ब्राह्मण का स्वप्न : अकबर बीरबल की कहानी | The Brahmin’s Dream Akbar Birbal Story In Hindi

फ्रेंड्स, इस पोस्ट में हम अकबर बीरबल की कहानी “ब्राह्मण का स्वप्न” (The Brahmin’s Dream Akbar Birbal Story In Hindi) शेयर कर रहे हैं. ये कहानी एक गरीब ब्राह्मण की है. एक रात वो एक सपना देखता है, जिसमें वह अपने एक मित्र से सौ रुपये उधार लेता है. इस सपने के बारे में जब उसके उस मित्र को पता चलता है, तो वह उसे रुपये लौटने के लिए परेशान करने लगता है. दोनों का विवाद बादशाह अकबर के पास पहुँचता है और वे इसका निपटरा करने की ज़िम्मेदारी बीरबल के कंधों पर डाल देते हैं. बीरबल कैसे ब्राह्मण को न्याय दिलवाता है? यही इस कहानी में बताया गया है. पढ़िए पूरी कहानी (Brahmin Ka Sapna Akbar Birbal Ki Kahani) :   

The Brahmin’s Dream Akbar Birbal Story 

The Brahmin's Dream Akbar Birbal Story In Hindi
Brahmin’s Dream Akbar Birbal Story In Hindi | Brahmin’s Dream Akbar Birbal Story In Hindi

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एक रात एक ब्राह्मण ने स्वप्न देखा कि उसे उसके मित्र ने सौ रुपये उधार दिए हैं. प्रातः नींद खुलने पर वह उस स्वप्न के बारे में सोचने लगा. वह सोचने लगा कि इस स्वप्न का अच्छा या बुरा फ़ल क्या होगा?

बाद में उसने अपने मित्रों और करीबियों को स्वप्न के बारे में बताया. धीरे-धीरे यह ख़बर फ़ैल गई. जब इस संबंध में उस मित्र को ज्ञात हुआ, जिससे ब्राह्मण को स्वप्न में रुपये मिले थे, तो उसके मन में लालच उत्पन्न हो गया. उसने सोचा कि किसी तरह ब्राह्मण से रूपये ऐंठना चाहिए.

वह फ़ौरन ब्राहमण के पास पहुँचा और उससे वह सौ रुपये मांगने लगा, जो उसने उसे स्वप्न में दिए थे. पहले तो ब्राह्मण को लगा कि उसका मित्र उससे हँसी-ठिठोली कर रहा है. किंतु, जब वह बार-बार गंभीरतापूर्वक अपने पैसे मांगने लगा, तो ब्राह्मण बोला, “मित्र! वो रुपये तो मैंने तुमसे स्वप्न में लिय थे. यथार्थ में नहीं.”

“चाहे कहीं भी लिए हों, सच यह है कि तुमने आवश्यकता पड़ने पर मुझसे रुपये लिए थे. अब मुझे आवश्यकता है. इसलिए तुम मुझे वो रुपये वापस कर दो.” मित्र क्रोधित होकर बोला.

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ब्राह्मण बेचारा दिन भर परिश्रम करके किसी तरह अपना गुज़ारा चलाता था. उसके पास फूटी कौड़ी भी नहीं थी. वह कहाँ से सौ रुपये देता? उसने मना किया, तो दगाबाज़ मित्र हाथा-पाई पर उतर आया.

ब्राह्मण क्या करता? रूपये देना उसके सामर्थ्य से बाहर था. वह भी डटकर खड़ा हो गया. दगाबाज़ मित्र को आशा थी कि ब्राह्मण उसे रुपये दे देगा. किंतु, जब उसे अपनी दाल गलती दिखाई नहीं दी, तो वह ब्राह्मण को यह धमकी देकर चला गया कि मैं तुझसे रुपये ज़रूर वसूल करूंगा और गवाही में उन लोगों को उपस्थित करूंगा, जिसके सामने तुमने रुपया पाना स्वीकार किया है.

अगले दिन दगाबाज़ मित्र ने ब्राह्मण पर उधार रुपया लेने का अभियोग लगा कर न्यायधीश के समक्ष न्याय की गुहार लगाई. न्यायधीश ने दोनों पक्षों की बात सुनी, किंतु कोई निर्णय न ले सके. सोच-विचार कर न्यायाधीश ने यह मामला बादशाह अकबर के पास भेज दिया.

अकबर ने मामले पर अच्छी तरह गौर किया. यह जानते हुए भी कि मित्र सरासर दगाबाज़ी कर रहा है. अकबर को मामले के निबटान की कोई तरकीब न सूझी. आखिरकार, उन्होंने बीरबल को बुलवाया. उसे सब मामला समझा दिया कि बेचारे ब्राह्मण को उसका दगाबाज़ मित्र ठगना चाहता है. इसका न्याय ऐसा होना चाहिए कि दूध का दूध और पानी का पानी हो जाये.

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अकबर का आदेश पाकर बीरबल ने यह मामला अपने हाथ में ले लिया. मामले को सुलझाने के लिए उसने एक बड़ा सा दर्पण मंगवाया. उसके बाद उसने दर्पण को इस तरह रखवाया कि उसमें रुपये की छाया दिखाई पड़े. अब दगाबाज़ मित्र को रुपये की छाया दिखने लगी, तो बीरबल बोला, “जाओ उस दर्पण में से रुपये ले लो.”

दगाबाज़ मित्र अचंभा जाहिर करते हुए बोला, “वह मैं कैसे ले सकता है? वह तो रुपये की परछाई है.’

बीरबल बोले, “ब्राह्मण ने भी तो स्वप्न में तुमसे रूपया पाया था. वह भी तो परछाई ही थी. फ़िर तुम असली रुपया क्यों चाहते हो?”

दगाबाज़ मित्र की गर्दन झुक गई. उसे कोई जवाब देते न बना. लाचार होकर वह खाली हाथ ही वहाँ से जाने लगा, तो बीरबल बोला, “तुमने आज ब्राह्मण को व्यर्थ में परेशान किया है. उसके काम में रुकावट डाली है. अतः बिना सजा पाए तुम यहाँ से नहीं जा सकते. तुम्हें जुर्माने में सौ रुपये ब्राह्मण को देने पड़ेंगे.”

दगाबाज़ मित्र को मजबूरन सौ रुपये गरीब ब्राह्मण को हर्जाने के रूप में देने पड़े. इस तरह उसे अपनी करनी का फ़ल भोगना पड़ा. ब्राह्मण हँसी-ख़ुशी अपने घर वापस आ गया.


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