मिथ्या अभिमान पर कहानी | Mithya Abhiman Story In in

फ्रेंड्स, मिथ्या अभिमान पर कहानी (Mithya Abhiman Story In Hindi) हम इस पोस्ट में शेयर कर रहे हैं। Raja Aur Mantri Ki Kahani की सीख देने वाली कहानी मिथ्या अभिमान त्यागकर विनम्रता का पाठ पढ़ाती है।

Mithya Abhiman Story Hindi

Mithya Abhiman Story
Mithya Abhiman Story Hindi

एक राज्य में एक पराक्रमी राजा राज करता था। वह एक कुशल योद्धा था और हर युद्ध में विजयी होता था। आस पड़ोस के राज्य के राजा भी उसके पराक्रम का लोहा मानते थे।

एक बार वह एक युद्ध में विजयी होकर अपने नगर लौट रहा था। उसके मंत्री और सैनिक उसके साथ थे।

रास्ते में एक पेड़ के नीचे उसे एक बौद्ध भिक्षुक बैठा दिखा। वह घोड़े से उतरा और भिक्षुक के पास जाकर उनके चरणों पर अपना सिर रख दिया। मंत्री और सैनिक ये दृश्य देख रहे थे। एक मंत्री को अपने राजा का भिक्षुक के चरणों पर शीश झुकाना अच्छा नहीं लगा।

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महल आने के बाद उसने राजा से कहा, “महाराज! आप इतने पराक्रमी राजा हैं। आपने कितने युद्ध जीते। सब आपका लोहा मानते हैं। आपका शीश तो गर्व से तना रहना चाहिए। किंतु आपने एक भिक्षुक के चरणों पर शीश झुका दिया। मुझे ये उचित नहीं जान पड़ा।”

राजा मुस्कुराया, किंतु कुछ बोला नहीं। अगले दिन उसने उस मंत्री को बुलवाया और एक थैला देकर कहा, “इस थैले में चार चीजें रखी हैं। बाज़ार जाओ और इन्हें बेच कर आओ। ध्यान रहे, बाज़ार जाने के पहले इस थैले में झांककर मत देखना।”

मंत्री थैला लेकर बाज़ार चला गया। बाज़ार में जब बेचने के लिए उसने चारों चीज़ें निकाली, तो चकित रह गया। थैले में एक मुर्गी का सिर, एक मछली का सिर, एक बकरी का सिर और एक इंसान का सिर था।

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राजा की आज्ञा का पालन उसे करना ही था। उसने मुर्गी का सिर, मछली का सिर और बकरी का सिर तो बेच दिया। किंतु इंसान का सिर खरीदने को कोई तैयार नहीं हुआ। वह उसे बिना बेचे ही राजा के पास लौट आया।

राजा को उसने सारी बात बताई।

राजा ने कहा, “कोई बात नहीं। कल एक प्रयास और करना। अबकी बार तुम बिना कोई मूल्य लिए इंसान का सिर किसी को दे आना।”

अगले दिन मंत्री फिर बाजार गया। पूरे दिन उसने इंसान का सिर मुफ्त में लोगों को देने का प्रयास किया, किंतु मुफ़्त में भी किसी ने वह सिर नहीं लिया।

मंत्री महल लौट आया। वह समझ चुका था कि राजा ने उसे यह काम करने क्यों कहा था। वह राजा के पास पहुंचा, तो राजा ने पूछा, “क्या मेरी मृत्यु के बाद तुम मेरा सिर अपने पास रखोगे।”

मंत्री ने सिर झुका दिया।

राजा ने कहा, “जिस सिर को कोई बिना मोल भी लेना नहीं चाहता, उसे मैंने किसी भिक्षुक के चरणों में झुका दिया, तो क्या हो गया। विनम्रता से झुके मेरे सिर को भिक्षुक का आशीर्वाद तो मिला। स्मरण रखो, मिथ्या अभिमान का कोई अर्थ नहीं।”

सीख (Mithya Abhiman Story Moral)

मिथ्या अभिमान व्यर्थ है। विनम्र व्यक्ति सदा फलता फूलता है और अभिमानी अपने अभिमान की तरह कभी न कभी टूट ही जाता है।

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