१० सर्वश्रेष्ठ नैतिक शिक्षाप्रद कहानियाँ | Top 10 Moral Stories In Hindi

फ्रेंड्स इस पोस्ट में हम १० सर्वश्रेष्ठ नैतिक शिक्षाप्रद कहानियाँ (Top 10 Moral Stories In Hindi) शेयर कर रहे हैं. ये कहानियाँ हर आयु वर्ग के लोगों के जीवन में नैतिक ज्ञान का समावेश करने में उपयोगी हैं.  

Top 10 Moral Stories In Hindi
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Top 10 Moral Stories In Hindi

1. फूटा घड़ा 

बहुत समय पहले की बात है. एक गांव में एक किसान रहता था. उसके पास दो घड़े थे. उन दोनों घड़ों को लेकर वह रोज़ सुबह अपने घर से बहुत दूर बहती एक नदी से पानी लेने जाया करता था. पानी भरने के बाद वह उन घड़ों को एक बांस की लकड़ी के दोनो सिरों पर बांध लेता और उसे अपने कंधे पर लादकर वापस घर तक लाता था. रोज़ सुबह उसकी यही दिनचर्या थी.

दोनों घड़ों में से एक घड़ा सही-सलामत था, लेकिन दूसरा घड़ा एक जगह से फूटा हुआ था. इसलिए जब भी किसान नदी से पानी भरकर घर तक पहुँचता, एक घड़ा पानी से लबालब भरा रहता और दूसरे घड़े से पानी रिसने के कारण वह घड़ा आधा खाली हो चुका रहता था.

सही-सलामत घड़े को खुद पर बड़ा घमंड था कि वह किसान के घर तक पूरा पानी पहुँचाता है. दूसरी ओर फूटा घड़ा खुद को नीचा समझता था और हमेशा शर्मिंदा रहता कि वह किसी काम का नहीं है. उसे ग्लानि महसूस होती कि उसके कारण किसान की पूरी मेहनत बेकार चली जाती है.

एक दिन उस फूटे घड़े से नहीं रहा गया और उसने किसान से क्षमा मांगते हुए कहा, “मालिक! मैं खुद पर बहुत शर्मिंदा हूँ. मैं ठीक तरह से आपके काम नहीं आ पा रहा हूँ.”

किसान ने पूछा, “क्यों? ऐसी क्या बात हो गई?”

घड़े ने बताया, “मालिक! शायद आप इस बात से अनजान हैं कि मैं एक जगह से फूटा हुआ हूँ और नदी से घर तक पहुँचते-पहुँचते मेरा आधा पानी रिस जाता है. मेरी इस कमी के कारण आपकी मेहनत व्यर्थ चली जाती है.”

सुनकर वह किसान उस घड़े से बोला, ”तुम दु:खी मत हो. बस आज नदी से वापस आते हुए मार्ग में खिले हुए सुंदर फूलों को देखना. तुम्हारा मन बहल जायेगा.”

फूटे घड़े ने वैसा ही किया. वह रास्ते भर सुंदर फूलों को देखता हुआ आया. इससे उसका विचलित मन शांत हो गया. लेकिन जब घर पहुँचते ही उसने पाया कि वह पुनः आधा खाली हो चुका है, तो उस पर फिर से उदासी छा गई. उसने किसान से अनुनय किया कि वह उसकी जगह कोई अच्छा और सही-सलामत घड़ा ले ले.

यह सुनकर किसान बोला, “क्या तुमने ध्यान दिया कि बांस के जिस सिरे पर तुम बंधे रहते हो, उस ओर के मार्ग में सुंदर फूल खिले हुए हैं, जबकि मार्ग के दूसरी और सूखी जमीन है? ऐसा नहीं है कि मैं इस बात से अनजान हूँ कि तुम फूटे हुए हो. यह बात जानते हुए ही मैंने मार्ग के उस ओर सुंदर और रंग-बिरंगे फूल लगा दिए. जब मैं नदी से पानी भरकर लाता हूँ, तो तुम्हारे द्वारा उन फूलों को पानी मिल जाता है और वे सदा उस मार्ग को हरा-भरा रखते है. तुम्हारे कारण ही वह मार्ग इतना सुंदर हो पाया है. इसलिए तुम खुद को कम मत आंकों.”

