन? वापस क्यों जा रही हो? अंगूर नहीं खाओगी?”

लोमड़ी रुकी और बंदर को देखकर फीकी मुस्कान से साथ बोली, “नहीं बंदर भाई. मैं ऐसे अंगूर नहीं खाती. ये तो खट्टे हैं.”

सीख 

जब हम किसी चीज़ को प्राप्त नहीं कर पाते, तो अपनी कमजोरियाँ को छुपाने या अपने प्रयासों की कमी को नज़रंदाज़ करने अक्सर उस चीज़ में ही कमियाँ निकालने लग जाते हैं. जबकि आवश्यकता है, अपनी कमजोरियों को पहचान कर उसे दूर करने की, सूझ-बूझ से काम लेने की और सफ़ल होने तक अनवरत प्रयत्न करते रहने की. दूसरों पर दोष मढ़ने से जीवन में कुछ हासिल नहीं होता. हासिल होता है : कड़े परिश्रम और प्रयासों से.


गधा, लोमड़ी और शेर की कहानी

एक बार जंगल में रहने वाली चालाक लोमड़ी की मुलाकात सीधे-सादे गधे से हुई. उसने गधे के सामने मित्रता का प्रस्ताव रखा. गधे का कोई मित्र नहीं था. उसने लोमड़ी की मित्रता स्वीकार कर ली. दोनों ने एक-दूसरे को वचन दिया कि वे सदा एक-दूसरे की सहायता करेंगे.

उस दिन के बाद से दोनों अपना अधिकांश समय एक-दूसरे के साथ गुजारने लगे. वे जंगल में घूमा करते, घंटों एक-दूसरे से बातें किया करते थे. गधा लोमड़ी का साथ पाकर बहुत ख़ुश था.

एक दिन दोनों जंगल के तालाब किनारे बातें कर रहे थे. तभी वहाँ जंगल का राजा शेर पानी पीने आया. उसने जब गधे को देखा, तो उसके मुँह में पानी आ गया.

लोमड़ी को शेर की मंशा भांपते देर नहीं लगी. वह सोचने लगी कि क्यों न शेर से एक समझौता किया जाए. मैं उसे गधे को मारने में सहायता करूंगी. इस तरह मेरे भोजन की भी व्यवस्था को जायेगी.

वह शेर के पास गई और मधुर स्वर में बोली, वनराज! यदि आप उस गधे का मांस खाना चाहते हैं, तो आपकी सहायता कर सकती हूँ. बस आप मुझे वचन दें कि आप मुझे कोई नुकसान नहीं पहुँचायेंगे और थोड़ा मांस मुझे भी दे देंगे.”

शेर भला सामने से आ रहे प्रस्ताव को क्यों अस्वीकार करता? वह मान गया. अगले दिन योजना अनुसार लोमड़ी गधे को भोजन ढूंढने के बहाने जंगल में एक ऐसे स्थान पर ले गई, जहाँ एक गहरा गड्ढा था.

लोमड़ी की बातों में उलझे गधे की दृष्टि गड्ढे पर नहीं पड़ी और वह उसमें गिर पड़ा. लोमड़ी ने तुरंत पेड़ के पीछे छुपे शेर को इशारा कर दिया. शेर भी इसी अवसर की ताक में था.

उसने पहले लोमड़ी पर हमला किया और उसे मारकर छककर उसका मांस खाया. बाद में उसने गधे को मारकर उसके मांस की दावत उड़ाई.

सीख 

मित्र को धोखा देने वाले का परिणाम बुरा होता है.


कौवा, हिरण और लोमड़ी की कहानी

एक जंगल में एक कौवा और हिरण रहते थे. दोनों में गाढ़ी मित्रता थी. अक्सर दोनों साथ रहते और मुसीबत के समय एक-दूसरे का साथ देते.

हिरण हट्टा-कट्ठा और मांसल था. जंगल के कई जानवरों उसके मांस का भक्षण करने लालायित रहा करते थे. किंतु जब भी वे हिरण के निकट आने का प्रयास करते, कौवा हिरण को चौकन्ना कर देता और हिरण कुंचाले भरता हुआ भाग खड़ा होता.

जंगल में रहने वाली एक लोमड़ी भी हिरण के मांस का स्वाद लेना चाहती थी. लेकिन कौवे के रहते ये संभव न था. एक दिन उसने सोचा, “क्यों ना हिरण से मित्रता कर उसका विश्वास प्राप्त कर लूं? फिर किसी दिन अवसर पाकर उसे दूर कहीं ले जाऊंगी और उसका काम-तमाम कर दूंगी. तब जी-भरकर उसके मांस का भक्षण करूंगी.”

