10 शिक्षाप्रद मजेदार कहानियाँ | 10 Shikshaprad Majedar Kahaniya

शिक्षाप्रद मजेदार कहानियाँ | Shikshaprad Majedar Kahaniya | Funny Stories With Moral In Hindi 

Shikshaprad Majedar Kahaniya 

Shikshaprad Majedar Kahaniya 

1. बाघ गधा और घास की कहानी

एक दिन की बात है। एक गधा हरे भरे मैदान से घास चरकर लौट रहा था। उसकी मुलाकात बाघ से हो गई। बाघ ने पूछा, “क्यों गधे! हरी हरी घास चर कर आ रहे हो।”

गधा तुनक कर बोला, “घास हरी नहीं नीली होती है।”

“क्या कह रहे हो गधे? घास हरी होती है।” बाघ बिगड़कर बोला।

दोनों में बहस होने लगी। कोई अपनी बात से पीछे हटने को तैयार नहीं था। काफ़ी देर बहस करने के बाद भी परिणाम न निकलता देख कर बाघ बोला, “ऐसा करते हैं जंगल के राजा शेर के पास चलते हैं। वही फैसला करेंगे कि हम दोनों में से कौन सही है और कौन गलत।”

गधा राज़ी हो गया। दोनों शेर के पास पहुंचे। शेर उस समय खा पीकर सोने की तैयारी में था। दोनों को अपने पास आया देखकर शेर ने पूछा, “क्या बात है? इस समय कैसे आना हुआ? और वो भी एक साथ!”

बाघ के कुछ कहने के पहले गधा बोल पड़ा, “वनराज! बाघ कहता है घास हरी होती है, मैं कहता हूं नीली। अब आप ही फ़ैसला करें।”

शेर ने घूरकर बाघ को देखा। बाघ बोला, “वनराज! सब जानते हैं कि घास हरी होती है। ये गधा मूर्ख है।”

शेर बोला, “मूर्ख तुम हो। गधे तुम जाओ। मैं बाघ को एक साल तक मौन रहने की सज़ा देता हूं।”

खुश होकर गधा लौट गया।

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दुखी बाघ बोला, “वनराज! घास हरी ही होती है। फिर भी आपने मुझे सज़ा दी।”

शेर बोला, “मैंने तुम्हें इसलिए सज़ा नहीं दी कि घास हरी होती है या नीली। घास तो हरी ही होती है। किसी के नीला कह देने से वो नीली नहीं हो जायेगी। गधा तो मूर्ख और कम अक्ल है। लेकिन तुम तो समझदार हो। फिर भी व्यर्थ की बात में उस मूर्ख से उलझकर अपना समय बर्बाद किया। उसके बाद वो व्यर्थ की बहस मेरे पास लाकर मेरा समय बर्बाद किया। ये सज़ा इसलिए है।”

बाघ ने कान पकड़े कि अब वह मूर्खों के साथ व्यर्थ की बहस में कभी नहीं उलझेगा।

सीख 

मूर्खों के साथ व्यर्थ की बहस में उलझना मूर्खता है।

 2. शेर की खाल में गधा मजेदार कहानी 

एक गाँव में शुद्धपट नामक धोबी रहता था. उसके पास एक गधा था. वह गधे से दिन भर बोझ लदवाता था. परन्तु, निर्धनता के कारण उसके खाने-पीने की व्यवस्था नहीं कर पाता था. गधा इधर-उधर घास चरकर अपना पेट भरा करता था.

एक दिन जंगल में धोबी को एक मरे हुए शेर की खाल मिली. उसे देख धोबी ने सोचा कि यदि मैं यह खाल अपने गधे को ओढ़ा दूं, तो लोग इसे शेर समझकर डरेंगे और इसे नहीं भगायेंगे. इस प्रकार यह बिना किसी बाधा के आराम से किसी के भी खेत में घास चर सकेगा.   

उसने शेर की खाल उठा ली. उसके बाद से हर रात वह अपने गधे को शेर की खाल ओढ़ाकर गाँव के खेत में छोड़ने लगा. शेर की खाल में गधे को लोग शेर समझते और डर के मारे उससे दूर भागते थे. गधा मज़े से रात पर खेत में घास चरकर सुबह घर आ जाता था. गधा भी ख़ुश था और धोबी भी. दोनों के दिन बड़े मज़े से बीत रहे थे. 