सीख (Moral of the story)

कोई भी ऊँचा या नीचा नहीं होता. इस दुनिया में हर इंसान को एक रोल मिला हुआ है. जिसे हर कोई बखूबी निभा रहा है. इसलिए जो जैसा है, हमें उसे वैसा ही स्वीकारना चाहिए और उसकी कमजोरियों के स्थान पर उसकी अच्छाइयों पर ध्यान देना चाहिए.

2. सबसे खुश पक्षी 

एक कौवा एक वन में रहा करता था. उसे कोई कष्ट नहीं था और वह अपने जीवन से पूरी तरह संतुष्ट था. एक दिन उड़ते हुए वह एक सरोवर के किनारे पहुँचा. वहाँ उसने एक उजले सफ़ेद हंस को तैरते हुए देखा. उसे देखकर वह सोचने लगा – “यह हंस कितना सौभाग्यशाली है, जो इतना सफेद और सुंदर है. इधर मुझे देखो, मैं कितना काला और बदसूरत हूँ. ये हंस अवश्य इस दुनिया का सबसे खुश पक्षी होगा.”

वह हंस के पास गया और अपने मन की बात उसे बता दी. सुनकर हंस बोला, “नहीं मित्र! वास्तव में ऐसा नहीं है. पहले मैं भी सोचा करता था कि मैं इस दुनिया का सबसे सुंदर पक्षी हूँ. इसलिए बहुत सुखी और खुश था. लेकिन एक दिन मैंने तोते को देखा, जिसके पास दो रंगों की अनोखी छटा है. उसके बाद से मुझे यकीन है कि वही दुनिया का सबसे सुंदर और खुश पक्षी है.”

हंस की बात सुनने के बाद कौवा तोते के पास गया और उससे पूछा कि क्या वह दुनिया का सबसे खुश पक्षी है. तोते ने उत्तर दिया, “मैं बहुत ही खुशगवार जीवन व्यतीत कर रहा था, जब तक मैंने मोर को नहीं देखा था. किंतु अब मुझे लगता है कि मोर से सुंदर तो कोई हो ही नहीं सकता. इसलिये वही दुनिया का सबसे सुखी और खुश पक्षी है.”

इसके बाद कौवा मोर की खोज में निकला. उड़ते-उड़ते वह एक चिड़ियाघर पहुँचा. वहाँ उसने देखा कि मोर एक पिंजरे में बंद है और उसे देखने के लिए बहुत सारे लोग जमा हैं. सभी मोर की बहुत सराहना कर रहे थे. सबके जाने के बाद कौवा मोर के पास गया और उससे बोला, “तुम कितने सौभाग्यशाली हो, जो तुम्हारी सुंदरता के कारण हर रोज़ हजारों लोग तुम्हें देखने आते है. मुझे तो लोग अपने आस-पास भी फटकने नहीं देते और देखते ही भगा देते है. तुम इस दुनिया के सबसे खुश पक्षी हो ना?”

कौवे की बात सुनकर मोर उदास हो गया

वह बोला, “मित्र! मुझे भी अपनी सुंदरता पर बड़ा गुमान था. मैं सोचा करता था कि मैं इस दुनिया का क्या, बल्कि इस पूरे ब्रम्हाण्ड का सबसे सुंदर पक्षी हूँ. इसलिए खुश भी बहुत था. लेकिन मेरी यही सुंदरता मेरी शत्रु बन गई है और मैं इस चिड़ियाघर में बंद हूँ. यहाँ आने के बाद इस पूरे चिड़ियाघर का अच्छी तरह मुआयना करने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि कौवा ही एक ऐसा पक्षी है, जो यहाँ कैद नहीं है. इसलिए पिछले कुछ दिनों से मैं सोचने लगा हूँ कि काश मैं कौवा होता, तो कम से कम आज़ादी से बाहर घूम सकता और तब मैं इस दुनिया का सबसे सुखी और खुश पक्षी होता.”