उस दिन के बाद से वह ऐसा अवसर तलाशने लगी, जब हिरण अकेला हो और कौवा उसके आस-पास न हो. एक दिन उस वह अवसर प्राप्त हो ही गया. जंगल में उसे हिरण अकेला घूमता हुआ दिखाई पड़ा, तो धीरे से उसके पास पहुँची और स्वर में मिठास घोलकर बोली, “मित्र! मैं दूसरे जंगल से आई हूँ. यहाँ मेरा कोई मित्र नहीं है. तुम मुझे भले लगे. क्या तुम मुझसे मित्रता करोगे? मैं तुम्हें जंगल के उस पार के हरे-भरे खेतों में ले चलूंगी. वहाँ तुम पेट भरकर हरी घास चरना.”

हिरण लोमड़ी की मीठी बातों में आ गया और उससे मित्रवत व्यवहार करने लगा. उस दिन के बाद से लोमड़ी रोज़ हिरण के पास आती और उससे ढेर सारी बातें करती.

एक दिन कौवे ने हिरण को लोमड़ी से बातें करते हुए देख लिया. उसे लोमड़ी की मंशा समझते देर न लगी. लोमड़ी के जाते ही वह हिरण के पास गया और उसे चेताते हुए बोला, “मित्र! ये लोमड़ी दुष्ट है. इसकी मंशा तुम्हें मारकर खा जाने की है. प्राण बचाने हैं, तो इससे दूरी बनाकर रखो.”

हिरण बोला, “मित्र! हर किसी को शंका की दृष्टि से देखना उचित नहीं है. लोमड़ी सदा मुझसे मित्रवत रही है. विश्वास करो वह शत्रु नहीं, मित्र है. उसके द्वारा मुझे हानि पहुँचाने का प्रश्न ही नहीं उठता. तुम निश्चिंत रहो.”

हिरण का उत्तर सुनकर कौवा चला गया. किंतु उसे लोमड़ी पर तनिक भी विश्वास नहीं था. वह दूर से हिरण पर नज़र रखने लगा.

एक दिन लोमड़ी ने देखा कि मक्के के एक खेत में उसके मालिक ने मक्का चोर को पकड़ने के लिए जाल बिछा कर रखा है. हिरण को फंसाने का यह एक सुअवसर था. लोमड़ी तुरंत हिरण के पास गई और बोली, “मित्र! आज मैं तुम्हें मक्के के खेत में ले चलता हूँ.”

हिरण सहर्ष तैयार हो गया. दोनों जंगल के पास स्थित मक्के के खेत में पहुँचे. किंतु खेत में प्रवेश करते ही हिरण खेत के मालिक द्वारा बिछाए जाल में फंस गया. उसने निकलने का बहुत प्रयास किया, किंतु सफ़ल नहीं हो सका.

उसने लोमड़ी से सहायता की गुहार लगाई. लेकिन लोमड़ी तो इस फ़िराक में थी कि कब खेत का मालिक हिरण को मारे और वह भी अवसर देखकर उसका मांस चख सके. उसने हिरण को उत्तर दिया, “इतने मजबूत जाल को काटना मेरे बस की बात कहाँ? तुम यहीं ठहरो, मैं सहायता लेकर आती हूँ.”

यह कहकर लोमड़ी खेत के पास ही झाड़ियों के पीछे छुपकर खेत के मालिक के आने की प्रतीक्षा करने लगी.

इधर जंगल में अपने मित्र हिरण को न पाकर कौवा खोज-बीन करता हुआ मक्के के खेत में आ पहुँचा. वहाँ हिरण को जाल में फंसा देख वह उसके पास गया और बोला, “मित्र! चिंता मत करो. मैं तुम्हारे साथ हूँ. मैं तुम्हारे प्राणों की रक्षा करूंगा. अब तुम ठीक वैसा करो, जैसा मैं कहता हूँ. सांस रोककर बिना हिले-डुले जमीन पर ऐसे पड़ जाओ, मानो तुममें जान ही नहीं है. खेत का मालिक तुम्हें मरा समझकर ज्यों ही जाल हटायेगा, मैं आवाज़ देकर तुम्हें इशारा करूं दूंगा. बिना एक क्षण गंवाए तुम भाग खड़े होना.”

हिरण ने वैसा ही किया. खेत के मालिक ने उसे मरा जानकार जैसे ही जाल हटाया, कौवे ने इशारा कर दिया और इशारा मिलते ही हिरण भाग खड़ा हुआ. हिरण को भागता देख खेत के मालिक ने हाथ में पकड़ी कुल्हाड़ी पूरे बल से उसकी ओर फेंकी. किंतु हिरण बहुत दूर निकल चुका था. वह कुल्हाड़ी झाड़ी के पीछे छुपी लोमड़ी के सिर पर जाकर लगी और वो वहीं ढेर हो गई. लोमड़ी को अपनी दुष्टता का फल मिल चुका था.

सीख 

मित्र का चुनाव करते समय हमेशा सावधानी रखो. कभी भी किसी अजनबी पर आँख मूंदकर विश्वास न करो.  


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