एक रात गधा हमेशा की तरह शेर की खाल ओढ़कर एक खेत में घास चरने घुसा. वह मज़े से घास चर रहा था कि कहीं से उसे किसी अन्य गधे के रेंकने की आवाज़ सुनाई पड़ी. उसका मन भी रेंकने को मचल उठा और सब कुछ भूलकर वह रेंकने में रम गया.

उसका रेंकना सुन खेत का मालिक सारी बात समझ गया. फिर उसने गधे को इतना पीटा कि वह मर ही गया. इस प्रकार धूर्त आचरण के कारण गधे को अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ा और धोबी को अपने गधे से.

सीख 

बाह्य वेश बदल लेने से किसी का मूल स्वभाव नहीं बदल जाता.

 3. लोमड़ी और बीमार शेर की कहानी 

जंगल का राजा शेर बूढ़ा हो चला था. उसकी शक्ति क्षीण हो गई थी. उसमें इतना बल शेष नहीं था कि जंगल में जाकर शिकार कर सके. इस स्थिति में उसके समक्ष भूखे मरने की नौबत आ गई थी.

एक दिन अपनी गुफ़ा में बैठा भूखा शेर (Lion) सोचने लगा कि यदि यही स्थिति रही, तो उसकी मृत्यु निकट है. उसे कोई न कोई उपाय सोचना होगा, ताकि बैठे-बिठाये ही भोजन की व्यवस्था हो जाये. वह सोचने लगा और कुछ ही देर में उसे एक उपाय सूझ गया.

एक चिड़िया की सहायता से उसने पूरे जंगल में अपने बीमार होने की खबर फैला दी. जंगल के राजा शेर के बीमार होने की ख़बर सुनकर जंगल के जानवर उसका हाल-चाल पूछने उसके पास पहुँचने लगे. शेर इसी ताक में था. जैसे ही कोई जानवर उससे मिलने गुफ़ा में प्रवेश करता, वह उसे दबोच कर मार डालता और छककर उसका मांस खाता.

हर दिन कोई न कोई जानवर उसे देखने आता रहता और शेर को गुफ़ा में ही शिकार हाथ लग जाता. उसके दिन बड़े आराम से गुजरने लगे. अब उसे भोजन के लिए जंगल में भटकने की आवश्यकता नहीं रह गई थी. बिना मेहनत के उसे अपनी ही गुफ़ा में भरपेट भोजन मिलने लगा था. कुछ ही दिनों में वह अच्छा मोटा हो गया.

एक सुबह एक लोमड़ी उसे देखने आई. लोमड़ी चालाक थी. वह गुफ़ा के अंदर नहीं गई, बल्कि गुफ़ा के द्वार पर खड़ी हो गई. वहीं से उसने शेर से पूछा, “वनराज! आपकी तबियत कैसी है? क्या अब आप अच्छा महसूस कर रहे हैं?”

“कौन हो मित्र? अंदर तो आओ. मैं बीमार बूढ़ा शेर बाहर तक तुमसे मिलने नहीं आ सकता. मेरी दृष्टि भी कमज़ोर है. मैं तुम्हें यहाँ से ठीक से देख भी नहीं सकता. आओ मेरे पास आओ. मुझसे आखिरी बार मिल लो. मैं कुछ ही दिनों का मेहमान हूँ.” शेर ने फ़ुसलाकर लोमड़ी को गुफ़ा के अंदर बुलाने का प्रयत्न किया.

शेर के बोलते समय लोमड़ी बड़े ही ध्यान से गुफ़ा के आस-पास का नज़ारा ले रही थी. शेर की बात ख़त्म होते ही वह बोली, “वनराज! मुझे क्षमा करें. मैं अंदर नहीं आ सकती. आपकी गुफ़ा में अंदर जाते हुए जानवरों के पैरों के निशान तो हैं, किंतु बाहर आते हुए नहीं. इसका अर्थ मैं समझ गई हूँ. सब कुछ जानते-बूझते हुए भी यदि मैं अंदर आ गई, तो उस जानवरों की तरह मारी जाऊंगी, जिनके पैरों के ये निशान हैं. इसलिए मैं जा रही हूँ.”

