मुफ़्त ही मुफ़्त : एक कंजूस की कहानी | Muft Hi Muft Story In Hindi

फ्रेंड्स, इस पोस्ट में हम मुफ़्त ही मुफ़्त कहानी (Muft Hi Muft Story In Hindi) शेयर कर रहे हैं. ये एक कंजूस व्यक्ति की कहानी है. अपनी कंजूसी के लिए वह किस हद तक जाता है और उसका परिमाण क्या होता है? ये इस कहानी में मज़ेदार ढंग से बताया गया है. ये कहानी Rimjhim NCERT Class 4 के पाठ्यक्रम में भी दी गई है. पढ़िए एक kanjoos ki kahani :

Muft Hi Muft Story In Hindi Class 4

Muft Hi Muft Story In Hindi
Muft Hi Muft Story In Hindi | Muft Hi Muft Story In Hindi

एक गाँव में भीखूभाई नाम का कंजूस आदमी रहता था. एक दिन उसने अपने पड़ोसी को नारियल खाते देखा, तो उसका मन भी ललचा गया.

उसने अपने पत्नि से कहा, “आज नारियल खाने का मन कर रहा है. ताज़ा, कसा हुआ, शक्कर के साथ.”

घर पर एक भी नारियल नहीं था.

पत्नि बोली, “नारियल खाना है, तो बाज़ार जाकर लाना पड़ेगा.”

“फिर तो इसके लिए पैसे भी खर्च करने पड़ेंगे.” कंजूस भीखूभाई सोचते हुए बोला.

“बिना पैसे के तो नारियल मिलने से रहा. नारियल ख़रीदने के लिए पैसे तो देने पड़ेंगे.” पत्नि बोली.

कंजूस भीखूभाई की जेब से पैसे कहाँ आसानी से निकलने वाले थे? वह घर के बाहर आंगन में जाकर बैठ गया. लेकिन उसका मन बार-बार नारियल को ओर जाले लगा. आख़िर, उससे न रहा गया. उसने सोचा, बाज़ार का एक चक्कर मारकर आता हूँ. पता तो चले कि नारियल किस दाम पर बिक रहे हैं. सस्ते हुए, तो ख़रीद लूंगा.”

वह अंदर गया और पत्नि से बोला, “एक थैला तो देना ज़रा. बाज़ार का एक चक्कर लगाकर आता हूँ.”

पत्नि से थैला लेकर जूते पहनकर और हाथ में छड़ी लेकर भीखूभाई बाज़ार की ओर चल पड़ा.

बाज़ार में बहुत सी चीज़ों की दुकाने सजी हुई थी. भीखूभाई को कुछ लेना तो था नहीं, फिर भी उसने सोचा कि जब यहाँ तक आ ही गया हूँ, तो कुछ चीज़ों के दाम पता कर लेता हूँ. वह कुछ दुकानों में गया और चीज़ों के दाम पूछने लगा.

फिर कुछ देर इधर-उधर घूमने के बाद वह एक नारियल वाले के पास पहुँचा और पूछा, “भैया, नारियल कितने में दे रहे हो?”

“बस बीस रुपये के काका.” नारियलवाला बोला.

कंजूस भीखूभाई बीस रुपये देने से तो रहा. वह मोलभाव करने लगा, “बीस रूपये तो बहुत ज्यादा है भैय्या. दस रूपये में दे दो.”

“नहीं काका, बीस रूपये से एक पैसा कम नहीं लूंगा. लेना है तो लो, नहीं तो कहीं और पता करो.” नारियलवाला बोला.

“अच्छा भाई, यही बता दो कि दस रूपये में कहाँ मिलेगा?” भीखूभाई की नारियल खाने की इच्छा अब भी बाकी थी.

“यहाँ से कुछ दूर पर जो मंडी है, वहाँ पता कर लो काका. शायद वहाँ मिल जाये.” नारियल वाले ने बताया.

भीखूभाई ने सोचा कि यहाँ तक आ गया हूँ, तो मंडी तक भी हो आता हूँ. दस रुपये बच जायेंगे. और उसने मंडी की राह पकड़ ली.

मंडी पहुँचते-पहुँचते भीखूभाई का पसीना छलक आया. पसीना पोछकर वह मंडी में घूमने लगा. वहाँ सभी सब्जी वाले आवाज़ लगाकर सब्जियाँ बेच रहे थी : आलू ले लो…प्याज ले लो….टमाटर ले लो.

