ब्राह्मण और सर्प की कथा : पंचतंत्र ~ ककोलूकियम | The Brahmin And The Cobra Story In Hindi

फ्रेंड्स, इस पोस्ट में हम ब्राह्मण और सर्प की कथा (The Brahmin And The Cobra Story In Hindi) शेयर कर रहे हैं. पंचतंत्र के तंत्र (भाग) ककोलूकियम से ली गई यह कहानी ब्राह्मण और उसे प्रतिदिन स्वर्ण मुद्रा प्रदान करने वाले सर्प की है. क्या ब्राह्मण जीवन भर स्वर्ण मुद्रा पाता रहता है? जानने के लिए पढ़िए पूरी कहानी (Brahmin And Snake Story In Hindi):

The Brahmin And The Cobra Story In Hindi

The Brahmin And The Cobra Story In Hindi
The Brahmin And The Cobra Story In Hindi

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बहुत समय पहले की बात है. एक गाँव में हरिदत्त नामक एक ब्राह्मण रहता था. गाँव के बाहर उसका एक छोटा सा खेत था, जहाँ खेती कर वह जीवन यापन हेतु थोड़ा-बहुत धन अर्जित कर लेता था.

ग्रीष्म ऋतु थी. वह अपने खेत में एक वृक्ष की छाया में लेटा सुस्ता रहा था. अनायास ही उसकी दृष्टि वृक्ष के नीचे बने बिल से बाहर निकले सर्प पर पड़ी.

सर्प को देखकर ब्राह्मण के मन में विचार आया कि संभवतः ये सर्प मेरे क्षेत्र देवता हैं. मुझे इनकी पूजा करनी चाहिए. हो सकता है ये मुझे उसका उत्तम प्रतिदान दे.

वह तत्काल उठा और गाँव जाकर एक मिट्टी के कटोरे में दूध ले आया. उसने वह कटोरा सर्प के बिल के बाहर रखा और बोला, “हे सर्पदेव! अब तक मैंने आपकी पूजा अर्चना नहीं की, क्योंकि मुझे आपके विषय में ज्ञात नहीं था. आप मुझे इस धृष्टता के लिए क्षमा करें. अब से मैं प्रतिदिन आपको पूजा करूंगा. मुझ पर कृपा करें और मेरा जीवन समृद्ध करें.”

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फिर वह घर लौट आया. अगले दिन खेत पहुँचकर वह कटोरा उठाने सर्प के बिल के पास गया. उसने देखा कि उस कटोरे में एक स्वर्ण मुद्रा रखी हुई है. सर्पदेव का आशीर्वाद समझकर उसने वह स्वर्ण मुद्रा उठा ली.

उस दिन भी वह सर्प के लिए मिट्टी के कटोरे में दूध रखकर चला गया. अगले दिन उसे पुनः एक स्वर्ण मुद्रा प्राप्त हुई. तब से वह नित्य-प्रतिदिन सर्पदेव के लिए दूध रखने लगा और उसे प्रतिदिन स्वर्ण मुद्रा मिलने लगी.

एक बार उसे किसी कार्य से दूसरे गाँव जाना पड़ा. इसलिए उसने अपने पुत्र को खेत में वृक्ष के नीचे बने बिल के पास मिट्टी के कटोरे में दूध रखने का कार्य सौंपा और दूसरे गाँव की यात्रा के लिए निकल पड़ा.

उसका पुत्र आज्ञानुसार दूध का कटोरा सर्प के बिल के सामने रखकर घर चला आया. अगले दिन जब वह पुनः दूध रखने गया, तो कटोरे में स्वर्ण मुद्रा देख  चकित रह गया. स्वर्ण मुद्रा देख उसके मन में लोभ आ गया और वह सोचने लगा कि अवश्य इस बिल के भीतर स्वर्ण कलश है. क्यों न मैं इसे खोदकर समस्त स्वर्ण मुद्राएं एक साथ प्राप्त कर धनवान हो जाऊं.

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किंतु, उसे सर्प का डर था. सर्प के जीवित रहते स्वर्ण कलश प्राप्त करना असंभव होगा, यह सोचकर वह उस दिन तो वापस चला गया. किंतु, अगले दिन जब वह वह सर्प के लिए दूध लेकर आया, तो साथ में लाठी भी ले गया.

दूध का कटोरा बिल के सामने रखने के थोड़ी देर बाद जब सर्प दूध पीने बाहर निकला, तो उसने उस पर लाठी से प्रहार किया. सर्प लाठी के प्रहार से बच गया. किंतु, क्रुद्ध हो गया और फन फ़ैलाकर ब्राह्मण के पुत्र को डस लिया. कुछ ही देर में विष के प्रभाव से ब्राह्मण के पुत्र की मृत्यु हो गई.

इस तरह लोभ के कारण ब्राह्मण पुत्र को अपने प्राणों से हाथ धोने पड़े.

सीख (Moral Of The Story) 

लोभ का दुष्परिणाम भोगना पड़ता है. इसलिए कभी लोभ न करें.


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