लोमड़ी ने जंगल में जाकर बूढ़े शेर की करतूत सभी जानवरों को बता दी. उसके बाद कोई भी जानवर शेर से मिलने नहीं गया. इस तरह अपनी बुद्धिमानी से लोमड़ी ने न सिर्फ़ अपनी जान बचाई, बल्कि जंगल के अन्य जानवरों को भी शेर के हाथों मरने से बचा लिया.

सीख 

बुद्धिमान व्यक्ति दूसरों की गलतियों से सबक लेते हैं.

4. दो बिल्लियों और बंदर की कहानी 

दो बिल्लियों की आपस में अच्छी दोस्ती थी. वे सारा दिन एक-दूसरे के साथ खेलती, ढेर सारी बातें करती और साथ ही भोजन की तलाश करती थी.

एक दिन दोनों भोजन की तलाश में निकली. बहुत देर इधर-उधर भटकने के बाद उनकी नज़र रास्ते पर पड़ी एक रोटी पर पड़ी. एक बिल्ली ने झट से रोटी उठा ली और मुँह में डालने लगी.

तब दूसरी बिल्ली उसे टोककर बोली, “अरे, तुम अकेले कैसे इस रोटी को खा रही हो? हम दोनों ने साथ में इस रोटी को देखा था. इसलिए हमें इसे बांटकर खाना चाहिए.”

पहली बिल्ली ने रोटी तोड़कर दूसरी बिल्ली को दिया, लेकिन वह टुकड़ा छोटा था. यह देख उसे बुरा लगा और वह बोली, “अरे, ये टुकड़ा तो छोटा है. तुम्हें रोटी के बराबर टुकड़े करने चाहिए थे. तुम मेरे साथ बेइमानी कर रही हो.“

इस बात पर दोनों में बहस होने लगी. बहस इतनी बढ़ी कि दोनों लड़ने लगी. उसी समय वहाँ से एक बंदर गुजरा. उन्हें लड़ते हुए देख उसने कारण पूछा. बिल्लियों ने उसे सब कुछ बता दिया.

सारी बात जानकर बंदर बोला, “अरे इतनी सी बात पर तुम दोनों झगड़ रही हो. मेरे पास एक तराजू है. यदि तुम दोनों चाहो, तो मैं ये रोटी तुम दोनों में बराबर-बराबर सकता हूँ.”

बिल्लियाँ तैयार हो गई. बंदर एक तराजू लेकर आ गया. उसने बिल्लियों से रोटी ली और उसे तोड़कर तराजू ने दोनों पलड़े पर रखकर तौलने लगा. भूखी बिल्लियाँ उसे आस भरी नज़रों से देखने लगी.

तराजू के पलड़े पर रखी रोटी के टुकड़े में से एक टुकड़ा बड़ा और एक टुकड़ा छोटा था, जिससे पलड़ा एक तरफ़ झुक गया. तब बंदर बोला, “अरे ये क्या एक टुकड़ा दूसरे से बड़ा है. चलो मैं इसे बराबर कर देता हूँ.” उसने रोटी के बड़े टुकड़े को थोड़ा सा तोड़ा और अपने मुँह में डाल लिया.

अब दूसरा टुकड़ा पहले से बड़ा हो गया. बंदर ने अब उसे थोड़ा सा तोड़ा और अपने मुँह में डाल लिया. फिर तो यही सिलसिला चल पड़ा. रोटी को जो टुकड़ा बड़ा होता, वो बराबर करने बंदर उसे तोड़कर खा जाता.

ऐसा करते-करते रोटी के बहुत छोटे-छोटे टुकड़े रह गये. अब बिल्लियाँ घबरा गई. उन्हें लगने लगा कि ऐसे में तो उनके हिस्से कुछ भी नहीं आयेगा. वे बोली, “बंदर भाई, तुम भी क्या परेशान होते हो. लाओ अब हम इसे ख़ुद ही आपस में बांट लेंगी.”