सीख (Moral of the story)

हम हमेशा दूसरों को देखकर व्यर्थ ही स्वयं की तुलना उनसे करने लगते है और दु:खी हो जाते है. भगवान ने सबको अलग बनाया है और अलग गुण दिए हैं. हम उसका महत्व नहीं समझते और दु:ख के चक्र में फंस जाते हैं. इसलिए दूसरों के पास जो है, उसे देखकर जलने की बजाय हमें हमारे पास जो है, उसके साथ खुश रहना सीखना चाहिए. खुशी बाहर ढूंढने से नहीं मिलती, वह तो हमारे अंदर ही छिपी हुई होती है.

3. पारस पत्थर 

वन में स्थित एक आश्रम में एक ज्ञानी साधु रहते थे. ज्ञान प्राप्ति की लालसा में दूर-दूर से छात्र उनके पास आया करते थे और उनके सानिध्य में आश्रम में ही रहकर शिक्षा प्राप्त किया करते थे.

आश्रम में रहकर शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों में से एक छात्र बहुत आलसी था. उसे समय व्यर्थ गंवाने और आज का काम कल पर टालने की बुरी आदत थी. साधु को इस बात का ज्ञान था. इसलिए वे चाहते थे कि शिक्षा पूर्ण कर आश्रम से प्रस्थान करने के पूर्व वह छात्र आलस्य छोड़कर समय का महत्व समझ जाए.  

इसी उद्देश्य से एक दिन संध्याकाल में उन्होंने उस आलसी छात्र को अपने पास बुलाया और उसे एक पत्थर देते हुए कहा, “पुत्र! यह कोई सामान्य पत्थर नहीं, बल्कि पारस पत्थर है. लोहे की जिस भी वस्तु को यह छू ले, वह सोना बन जाती है. मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ. इसलिए दो दिनों के लिए ये पारस पत्थर तुम्हें दे रहा हूँ. इन दो दिनों में मैं आश्रम में नहीं रहूंगा. मैं पड़ोस के गाँव में रहने वाले अपने एक मित्र के घर जा रहा हूँ. जब वापस आऊंगा, तब तुमसे ये पारस पत्थर ले लूंगा. उसके पहले जितना चाहो, उतना सोना बना लो.”

छात्र को पारस पत्थर देकर साधु अपने मित्र के गाँव चले गए. इधर छात्र अपने हाथ में पारस पत्थर देख बड़ा प्रसन्न हुआ. उसने सोचा कि इसके द्वारा मैं इतना सोना बना लूंगा कि मुझे जीवन भर काम करने की आवश्यकता नहीं रहेगी और मैं आनंदपूर्वक अपना जीवन व्यतीत कर पाऊँगा.     

उसके पास दो दिन थे. उसने सोचा कि अभी तो पूरे दो दिन शेष हैं. ऐसा करता हूँ कि एक दिन आराम करता हूँ. अगला पूरा दिन सोना बनाता रहूंगा. इस तरह एक दिन उसने आराम करने में बिता दिया.

जब दूसरा दिन आया, तो उसने सोचा कि आज बाज़ार जाकर ढेर सारा लोहा ले आऊंगा और पारस पत्थर से छूकर उसे सोना बना दूंगा. लेकिन इस काम में अधिक समय लगेगा नहीं. इसलिए पहले भरपेट भोजन करता हूँ. फिर सोना बनाने में जुट जाऊंगा.

भरपेट भोजन करते ही उसे नींद आने लगी. ऐसे में उसने सोचा कि अभी मेरे पास शाम तक का समय है. कुछ देर सो लेता हूँ. जागने के बाद सोना बनाने का काम कर लूंगा. फिर क्या? वह गहरी नींद में सो गया. जब उसकी नींद खुली, तो सूर्य अस्त हो चुका था और दो दिन का समय पूरा हो चुका था. साधु आश्रम लौट आये थे और उसके सामने खड़े थे.