भीखूभाई एक नारियलवाले के पास पहुँचा और पूछा, “नारियल कितने में दिए भाई?”

“दस रुपये का है काका. अपनी पसंद का छांटकर ले जाओ.” नारियलवाला बोला.

भीखूभाई ठहरा कंजूस. सोचने लगा, इतनी दूर पैदल चलकर आया हूँ, फिर इतने दाम क्यों दूं? दाम कुछ कम करवाता हूँ.

“दस रूपये तो बहुत महंगा है.पाँच रूपये में ये नारियल मुझे दे दो.” कहते हुए भीखूभाई ने एक नारियल उठा लिया.

“नहीं काका” नारियलवाला नारियल छीनते हुए बोला, “दस रूपये मतलब दस रूपये. उससे एक पैसा कम नहीं लूंगा.”  

यह सुनकर भीखूभाई का मुँह उतर गया. वह कुछ देर वहीं खड़ा रहा, फिर बोला, “अच्छा भाई, ये ही बता दो कि पाँच रूपये में कहाँ मिलेगा?”

नारियल वाले ने सिर से पैर तक भीखूभाई को देखा और बोला, “बंदरगाह जाकर देख लो, शायद वहाँ मिल जाये.”

भीखूभाई ने सोचा कि यहाँ तक आ गया हूँ, तो बंदरगाह तक जाने में क्या बुराई है? थका भी नहीं हूँ, उतनी दूर तो चल ही लूंगा. फिर क्या था? छड़ी घुमाते हुए भीखूभाई बंदरगाह की ओर चल पड़ा. लेकिन आधे रास्ते में ही उनकी हिम्मत जवाब देने लगी.

रुक-रूककर, पसीना पोछते हुए किसी तरह पैर घिसटाकर भीखूभाई बंदरगाह तक पहुँचा. वहाँ एक नाववाला बैठा हुआ था. उसकी नाव में कुछ नारियल भी पड़े हुए थे.

भीखूभाई हाँफते-हाँफते उसके पास गया और पूछने लगा, “ये नारियल कितने का दे रहे हो भाई?”

“बस पाँच रूपये का काका” नाववाला बोला.

कंजूस भीखूभाई की कंजूसी फिर से उस पर हावी हो गई. उसने सोचा कि कितनी मुश्किल से यहाँ तक चलकर आया हूँ. फिर पाँच रुपये क्यों दू? दो रुपये में मांगकर देखता हूँ.  

“अरे..रे..रे.. पाँच रूपये तो बहुत ज्यादा लगा रहे हो. मैं तो दो रुपये में लूंगा.” कहते हुए वह झुककर नारियल उठाने लगा.

“नारियल नीचे रख दो काका…कोई मोल-भाव नहीं…..पाँच रूपये में लेना हो, तो लो. नहीं तो हमें और ग्राहक मिल जायेंगे.”

मन मारकर भीखूभाई ने नारियल वापस रख दिया और रोनी सूरत बनाकर वहीं खड़ा रहा.  नारियल वाले ने उसे भागने के लिए कहा, “यहाँ से कुछ दूर नारियल का बगीचा है, वहाँ सस्ते में मिल जायेंगे.”

ये सुनना था कि भीखूभाई का चेहरा खिल उठा. थके-हरे शरीर में फिर से फुर्ती का संचार हो गया. उसने सोचा कि थोड़ा ज्यादा चलना पड़ेगा, लेकिन पैसे भी तो बच जायेंगे. पैसे बचाने के लिए थोड़ी मेहनत कर लेता हूँ.

वह धीरे-धीरे चलते-चलते नारियल के बगीचे में पहुँचा. वहाँ माली से पूछा, “नारियल कितने में दोगे?”

“बस दो रूपये में. इतने सस्ते में इतने बड़े और मीठे नारियल कहीं नहीं मिलेंगे. जितनी मर्ज़ी ले जाओ काका.” माली बोला.

इतने दूर जूते घिस कर चलकर आने वाला भीखूभाई अब एक भी पैसा खर्च करना नहीं चाहता था. वह बोला, “क्या भाई? इतनी दूर चलकर आया हूँ. नारियल के बगीचे में कौन नारियल के पैसे लेता है. मुफ़्त में दे दो.”

“मुफ़्त में नारियल चाहिए?” माली ने पूछा.