बंदर बोला, “ठीक है. लेकिन अब तक जो मैंने मेहनत की है, उसका मेहताना तो लगेगा ना. इसलिए रोटी के ये टुकड़े मेरे.” और उसने रोटी के शेष टुकड़े अपने मुँह में डाल लिए और चलता बना.

बिल्लियाँ उसे देखती रह गई. उन्हें अपनी गलती का अहसास हो चुका था. वे समझ गई कि उनकी आपसी फूट का लाभ उठाकर बंदर उन्हें मूर्ख बना गया. उसी समय उन्होंने निर्णय लिया कि अब कभी झगड़ा नहीं करेंगी और प्रेम से रहेंगी.

सीख  

मिलजुलकर रहे. अन्यथा, आपसी फूट का फ़ायदा कोई तीसरा उठा लेगा.

5बंदर और डॉल्फिन की कहानी 

एक बार कुछ समुद्री नाविक एक बड़े जहाज में समुद्री यात्रा पर निकले. उनमें से एक नाविक के पास एक पालतू बंदर था. उसने उसे भी अपने साथ जहाज पर रख लिया.

यात्रा प्रारंभ हुई. जहाज कुछ दिन की यात्रा के बाद समुद्र के बीचों-बीच पहुँच गया. गंतव्य तक पहुँचने के लिए नाविकों को अभी भी कई दिनों की यात्रा करनी थी.

इतने दिनों तक मौसम नाविकों के लिए अच्छा रहा था. लेकिन एक दिन समुद्र में भयंकर तूफ़ान आ गया. तूफ़ान इतना तेज था कि नाविकों का जहाज टूट गया. नाविकों के जहाज को बचाने की बहुत कोशिश की, लेकिन अंततः जहाज पलट गया.

नाविक अपनी जान बचाने के लिए समुद्र में तैरने लगे. बंदर भी पानी में जा गिरा था. उसे तैरना नहीं आता था. वह डूबने लगा और उसे अपनी मौत सामने नज़र आने लगी. वह अपनी जान बचने के लिए चीख-पुकार मचाने लगा.

उसी समय एक डॉल्फिन वहाँ से गुजरी. उसने बंदर को डूबते हुए देखा, तो उसके पास गई और उसे अपनी पीठ में बिठा लिया. वह बंदर को लेकर एक द्वीप की ओर तैरने लगी. द्वीप पर पहुँचकर डॉल्फिन ने बंदर को अपनी पीठ से उतारा. बंदर की जान में जान आई.

डॉल्फिन ने बंदर से पूछा, “क्या तुम इस स्थान को जानते हो?”

“हाँ बिल्कुल. यहाँ का राजा तो मेरा बहुत अच्छा मित्र है. और तुम जानती हो कि मैं भी एक राजकुमार हूँ.” बंदर की आदत बढ़ा-चढ़ाकर बात करने के थी. वह डॉल्फिन के सामने बड़ी-बड़ी बातें करने लगा.

डॉल्फिन समझ गई कि बंदर अपनी शान बघारने के लिए झूठ बोल रहा है, क्योंकि वह एक निर्जन द्वीप था, जहाँ कोई भी नहीं रहता था।

वह बंदर की बात का उत्तर देती हुई बोली, “ओह! तो तुम एक राजकुमार हो. बहुत अच्छी बात है. लेकिन क्या तुम्हें पता है कि बहुत जल्द तुम इस द्वीप के राजा बनने वाले हो.”

“राजा और मैं? कैसे?” बंदर ने आश्चर्य से पूछा.

“वो इसलिए कि तुम द्वीप पर एकलौते प्राणी हो. इसलिए बड़े आराम से यहाँ के राजा बन सकते हो. मैं जा रही हूँ. अब तुम अपना राज-पाट संभालो.” इतना कहकर डॉल्फिन तैरकर वहाँ से दूर जाने लगी.

बंदर पुकारता रह गया और उसने झूठ और शेखी से नाराज़ डॉल्फिन उसे वहीं छोड़कर चली गई.

सीख 

व्यर्थ की शेखी बघारना मुसीबत को बुलावा देना है.