साधु ने कहा, “पुत्र! सूर्यास्त के साथ ही दो दिन पूरे हो चुके हैं. तुम मुझे वह पारस पत्थर वापस कर दो.”

छात्र क्या करता? आलस के कारण उसने अमूल्य समय व्यर्थ गंवा दिया था और साथ ही धन कमाने का एक सुअवसर भी. उसे अपनी गलती का अहसास हो चुका था और समय का महत्व भी समझ आ गया. वह पछताने लगा. उसने उसी क्षण निश्चिय किया कि अब से वह कभी आलस नहीं करेगा.

सीख (Moral Of The Story)

  • जीवन में उन्नति करना चाहते हैं, तो आज का काम कल पर टालने की आदत छोड़ दें.
  • समय अमूल्य है, इसे व्यर्थ ना गंवायें, क्योंकि एक बार हाथ से निकल जाने के बाद समय कभी दोबारा वापस नहीं आता.

4. भगवान पर भरोसा रखें

एक आदमी रेगिस्तान में भटक रहा था. आधा दिन निकल चुका था और रास्ते का कुछ पता नहीं था. वह समझ नहीं पा रहा था कि किस तरह उस रेगिस्तान से बाहर निकले. उसका खाने-पीने का सारा सामान ख़त्म हो गया था. प्यास से गला सूखा जा रहा था. लेकिन पानी का दूर-दूर तक कोई नामो-निशान नहीं था.

थोड़ी दूर और चलने पर उसे एक झोपड़ी दिखाई पड़ी. वह इस आशा में झोपड़ी की ओर चल पड़ा कि वहाँ उसे पानी अवश्य मिल जायेगा और वह वहाँ रहने वालों से रेगिस्तान से बाहर निकलने का रास्ता भी पूछ लेगा.

लेकिन झोपड़ी के पास पहुँचकर वह निराश हो गया. झोपड़ी खाली पड़ी थी. वहाँ कोई नहीं था. लेकिन उसके बाद भी उसने भगवान पर भरोसा रखा और झोपड़ी के अंदर गया.

झोपड़ी के अंदर एक हैण्डपंप लगा हुआ पाया. वह खुश हो गया कि अब वह अपनी प्यास बुझा सकता है. उसने भगवान को धन्यवाद दिया और हैण्डपंप चलाने लगा. लेकिन काफी प्रयास करने के बाद भी हैण्डपंप नहीं चला.

वह थक कर चूर हो चुका था. वह जमीन पर लेट गया. पानी के बिना उसे अपनी ज़िंदगी खत्म होती नज़र आने लगी थी. तभी उसे झोपड़ी की छत पर पानी की एक बोतल लटकी हुई दिखाई पड़ी और उसकी जान में जान आ गई.

उसने सोचा कि ये भगवान की कृपा है कि पानी की ये बोतल उसे दिख गई. अब वह अपनी प्यास बुझा सकता है. उसने पानी की बोतल नीचे उतारी. लेकिन जैसे ही वह पानी पीने को हुआ, उसकी नज़र बोतल के नीचे चिपके कागज पर पड़ी.

उस कागज पर लिखा था – इस पानी का इस्तेमाल हैण्डपंप चलाने के लिए लिए करें. जब हैण्डपंप चल जाए, तो पानी पी ले और फिर से इस बोतल में पानी भरकर वापस वही लटका दें, जहाँ से आपने इसे उतारा था.

कागज पर लिखे संदेश को पढ़कर आदमी सोच में पड़ गया कि क्या करें? यदि पानी हैण्डपंप में डाला और वह नहीं चला तो? सही तो यह होगा कि बोतल का पानी पीकर वहाँ से आगे बढ़ा जाए.

वह दुविधा में पड़ चुका था. लेकिन अंत में उसने ऊपर वाले को याद किया और कागज पर लिखे संदेश पर भरोसा करने का निर्णय लिया. उसने बोतल का पानी हैण्डपंप में डाल दिया और हैण्डपंप चलाने की कोशिश करने लगा.

