सच्चा मन : उत्तर प्रदेश की लोक कथा | Sachcha Man UP Ki Lok Katha

फ्रेंड्स, इस पोस्ट में हम उत्तर प्रदेश की लोक कथा “सच्चा मन” (Sachcha Man UP Ki Lok Katha) शेयर कर रहे है. एक कहानी एकाग्रचित्त होकर पूरी लगन से कार्य करने की सीख देती है. पढ़िये पूरी कहानी : 

Sachcha Man UP Ki Lok Katha

Sachcha Man UP Ki Lok Katha
Sachcha Man UP Ki Lok Katha

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एक बाल ग्वाला प्रतिदिन अपनी गायों को चराने नदी किनारे स्थित जंगल ले जाया करता था. उस जंगल में एक संत की कुटिया थी. ग्वाला प्रतिदिन देखता कि संत विभिन्न क्रिया-कलापों में लीन हैं.

संत कभी हाथ जोड़कर कुछ मंत्रों उच्चारण करता, तो कभी आँख-नाक बंदकर कुछ विचित्र क्रियायें करता. ग्वाला इन सब क्रियाकलापों को देख अचरज में पड़ जाता था.

एक दिन उसने सोचा कि इन सबके पीछे संत की मंशा जाननी चाहिए. वह संत के पास गया और प्रणाम करके बोला, “गुरुवर! मैं प्रतिदिन आपको विभिन्न क्रियाओं में लीन पाता हूँ. मैं जानने को इच्छुक हूँ कि वे कौन सी क्रियाएं हैं और उनसे क्या होगा?”

संत ने उत्तर दिया, “बालक! मैं ईश्वर का दर्शनाभिलाषी हूँ. उनके दर्शन की कामना में प्रतिदिन विभिन्न क्रियाओं के माध्यम से उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास करता हूँ.”

ग्वाले के मन में भी ईश्वर के दर्शन की अभिलाषा जागृत हो गई. उसने प्रण किया कि वो ईश्वर के दर्शन करके रहेगा. अगले दिन आँख बंद कर और एक पैर पर खड़े होकर उसने कठोर तप प्रारंभ कर दिया.

वह किसी भी स्थिति में ईश्वर के दर्शन करना चाहता था और कुछ भी कर जाने को तत्पर था. उसने अपनी नाक बंद कर श्वास रोक ली और सोच लिया कि यदि ईश्वर उसे दर्शन नहीं देंगे, तो वह प्राण निकलने तक इसी स्थिति में रहेगा.

ईश्वर एक छोटे से बालक का इतना कठोर तप देख उसे दर्शन देने विवश हो गए और उसके समक्ष प्रकट होकर बोले, “वत्स! आँखें खोलो. तुम्हारे तप से प्रसन्न होकर मैं तुम्हें दर्शन देने आया हूँ.”

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ग्वाले ने आँख बंद किये हुए ही पूछा, “आप कौन है?”

ईश्वर ने उत्तर दिया, “मैं वही ईश्वर हूँ, जिसके दर्शन हेतु तुम तप कर रहे हो.”

ग्वाले ने आँखें खोल दी. सामने ईश्वर खड़े थे. किंतु, ग्वाले ने कभी ईश्वर को नहीं देखा था. वह सोचने लगा कि उन्हें मैं कैसे पहचानू. फिर कुछ सोचकर उसने ईश्वर को रस्सी से बांध दिया और संत को बुलाने चला गया.

संत ईश्वर के प्रकट होने की बात सुन उसके साथ उस स्थान पर आया, जहाँ उसने ईश्वर को बांधकर रखा था. किंतु, उसे ईश्वर दिखाई नहीं दिए.

ग्वाला चकित था. उसने ईश्वर से पूछा, “भगवन्! आप मुझे तो दिखाई दे रहे हैं. किंतु, संत महाराज को नहीं. ऐसा क्यों?’

ईश्वर बोले, “वत्स! मैं उन्हें दर्शन देता हूँ, जो निष्कपट भाव से अपने पूर्ण अंत:करण से मेरी आराधना करते हैं. तुमने सच्चे मन से मेरी आराधना की. अपने प्राण देने तत्पर हो गये. इसलिए मुझे तुम्हारे समक्ष आना पड़ा. किंतु, संत के मन में अब भी भटकाव है. इसलिए वो मेरे दर्शन से वंचित है.”

सीख (Moral of the story)

ईश्वर की प्राप्ति की कामना हो या किसी कार्य में सफ़लता प्राप्ति की कामना. एकाग्रचित्त होकर पूर्ण लगन से प्रयास आवश्यक है.


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