6.  संगीतमय गधा की मज़ेदार कहानी

गाँव में रहने वाले एक धोबी के पास उद्धत नामक एक गधा था. धोबी गधे से काम तो दिन भर लेता, किंतु खाने को कुछ नहीं देता था. हाँ, रात्रि के पहर वह उसे खुला अवश्य छोड़ देता था, ताकि इधर-उधर घूमकर वह कुछ खा सके. गधा रात भर खाने की तलाश में भटकता रहता और धोबी की मार के डर से सुबह-सुबह घर वापस आ जाया करता था.  

एक रात खाने के लिए भटकते-भटकते गधे की भेंट एक सियार से हो गई. सियार ने गधे से पूछा, “मित्र! इतनी रात गए कहाँ भटक रहे हो?”

सियार के इस प्रश्न पर गधा उदास हो गया. उसने सियार को अपने व्यथा सुनाई, “मित्र! मैं  दिन भर अपनी पीठ पर कपड़े लादकर घूमता हूँ. दिन भर की मेहनत के बाद भी धोबी मुझे खाने को कुछ नहीं देता. इसलिए मैं रात में खाने की तलाश में निकलता हूँ. आज मेरी किस्मत ख़राब है. मुझे खाने को कुछ भी नसीब नहीं हुआ. मैं इस जीवन से तंग आ चुका हूँ.”

गधे की व्यथा सुनकर सियार को तरस आ गया. वह उसे सब्जियों के एक खेत में ले गया. ढेर सारी सब्जियाँ देखकर गधा बहुत ख़ुश हुआ. उसने वहाँ पेट भर कर सब्जियाँ खाई और सियार को धन्यवाद देकर वापस धोबी के पास आ गया. उस दिन के बाद से गधा और सियार रात में  सब्जियों के उस खेत में मिलने लगे. गधा छककर ककड़ी, गोभी, मूली, शलजम जैसी कई सब्जियों का स्वाद लेता. धीरे-धीरे उसका शरीर भरने लगा और वह मोटा-ताज़ा हो गया. अब वह अपना दुःख भूलकर मज़े में रहने लगा.

एक रात पेट भर सब्जियाँ खाने के बाद गधे मदमस्त हो गया. वह स्वयं को संगीत का बहुत बड़ा ज्ञाता समझता था. उसका मन गाना गाने मचल उठा. उसने सियार से कहा, “मित्र! आज मैं बहुत ख़ुश हूँ. इस खुशी को मैं गाना गाकर व्यक्त करना चाहता हूँ. तुम बताओ कि मैं कौन सा आलाप लूं?”

गधे की बात सुनकर सियार बोला, “मित्र! क्या तुम भूल गए कि हम यहाँ चोरी-छुपे घुसे हैं. तुम्हारी आवाज़ बहुत कर्कश है. यह आवाज़ खेत के रखवाले ने सुन ली और वह यहाँ आ गया, तो हमारी खैर नहीं. बेमौत मारे जायेंगे. मेरी बात मानो, यहाँ से चलो.”

गधे को सियार की बात बुरी लग गई. वह मुँह बनाकर बोला, “तुम जंगल में रहने वाले जंगली हो. तुम्हें संगीत का क्या ज्ञान? मैं संगीत के सातों सुरों का ज्ञाता हूँ. तुम अज्ञानी मेरी आवाज़ को कर्कश कैसे कह सकते हो? मैं अभी सिद्ध करता हूँ कि मेरी आवाज़ कितनी मधुर है.”

सियार समझ गया कि गधे को समझाना असंभव है. वह बोला, “मुझे क्षमा कर दो मित्र. मैं तुम्हारे संगीत के ज्ञान को समझ नहीं पाया. तुम यहाँ गाना गाओ. मैं बाहर खड़ा होकर रखवाली करता हूँ. ख़तरा भांपकर मैं तुम्हें आगाह कर दूंगा.”

इतना कहकर सियार बाहर जाकर एक पेड़ के पीछे छुप गया. गधा खेत के बीचों-बीच खड़ा होकर अपनी कर्कश आवाज़ में रेंकने लगा. उसके रेंकने की आवाज़ जब खेत के रखवाले के कानों में पड़ी, तो वह भागा-भागा खेत की ओर आने लगा.

