टिटहरी का जोड़ा और समुद्र का अभिमान : पंचतंत्र की कहानी ~ मित्रभेद | The Bird Pair And The Sea Panchatantra Story

फ्रेंड्स इस पोस्ट में हम टिटहरी का जोड़ा और समुद्र का अभिमान  – पंचतंत्र की कहानी (The Bird Pair And The Sea Panchatantra Story For Kids In Hindi) शेयर कर रहे हैं. Titahari Ka Joda Aur Samudra Ka Abhiman – Panchatantra Ki Kahani ‘मित्रभेद’ से ली गई है. यह कहानी अहंकारी समुद्र के किनारे रहने वाले टिटहरी के जोड़े की है. कैसे वह समुद्र के अभिमान को तोड़ता है, जानने के लिए पढ़िये दृढ़ निश्चय का सीख देने वाली ये कहानी : 

Panchatantra Story For Kids In Hindi 

Panchatantra Story For Kids
Panchatantra Story For Kids In Hindi

टिटहरी का एक जोड़ा समुद्र के किनारे रहता था. एक बार जब अंडे देने का समय आया, तो टिटहरी टिटहरे बोली, “अब हमें किसी सुरक्षित स्थान की खोज करनी चाहिए. यह स्थान हमारी संतानों के लिए सुरक्षित नहीं है.”

टिटहरा वह स्थान छोड़ना नहीं चाहता था, वह बोला, “क्यों क्या समस्या है इस स्थान पर? मेरे विचार में यहाँ सभी स्थान सुरक्षित हैं. तुम्हें चिंता करना छोड़ देना चाहिए.”

इस पर टिटहरी बोली, “तुम्हें ये विशाल समुद्र दिखाई नहीं पड़ता. ज्वार के समय इसकी शक्तिशाली लहरें हाथी जैसे विशालकाय जीव को भी खींचकर ले जाती हैं. ऐसे में हम छोटे पंछियों की क्या बिसात? मेरी मानो तो यह स्थान छोड़कर कहीं और चलो.”

किंतु टिटहरा नहीं माना. वह बोला, “तू व्यर्थ में चिंतित है. समुद्र यह दुस्साहस कर ही नहीं सकता. वह मुझे भय खाता है. इसलिए तू देखना, वह कभी हमारी संतानों को बहाकर नहीं ले जायेगा.”

टिटहरे की यह बात समुद्र ने सुन ली. उसे टिटहरे के अभिमान पर बड़ा क्रोध आया. उसने सोचा – एक छोटे से पंछी को स्वयं पर इतना अभिमान! अपने अभिमान में चूर ये पंछी स्वयं को मुझसे भी बड़ा समझता है. इसका अभिमान चूर करना ही होगा.

समय आने पर टिटहरी ने अंडे दिए. एक दिन टिटहरी और टिटहरा दोनों भोजन की तलाश में गए हुए थे. तभी समुद्र में ज्वार आया और लहरों ने टिटहरी के अंडों को बहा दिया.

वापस आने पर अपने अंडों को न देख टिटहरी विलाप करने लगी. वह टिटहरे को कोसते हुए बोली, “मेरी बात न मानने का परिणाम देख लिया. ये समुद्र हमारे अंडों को बहाकर ले गया और तुम बातें बनाते रह गए. ऐसा ही अनर्थ होता है, जब कोई अभिमानी अपने प्रियजनों की बात नहीं मानता. मेरी बात मानकर यदि बुद्धि से काम लिया होता और संकट आने के पूर्व ही उसका समाधान खोज लिया होता, तो हमें ये दिन न देखने पड़ते.”

टिटहरी की इस बात पर टिटहरा बोला, “मैं बुद्धि में किसी से कम नहीं हूँ. तू देखती जा, मैं कैसे समुद्र का पानी अपनी चोंच से सुखाकर अंडों को बाहर निकालता हूँ.”

