चार पढ़े-लिखे मूर्ख : पंचतंत्र की कहानी ~ अपरीक्षितकारक | The Four Learned Fool Panchatantra Story In Hindi

फ्रेंड्स, इस पोस्ट में हम पंचतंत्र की कहानी ‘चार पढ़े-लिखे मूर्ख’  (The Four Learned Fool Story In Hindi) शेयर कर रहे हैं. यह कहानी पंचतंत्र के अंतिम तंत्र (भाग) अपरीक्षितकारक से ली गई है. यह कहानी चार ऐसे ब्राह्मणों किन्ही, जो शास्त्र में तो पारंगत हैं, किंतु बुद्धिहीन है. इसका उन्हें क्या परिणाम भोगना पड़ता है, यही इस कहानी में बताया गया है. पढ़िए पूरी कहानी : 

The Four Learned Fool Story In Hindi

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किसी नगर में चार ब्राहमण रहते थे. विद्या प्राप्ति के लिए वे चारों कान्यकुब्ज गए, जहाँ उन्होंने बारह वर्षों तक शास्त्रों का अध्ययन किया. बारह वर्ष में वे शास्त्र में तो पारंगत हो गये, परन्तु, व्यवहारिक बुद्धि का उनमें अभाव ही रहा.

शास्त्र में पारंगत हो जाने के उपरांत उन्होंने अपने नगर लौट जाने का निश्चय किया. उन्हें विश्वास था कि अपने नगर में वे शास्त्र ज्ञान के बल पर धन उपार्जन कर पाएंगे. वे पैदल अपने नगर के लिए निकल पड़े. चलते-चलते मार्ग में एक दोराहे आया. दोराहा देख वे दुविधा में पड़ गए. उन्हें समझ नहीं आया कि आगे किस मार्ग का चुनाव करें और वे वहीं खड़े रह गये.

कुछ देर पश्चात् उस दोराहे से एक वैश्य बालक की शवयात्रा निकली. उसमें कई महाजन भी शामिल थे. महाजनों को देख एक ब्राह्मण को शास्त्र में लिखी यह बात याद आ गई : “महाजनो येन गतः स पन्थाः” अर्थात् जिस मार्ग पर महाजन जाएं, वहीं मार्ग है.

वह अन्य ब्राह्मणों से बोला, “चलो! इन महाजनों के पीछे चलो.”

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चारों शवयात्रा में शामिल हो गए और महाजनों के पीछे-पीछे शमशान घाट पहुँच गये. शमशान घाट में एक गधा खड़ा हुआ था.

गधे को देखकर दूसरे ब्राह्मण को याद आया : “राजद्वारे श्‍मशाने च यस्तिष्ठ्ति स बान्धवः” अर्थात् राजद्वार और शमशान में जो खड़ा हो, वह बंधु या भाई है.

वह अन्य ब्राह्मणों से बोला, “शमशान घाट में खड़ा ये गधा भाई सदृश्य है.”

ये सुनकर सब गधे से लिपट गए और उसे पुचकारने लगे.

उसी समय उन्हें एक ऊँट तीव्र गति से उस ओर आता दिखाई पड़ा. उसे देख तीसरे ब्राह्मण को याद आया : “धर्मस्य त्वरिता गतिः” अर्थात् धर्म की गति में बड़ा वेग होता है.

उसने सबको बताया, “तीव्र वेग से आने वाली वस्तु धर्म होती है. अतः यह ऊँट अवश्य धर्म है.”

तभी चौथे ब्राहमण को याद आया : “इष्टं धर्मेण योजयेत्” अर्थात् धर्म का संयोग इष्ट से कराना चाहिए.

उनकी दृष्टि में गधा ‘इष्ट’ था और ऊँट ‘धर्म’. उन्होंने दोनों का मेल कराने का निश्चय किया और ऊँट को पकड़कर उसके गले में गधा बांध दिया.

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वह गधा एक धोबी का था. जब उस तक समाचार पहुँचा कि कुछ लोगों ने उसके गधे को एक ऊँट के गले में बांध दिया गया है, तो वह लाठी लेकर आया और उन चार मूर्खों को मारने के लिए उनके पीछे दौड़ा. चारों किसिस तरह जान बचाकर वहाँ से भागे.

भागते-भागते वे एक नदी के किनारे पहुँचे. उसमें पलाश का एक पत्ता तैर रहा था. उसे देख पहले ब्राह्मण को याद आया : “आगमिष्यति यत्पत्रं तदस्मांस्तारयिष्यति” अर्थात् जो पत्ता तैरता हुआ आएगा, वही हमारा उद्धार करेगा.

वह चिल्लाया, “यह तैरता हुआ पत्ता हमें नदी पार करा देगा.” और उस पत्ते पर कूद पड़ा. पत्ते पर कूदते ही वह नदी में डूबने लगा. दूसरे ब्राहमण ने उसे डूबते हुए देखा, तो उसे याद आया “सर्वनाशे समुत्पन्ने अर्धं त्यजति पण्डितः” अर्थात् जब पूरा सर्वनाश हो रहा हो, तो बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि वह आधा छोड़ दे और आधा बचा ले.

इसलिए उसने सोचा कि इसे दो भागों में काट देना चाहिए और उसने तेज धार के औजार से उस ब्राह्मण की गर्दन काटकर उसे धड़ से अलग कर दिया. पहला ब्राहमण वहीं मर गया.

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अब तीन ब्राह्मण शेष रह गए. उन्होंने अपनी यात्रा जारी रखी. चलते-चलते वे एक गाँव में पहुँचे. गाँव के लोगों ने उनका स्वागत किया और अपने घर पर भोज के लिए ले गए.

सभी ब्राह्मण अलग-अलग घर में भोज के लिए गए. पहले घर में गए ब्राह्मण को सेमी परोसी गई. सेमी देख उसे याद आया : ”दीर्घसूत्री विनश्यति” अर्थात् जो मनुष्य दीर्घसूत्री या तंतु का प्रयोग करता है, वह नष्ट हो जाता है. इसलिए उसने भोजन को नहीं छुआ और उस घर से भूखा ही निकल गया.

दूसरे घर में गए ब्राहमण को खीर-पूड़ी परोसी गई. जब उसने कटोरे में फैलाव वाली चीज़ देखी, तो उसे याद आया : “अतिविस्तारविस्तीर्णं तद्भवेन्न चिरायुषम्” अर्थात् फ़ैलाव वाली वस्तु आयु कम करती है. इसलिये वह भी भोजन छोड़कर उस घर से भूखा ही निकल गया.

तीसरे घर में गए ब्राह्मण को मालपुए परोसे गए. जब उसने उसमें छिद्रों को देखा, तो उसे याद आ गया : “छिद्रेष्वनर्था बहुली भवन्ति” अर्थात्  “छिद्रों से बुराई पनपती है.”

इसलिए वह भी भोजन छोड़ वहाँ से निकल गया.

इस प्रकार तीनों मूर्ख ब्राह्मणों को भूखे-प्यासे ही अपनी यात्रा करनी पड़ी. इससे उनकी जग-हँसाई तो हुई ही, वे तीनों पछताए भी.

शिक्षा (Moral of the story)

बुद्धि के बिना विद्या व्यर्थ है.


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