सियार ने जब उसे खेत की ओर आते देखा, तो गधे को चेताने का प्रयास किया. लेकिन रेंकने में मस्त गधे ने उस ओर ध्यान ही नहीं दिया. सियार क्या करता? वह अपनी जान बचाकर वहाँ से भाग गया. इधर खेत के रखवाले ने जब गधे को अपने खेत में रेंकते हुए देखा, तो उसे दबोचकर उसकी जमकर धुनाई की. गधे के संगीत का भूत उतर गया और वह पछताने लगा कि उसने अपने मित्र सियार की बात क्यों नहीं मानी.

सीख 

अपने अभिमान में मित्र के उचित परामर्श को न मानना संकट को बुलावा देना है.   

7. भेड़िया और सारस मज़ेदार कहानी

जंगल में एक दुष्ट और लालची भेड़िया रहता था. एक दिन उसने एक हिरण का शिकार किया. शिकार के बाद पर वह अपने लालच पर नियंत्रण नहीं रख पाया और जल्दी-जल्दी उसे खाने लगा. इस जल्दीबाज़ी में एक हड्डी उसके गले में अटक गई.

हड्डी अटक जाने पर वह बहुत परेशान हो गया. अब उससे न कुछ खाते बन रहा था, न ही पीते. उसने बहुत कोशिश की कि किसी तरह हड्डी उसके गले से निकल जाए. लेकिन सारी कोशिश बेकार गई.

अंत में उसने किसी से सहायता लेने का विचार किया. वह सोचने लगा कि ऐसा कौन हैं, जो उसके गले से हड्डी का टुकड़ा निकाल सकता है. कुछ देर सोचने पर उसे सारस का ध्यान आया. सारस की लंबी गर्दन और चोंच थी. वह उसके मुँह में अपनी चोंच घुसाकर आसानी से हड्डी निकाल सकता था.

बिना देर किये भेड़िया सारस के पास पहुँचा और बोला, “सारस भाई! मेरे गले में एक हड्डी अटक गई है. क्या तुम अपनी चोंच से वो हड्डी निकाल दोगे? मैं तुम्हारा बहुत अहसानमंद रहूंगा और तुम्हें उचित ईनाम भी दूंगा.”

सारस पहले तो भेड़िये के मुँह में अपनी चोंच डालने से डरा. लेकिन बाद वे उसे भेड़िये पर दया आ गया और वह तैयार हो गया.

भेड़िये मुँह खोलकर खड़ा हो गया और सारस ने उसमें अपनी चोंच डाल दी. लेकिन उसकी चोंच हड्डी तक नहीं पहुँच पाई. तब उसे अपनी आधी गर्दन भी भेड़िये के मुँह में घुसानी पड़ी. सारस की गर्दन मुँह में जाते ही लालची भेड़िये के मन में लालच जागने लगा. उस सोचने लगा कि यदि मैं इसकी लज़ीज़ गर्दन को चबा पाता, तो मज़ा आ जाता. लेकिन उस समय उसे अपने गले में फंसी हड्डी निकलवानी थी. इसलिए वह मन मारकर रह गया.

कुछ ही देर में सारस ने उसके गले से हड्डी निकाल दी. हड्डी निकलते ही भेड़िया जाने लगा. न उसने सारस को धन्यवाद दिया न ही ईनाम. सारस ने उसे रोककर कहा, “मेरा ईनाम कहाँ है? तुमने कहा था कि तुम इस काम के बदले मुझे ईनाम दोगे.”

भेड़िया बोला, “एक भेड़िये के मुँह में अपनी गर्दन डालकर भी तुम सही-सलामत हो, क्या यह तुम्हारा ईनाम नहीं हैं?”

इतना कहकर भेड़िया चला गया और सारस मुँह लटकाकर खड़ा रह गया.

सीख

लालची और दुष्ट व्यक्ति से कभी कृतज्ञता या पुरूस्कार की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए. 