“अपनी शक्ति देखकर किसी से बैर करना चाहिए. विशाल समुद्र के समक्ष तुम एक तुच्छ प्राणी हो. यह बैर कहीं तुम्हें ही नष्ट न कर दे.” टिटहरी बोली.

टिटहरी की बात पर टिटहरे ने ध्यान नहीं दिया और अपनी डींगे हांकने में लगा रहा. टिटहरी उसे समझाती रह गई कि कई नदियों से निरंतर भरने वाले समुद्र को सुखा पाना उसके बस के बाहर है. किंतु टिटहरा हठ पर अड़ा रहा.

अंततः टिटहरी बोली, “ठीक है, जैसा तुम उचित समझो. किंतु मेरी एक बात मान लो. इस काम में तुम अन्य पंछियों के सहायता मांगो. एकता में बल होता है. हो सकता है, तुम सब छोटे-छोटे पंछियों की एकता समुद्र को सुखाने का कारनामा कर दिखाए.

टिटहरे ने टिटहरी की ये बात मान ली और अपने पक्षी मित्र बगुले, सारस, मोर आदि को अपनी व्यथा सुनाकर उनसे सहायता की मांग की. लेकिन सभी ने स्वयं को इस कार्य के लिए अशक्त बताया. उन्होंने टिटहरे को गरूड़ का नाम सुझाया.

सभी मिलकर गरूड़ के पास गए और सहायता की याचना करने लगे, “गरूड़ महाराज! समुद्र का अत्याचार बहुत बढ़ चुका है. उसने टिटहरे के अंडो को बहा दिया. भविष्य में वह अन्य पक्षियों के साथ भी ऐसा कर सकता है. उसे रोकना होगा. अन्यथा, हमारा पक्षिकुल नष्ट हो जायेगा.”

गरूड़ उनकी सहायता के लिए मान गया.

उसी समय भगवान विष्णु का दूत गरूड़ बुलाने आया और उसे सूचित करते हुए बोला, “भगवान विष्णु शीघ्र तुम्हें बुला रहे हैं.”

उस समय गरूड़ क्रोध में था. उसने दूत को उत्तर दिया, “इस समय आने में मैं असमर्थ हूँ. भगवान विष्णु से जाकर कहो कि वे दूसरी सवारी का प्रबंध कर लें.”

दूत के पूछने पर गरूड़ ने समुद्र के द्वारा पक्षियों पर किये जा रहे अत्याचार के बारे में वर्णन कर दिया. दूत ने यह वर्णन भगवान विष्णु को सुनाया. तब स्वयं भगवान विष्णु गरूड़ के पास पहुँचे.

गरूड़ ने उन्हें प्रणाम कर कहा, “भगवन! समुद्र अति-अभिमानी हो गया है. निरीह प्राणियों पर उसका अत्याचार बढ़ने लगा है. कुछ देर पहले उसने मेरे मित्र टिटहरे के अंडों का अपहरण कर न सिर्फ़ उसे दुःख दिया है, बल्कि समस्त पक्षीजाति को अपमानित किया है. अब हमें इसका प्रतिशोध चाहिए.”

भगवान विष्णु पूरी बात सुनकर बोले, “तुम्हारा क्रोध उचित है. समुद्र का कृत्य सर्वथा अनुचित है. आओ, समुद्र के पास चलें. मैं अभी टिटहरे के अंडे उसे वापस दिलवाता हूँ.”

सभी समुद्र तट पर पहुँचे. भगवान विष्णु ने अपने धनुष पर ‘आग्नेय बाण’ चढ़ाया और समुद्र से बोले, “दुष्ट समुद्र! यदि तूने टिटहरे के अंडे वापस नहीं किये, तो मैं तुझे क्षण भर में सुखा दूंगा.”

भगवान विष्णु का क्रोध देख समुद्र भयभीत हो गया और उसने तत्काल टिटहरी और टिटहरे के अंडे वापस कर दिए.

सीख  (Moral of the story)

यदि ठान लो, तो असंभव भी संभव है.

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