१-२ प्रयास में हैण्डपंप चल गया और उसमें से ठंडा-ठंडा पानी आने लगा. आदमी ने पानी पीकर अपनी प्यास बुझाई और बोतल में पानी भरकर उसे वापस उसी जगह लटका दिया, जहाँ से उसने उसे उतारा था.

वह वहाँ से निकल ही रहा था कि झोपड़ी से एक कोने में उसे एक नक्शा और पेंसिल का टुकड़ा मिला. उस नक़्शे में रेगिस्तान से बाहर निकलने का रास्ता बना हुआ था.

आदमी खुश हो गया और भगवान का लाख-लाख धन्यवाद दिया. वह नक्शा लेकर बाहर निकल गया. लेकिन कुछ दूर चलने के बाद वह रुका और वापस झोपड़ी में आया. उसने पानी की बोतल के नीचे लगे कागज पर पेंसिल से लिखा – यकीन मानिये ये काम करता है.

सीख (Moral of the story) 

  • जब भी ज़िंदगी में बुरा वक़्त या परिस्थिति आये, भगवान और खुद पर विश्वास रखें. विश्वास बहुत बड़ी चीज़ होती है. विश्वास है, तो दुनिया में हर चीज़ संभव है.
  • बिना प्रयास के ज़िंदगी में कुछ भी हासिल नहीं होता. जैसे उस आदमी ने हैण्डपंप में पानी डाला और उसे चलाया, तब कहीं जाकर उसे अपने प्रयास का फल पानी के रूप में नसीब हुआ. उसी प्रकार ज़िंदगी में कुछ करना है, तो प्रयास करने पड़ेंगे. प्रयास करेंगे, तो सफ़लता अवश्य मिलेगी.

5. दोस्त की मदद 

जंगल में नदी किनारे एक गुफ़ा में एक लोमड़ी रहा करती थी. उसकी नदी में रहने वाले एक कछुवे से अच्छी मित्रता थी. दोनों अक्सर नदी किनारे एक-दूसरे से गपशप किया करते थे.

एक दिन वे दोनों हमेशा की तरह नदी के किनारे बैठकर बातें कर रहे थे कि कहीं से एक खूंखार तेंदुआ वहाँ आ गया. तेंदुये को देखकर दोनों जान बचाकर भागे. लोमड़ी तेज थी. वह सरपट दौड़कर अपनी गुफ़ा में पहुँच गई. लेकिन कछुवा अपनी धीमी चाल के कारण ज्यादा दूर भाग नहीं पाया और तेंदुये की पकड़ में आ गया.

तेंदुए ने कछुवे को मुँह में पकड़ा और एक पेड़ के नीचे बैठकर उसे खाने की कोशिश करने लगा. लेकिन कछुवे के शरीर का बाहरी खोल सख्त था. तेंदुये के पैने दांतों और नाखूनों का भी उस पर कोई असर नहीं हुआ.

गुफ़ा में बैठी लोमड़ी तेंदुए को देख रही थी. उसने अपने मित्र कछुवे को बचाने के लिए एक तरकीब लड़ाई. वह मधुर आवाज़ में तेंदुए से बोली, “तेंदुए भाई! आप चाहे कितना भी प्रयास कर लें, कछुवे का सख्त खोल नहीं तोड़ पाएंगे. मैं आपको इसे तोड़ने का एक सरल तरीका बताती हूँ. इसे पानी में फेंक दो. थोड़ी देर में ये फूलकर नरम हो जायेगा, फिर इसे आप आसानी से तोड़ पाओगे.”

तेंदुआ लोमड़ी की चालाकी भरी बातों में आ गया. उसने तुरंत कछुवे को नदी में फेंक दिया. नदी में जाते ही कछुवा तैर कर दूर निकल गया. बाद में तेंदुए को समझ में आया कि वह मूर्ख बन चुका है. वह क्या करता? मुँह लटकाये वापस चला गया.