8. राहगीर और बटुआ की कहानी

दो व्यक्ति एक साथ परदेश की यात्रा पर निकले। दोनों एक रास्ते से गुजर रहे थे कि रास्ते में उन्हें एक बटुआ पड़ा मिला। एक व्यक्ति ने बटुआ उठा लिया। बटुआ भारी था। भार के द्वारा अंदाजा लगाते हुए वह व्यक्ति बोला –

“मैं कितना खुशनसीब हूं कि मुझे रास्ते में ये बटुआ पड़ा मिला। इसके वजन से लग रहा है कि इसमें काफी पैसे होंगे।”

ये सुनकर दूसरा व्यक्ति तुनक कर बोला, “तुम अकेले कैसे खुशनसीब हुए। मैं भी तुम्हारे साथ हूं। हम साथ यात्रा पर निकले हैं। यात्रा के दौरान हमें जो भी वस्तु मिले, अच्छी या बुरी, उस पर हम दोनों का अधिकार है। इसलिए इस बटुए पर हम दोनों का अधिकार है।”

“बिल्कुल नहीं! इस बटुए को मैंने उठाया है और इसलिए इसमें जो भी है, उस पर सिर्फ और सिर्फ मेरा अधिकार है।” पहले व्यक्ति ने कहा।

दोनों में बहस होने लगी। तभी अचानक उन्हें कुछ लोगों की आवाज सुनाई पड़ी।

“वो रहा मेरा बटुआ। वहीं है चोर, जो मेरा बटुआ लेकर भाग रहे है।” 

दोनों ने पलटकर देखा। लट्ठ पकड़े लोगों की भीड़ उनकी तरफ आ रही थी। उन्हें देखकर पहला व्यक्ति डर गया और कहने लगा –

“अगर ये लोग हम तक पहुंच गए, तो बटुआ चुराने का इल्ज़ाम डालकर हम दोनों की पिटाई करेंगे और हमारा बटुआ छीन लेंगे। अब हम क्या करे।”

ये सुनकर दूसरा व्यक्ति बोला, “हमारा नहीं तुम्हारा बटुआ। भूल गए, अभी तो तुम कह रहे कि ये बटुआ तुमने उठाया है और इस पर सिर्फ तुम्हारा अधिकार है। इसलिए अब तुम ही भुगतो।”

ये कहकर वह व्यक्ति वहां से भाग गया। लट्ठ पकड़े लोगों ने आकर पहले व्यक्ति से बटुआ छीन लिया और उसकी धुनाई भी की।

सीख 

यदि हम किसी से अच्छे वक्त में कन्नी काटते हैं, तो बुरे वक्त में उससे किसी भी प्रकार की आशा नहीं रखनी चाहिए।

9. मूर्ख ज्योतिषी की मज़ेदार कहानी 

बहुत समय पहले की बात है. एक गाँव में एक ज्योतिषी रहा करता था. उसका विश्वास था कि वह तारों को देखकर भविष्य पढ़ सकता है. इसलिए वह सारी-सारी रात आसमान को ताकता रहता था. गाँव वालों के सामने भी वह अपनी इस विद्या के बारे में ढींगे हांका करता था.

एक शाम वह गाँव की कच्ची सड़क पर पैदल चलता हुआ अपने घर की ओर जा रहा है. उसकी नज़रें आसमान पर चमकते तारों पर जमी हुई थी. वह तारों को देखकर आने वाले समय में क्या छुपा है, यह पढ़ने की कोशिश कर रहा था. तभी अचानक उसका पैर कीचड़ से भरे एक गड्ढे पर पड़ा और वह गड्ढे में जा गिरा.

वह कीचड़ में लथपथ हो गया और किसी तरह गड्ढे से बाहर निकलने के लिए हाथ-पैर मारने लगा. लेकिन एड़ी-चोटी का जोर लगाने के बाद भी वह गड्ढे से बाहर नहीं निकल पाया. सारी कोशिश बेकार जाती देख वह सहायता के लिए चिल्लाने लगा.

उसकी चिल्लाने की आवाज़ सुन कुछ लोग दौड़े चले आये. उन्होंने उसे गड्ढे में गिरे देखा, तो समझ गए कि आदतवश वह आसमान में तारों को देखकर भविष्य को समझने लगा हुआ होगा और सड़क का गड्ढा उसने नहीं देखा होगा.

