सुनहरा हंस – जातक कथा | The Golden Swan Story In Hindi Jatak Tales

फ्रेंड्स, इस पोस्ट में हम  सोने का हंस – जातक कथा (Sunehra Hans Ki Kahani Jatak Katha) शेयर कर रहे है. यह कहानी एक ऐसे व्यक्ति की है, हो मरने के बाद अगले जन्म में सोने का हंस बन जाता है. जब वह अपने पिछले जन्म के परिवार से मिलने जाता है, तब क्या स्थिति उत्पन्न होती है? जानने के लिए पढ़िये The Golden Swan Story In Hindi Jatak Tales

Sunehra Hans Ki Kahani – Jatak Katha

Sunehra Hans Ki Kahani
Sunehra Hans Ki Kahani

एक शीलवान पुरुष अपनी पत्नी और तीन पुत्रियों के साथ वाराणसी नगर में निवास करता था. गृहस्थी के संचालन का संपूर्ण भार उसके कंधों पर था, जिसे वह पूर्ण कर्त्तव्य-परायणता के साथ निभा रहा था. किंतु, अल्पआयु में ही उसका देहांत हो गया.

मरणोपरांत उसका पुनर्जन्म एक स्वर्ण हंस के रूप में हुआ. स्वर्ण हंस के रूप में भी उसमें मनुष्य योनि की समस्त स्मृतियाँ थीं. वह प्रायः उन स्मृतियों में डूबा रहता और अपने पुनर्जन्म की पत्नी और पुत्रियों को स्मरण किया करता था. धीरे-धीरे उसका पिछले जन्म के अपने परिवार के प्रति मोह इतना प्रबल हो गया कि उसका वर्तमान प्रभावित होने लगा.

एक दिन उसने अपने परिवार से मिलने का निश्चय किया. वह उड़ते हुए वाराणसी पहुँचा और अपने घर पहुँचकर एक वृक्ष की शाखा पर बैठकर अपनी पत्नी और पुत्रियों को देखने लगा.

उन्हें देख उसका ह्रदय व्यथित हो गया, क्योंकि उनकी दशा अब पूर्व सी न रह गई थी. उसके जीवित रहते घर में जो वैभव था, वह कहीं भी दृष्टिगत न होता था. उसकी पत्नी और पुत्रियाँ दरिद्रता का जीवन यापन कर रही थी. वे मलिन और फटे वस्त्र धारण किये हुए थी और उनके चेहरे की कांति खो गई थी.

उनकी अवस्था देश हंस दुखी हो गया. वह घर के अंदर गया और अपनी पत्नी और पुत्रियों से मिलकर उन्हें अपना परिचय दिया. कुछ समय उनके साथ व्यतीत करने के उपरांत जब वह लौटने लगा, तब उसने अपना सोने का पंख तोड़ा, और उसयूसे अपनी पत्नी को सौंप वापस उड़ चला.

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उस स्वर्ण पंख को बेच उसकी पत्नी ने धन की व्यवस्था की. उसके उपरांत स्वर्ण हंस समय-समय पर अपन परिवार से मिलने आता और वापस जाते समय उन्हें एक स्वर्ण पंख दे आता. अब उसके परिवार का खर्च सुचारू रूप से चलने लगा.

हंस प्रसन्न था कि अब उसके परिवार का जीवन दरिद्रतामय नहीं रहा. किन्तु वह अपनी लोभी पत्नी के मनोभावों से परिचित नहीं था, जिसे हंस रुपी पति से कोई लगाव नहीं था. वह विचार करने लगी थी कि यदि मैं इस स्वर्ण हंस के सारे पंख नोच लूं, तो उन्हें बेचकर एक बार में ही धनी हो सकती हूँ और संपूर्ण जीवन आराम से व्यतीत कर सकती हूँ.

जब उसने अपने मन की बात अपनी पुत्रियों को बताई, तो वे क्रोधित हो गई और अपनी माँ को ऐसा करने से मना किया. उस समय तो उनकी माँ कुछ नहीं बोली, मगर उसका इरादा अटल था.

अगली बार हंस जिस समय अपने घर आया, तो संयोगवश उस समय उसकी पुत्रियाँ घर पर नहीं थी. वृक्ष कर बैठकर वह अपनी पत्नी से बातें करना लगा. वह अपनी पत्नी के मनोभावों से अनभिज्ञ था, जो उसके सारे पंखों को नोचने का विचार कर रही थी.

उसने हंस को पुचकारते हुए अपने पास बुलाया, हंस प्रसन्नतापूर्वक उसके पास चला गया. हंस के पास आते ही पत्नी ने उसकी गर्दन पकड़ ली और उसके सारे पंख नोचने लगी. हंस दर्द से छटपटाता हुआ चीत्कार करता रहा, किंतु वह लोभ में इतनी अंधी हो चुकी थी कि उसे उस पर दया नहीं आई और उसने उसके सारे पंख नोंचकर उसे एक किनारे फेंक दिया.

हंस दर्द से तड़पता एक किनारे पड़ा रहा और वह उनसे पंखों को समेटती रही. किंतु आश्चर्य की बात थी कि जैसे ही वो उन पंखों को हाथ लगाती, वो साधारण पंखों में परिवर्तित हो जाते. यथार्थ में, स्वर्ण हंसों की इच्छा के विरुद्ध प्राप्त किये गए पंख सोने के नहीं रह जाते थे. इस तरह धनी होने की उसकी लालसा पूर्ण नहीं हो पाई.

कुछ देर बाद हंस की पुत्रियाँ घर लौटी और रक्त-रंजित हंस को देख अपनी माता की कारस्तानी समझ गई. उन्होंने हंस को उठाया, तो उसे जीवित पाया. उन्होंने उसे सेवा-सुश्रुषा प्रारंभ की. कुछ ही दिनों में हंस स्वस्थ हो गया. उसके पंख पुनः उग आये, किंतु इस बार वे स्वर्ण पंख न होकर साधारण पंख थे.

उड़ने में समर्थ होते ही वह वहाँ से उड़ गया और कभी वाराणसी लौटकर नहीं आया.  

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