“हाँ भाई….मुफ़्त में दे दो. इतने सारे है…एक के क्या पैसे लेना…” भीखूभाई माली की खुशामद करते हुए बोला.

“एक क्या, जितने चाहिए उतने ले लो. पैसे तो मैं अपनी मेहनत का लेता हूँ. मुफ़्त में लेना है, तो चढ़ जाओ पेड़ पर और जितनी मर्ज़ी तोड़ लो.” माली बोला.

“सच” भीखूभाई ख़ुशी से नाच उठा. उसकी तो किस्मत खुल गई थी. बिना देर किये वह एक नारियल के पेड़ पर चढ़ गया. टहनी और तने के बीच बैठकर उसने एक बड़ा सा नारियल देखा और उसे पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाने लगा. लेकिन ये क्या? उसका पैर फ़िसल गया.

नारियल को कसकर पकड़कर भीखूभाई नीचे गिरने से तो बच गया, लेकिन उसके दोनों पैर हवा में झूल गये.

मदद के लिए वह चिल्लाने लगा, “माली ओ माली…मदद करो भाई…नीचे गिर गया, तो कचूमर निकल जायेगा.”

“ये मेरा काम नहीं है काका. तुम्हें मुफ़्त में नारियल चाहिए थे, तो तुम पेड़ पर चढ़े. अब आगे जो हो…उसके भी मुफ़्त में मज़े लो.” कहकर माली वहाँ से चला गया.

तभी वहाँ से एक ऊँट पर सवार आदमी गुज़रा. उसे देख भीखूभाई चिल्लाया, “अरे भाई! मैं यहाँ पेड़ पर लटका हूँ. मदद कर दो….बहुत मेहरबानी होगी”

ऊँट वाले ने सोचा कि मैं तो ऊँट पर हूँ. इसकी मदद कर देता हूँ. ये सोचकर वह भीखूभाई के पास पहुँचा और ऊँट की पीठ पर खड़े होकर भीखूभाई का पैर पकड़ लिया. लेकिन ऊँट तो ऊँट था. उसने हरे-भरे पत्ते देखे, तो उन्हें खाने चल पड़ा. इधर उसकी पीठ पर खड़े आदमी का पैर फ़िसल गया. नीचे गिरने से बचने के लिए उसने भीखूभाई के पैर पकड़ लिए. अब दो लोग पेड़ पर लटके हुए थे.

उसी समय वहाँ से एक घुड़सवार गुजरा. वे लोग मदद ने लिए उसे पुकारने लगे. घुड़सवार ने सोचा, “चलो. इनकी मदद कर देता हूँ.”

वह उनके पास पहुँचा और उनकी मदद करने घोड़े की पीठ पर खड़े हो गया. लेकिन घोड़ा ऊँट से भी तेज निकला. नरम-मुलायम हरी घास देखकर उसे चरने आगे बढ़ गया. इधर घुड़सवार ने खुद को गिरने से बचाने के लिए ऊँटवाले के पैर पकड़ लिए.

अब नारियल के पेड़ पर तीन लोग लटके हुए थे : भीखूभाई, ऊँटवाला और घुड़सवार.

पेड़ से नीचे न गिरने का पूरा दारोमदार अब भीखूभाई के ऊपर था. घुड़सवार चिल्लाया, “काका, जब तक कोई आ ना जाए, तब तक नारियल मत छोड़ना. मैं तुम्हें सौ रूपये दूंगा.”

ऊँट वाले ने बोली बढ़ा दी, “मैं तुम्हें दो सौ रूपये दूंगा काका. नारियल मत छोड़ना.”

एक सौ…और… दो सौ…तीन सौ रुपये सुनकर भीखूभाई का दिमाग चकरा गया, “तीन सौ रुपये…इतने पैसे मुझे मिलेंगे…अरे वाह!!” ख़ुशी इतनी कि संभाले नहीं संभली और उसने दोनों हाथ फैला दिए.

नारियल हाथ से छूट गया और तीनों सीधे नीचे आ गिरे : घुड़सवार, उसके ऊपर ऊँटवाला और उसके ऊपर भीखूभाई. भीखूभाई ख़ुद को संभालने की कोशिश कर ही रहा था कि एक बड़ा सा नारियल सीधे उसके सिर पर आकर गिरा.

बिल्कुल मुफ़्त!!

सीख (Moral of the story)

कंजूसी करने पर लेने के देने भी पड़ जाते हैं.


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