उन्होंने उसे बाहर निकाला और बोले, “तुम आसमान में तारों को देखकर भविष्य पढ़ते रहते हो और तुम्हें यही नहीं पता कि तुम्हारे पैरों तले क्या है? भविष्य की तलाश में मत भटको, जो सामने है, उस पर ध्यान दो. भविष्य अपना ख्याल खुद ही रख लेगा.

सीख

हमारा आज ही कल अर्थात् भविष्य का निर्माण करता है. इसलिए भविष्य की चिंता छोड़कर आज पर ध्यान केंद्रित कर कर्म करो. आज मन लगाकर कर्म करोगे, तो ये कर्म स्वतः भविष्य का निर्माण कर लेंगे.

10. कंजूस और उसका सोना शिक्षाप्रद कहानी

एक गाँव में एक अमीर जमींदार रहता था. वह जितना अमीर था, उतना ही कंजूस भी. अपने धन को सुरक्षित रखने का उसने एक अजीब तरीका निकाला था. वह धन से सोना खरीदता और फिर उस सोने को गलाकर उसके गोले बनाकर अपने एक खेत में एक पेड़ के नीचे गड्ढा खोदकर डाल देता था.

रोज़ खेत जाना और गड्ढे को खोदकर सोने के गोलों की गिनती करना उसकी दिनचर्या का हिस्सा था. इस तरह वह सुनिश्चित करता था कि उसका सोना सुरक्षित है.

एक दिन एक चोर ने कंजूस आदमी को गड्ढे में से सोना निकालकर गिनते हुए देख लिया. वह छुपकर उसके जाने का इंतज़ार करने लगा. जैसे ही कंजूस आदमी गया, वह गड्ढे के पास पहुँचा और उसमें से सोना निकालकर भाग गया.

अगले दिन जब कंजूस आदमी खेत में गड्ढे के पास पहुँचा, तो सारा सोना नदारत पाकर रोने-पीटने लगा. उसके रोने की आवाज़ वहाँ से गुजरते एक राहगीर के कानों में पड़ी, तो वह रुक गया.

उसने कंजूस आदमी से रोने का कारण पूछा, तो कंजूस आदमी बोला, “मैं लुट गया. बर्बाद हो गया. कोई मेरा सारा सोना लेकर भाग गया. अब मैं क्या करूंगा?”

“सोना? किसने चुराया? कब चुराया?” राहगीर आश्चर्य में पड़ गया.

“पता नहीं चोर ने कब इस गड्ढे को खोदा और सारा सोना लेकर नौ दो ग्यारह हो गया. मैं जब यहाँ पहुँचा, तो सारा सोना गायब था.” कंजूस आदमी बिलखते हुए बोला.

“गड्ढे से सोना ले गया? तुम अपना सोना यहाँ इस गड्ढे में क्यों रखते हो? अपने घर पर क्यों नहीं रखते? वहाँ ज़रूरत पड़ने पर तुम उसका आसानी से उपयोग कर सकते हो.” राहगीर बोला.

“मैं अपने सोने को कभी हाथ नहीं लगाता. मैं उसे सहेजकर रखता हूँ और हमेशा रखता, यदि वो चोर उसे चुराकर नहीं ले जाता.” कंजूस आदमी बोला.

यह बात सुनकर राहगीर ने जमीन से कुछ कंकड़ उठाये और उसे उस गड्ढे में डालकर बोला, “यदि ऐसी बात है, तो इन कंकडों को गड्ढे में डालकर गड्ढे को मिट्टी ढक दो और कल्पना करो कि यही तुम्हारा सोना है, क्योंकि इनमें और तुम्हारे सोने में कोई अंतर नहीं है. ये भी किसी काम के नहीं और तुम्हारा सोना भी किसी काम का नहीं था. उस सोने का तुमने कभी कोई उपयोग ही नहीं किया, न ही करने वाले थे. उसका होना न होना बराबर था.”

सीख 

जिस धन का कोई उपयोग न हो, उसकी कोई मोल नहीं.

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