सीख (Moral Of the Story)

बुद्धिमानी से हर समस्या का समाधान निकाला जा सकता है.

6. आधे रास्ते को मंज़िल न समझें 

जंगल के किनारे एक छोटा सा गाँव था. जंगल में जंगली जानवरों की बहुतायत थी. इसलिए गाँव के लोगों को पेड़ पर चढ़ने का ज्ञान होना अति-आवश्यक था, ताकि जंगली जानवरों से सामना होने पर वे पेड़ पर चढ़कर अपनी जान बचा सकें.

जो लोग जंगल में लकड़ियाँ काटने जाते थे, उनके जंगली जानवरों से दो-चार होने की अधिक संभावना थी. इसलिए वे लोग पेड़ पर चढ़ना अवश्य सीखते थे. 

उस गाँव में एक बुजुर्ग सज्जन रहा करते थे. सब लोग उन्हें ‘बाबा’ बुलाते थे. वे पेड़ पर चढ़ने की विधा में माहिर थे और लोगों को पेड़ पर चढ़ने का प्रशिक्षण दिया करते थे. गाँव के अधिकांश लोग उनसे ही प्रशिक्षण प्राप्त करने जाया करते थे.

एक दिन बाबा ने उन युवकों के समूह को बुलाया, जिन्हें वे पेड़ पर चढ़ने का प्रशिक्षण दे रहे थे. वह उस समूह के प्रशिक्षण का अंतिम दिन था.

बाबा उन्हें एक पेड़ के पास लेकर गए. वह एक ऊँचा और चिकना पेड़ था, जिस पर चढ़ना बेहद कठिन था.

बाबा युवकों से बोले, “आज तुम्हारे प्रशिक्षण का अंतिम दिन है. मैं देखना चाहता हूँ कि क्या तुम लोग पेड़ पर चढ़ने में माहिर हो गए हो. इसलिए मैं तुम्हें इस चिकने और ऊँचे पेड़ पर चढ़ने की चुनौती दे रहा हूँ. यदि तुम सब इस पेड़ पर चढ़ने में सफ़ल रहते हो, तो दुनिया के किसी भी पेड़ पर आसामी से चढ़ सकते हो.”

बाबा की बात सुनकर सभी युवक उत्त्साहित हो गये. वे पेड़ पर चढ़ने के लिए एक पंक्ति में खड़े हो गए. सबसे पहला युवक पेड़ पर चढ़ने लगा. वह बड़ी ही आसानी से पेड़ पर चढ़ा और फिर नीचे उतरने लगा. उतरते समय जब वह आधे रास्ते में था, तब बाबा बोले, “सावधान…आराम से संभलकर उतरो. कोई जल्दी नहीं है.”

उस युवक ने वैसा ही किया. वह आराम से सावधानी से नीचे उतरा. उसके बाद एक-एक कर सारे युवक पेड़ पर चढ़ने लगे. जब वे पेड़ पर चढ़ते, तब तो बाबा उन्हें कुछ नहीं कहते. लेकिन जब वे पेड़ से उतरते समय आधे रास्ते पर होते या बस नीचे पहुँचने वाले होते, तो बाबा कहते, “सुनो, आराम से, थोड़ा संभलकर और पूरी सावधानी से उतरो. किसी प्रकार की कोई जल्दी नहीं है.”

सभी युवकों ने बाबा की बात मानी और पेड़ पर चढ़कर नीचे उतरने में सफ़ल हुए.

सब बड़े ख़ुश थे. लेकिन एक बात उन्हें खटक रही थी और वह यह थी कि बाबा ने उन्हें पेड़ से उतरते समय ही सावधान रहने को क्यों कहा. पेड़ पर चढ़ते समय क्यों नहीं?

उन्होंने बाबा से पूछ ही लिया, “बाबा इस पेड़ की सबसे ऊपरी शाखा पर चढ़ना सबसे कठिन था. लेकिन आपने उस पर चढ़ते समय हमें संभलकर रहने नहीं कहा. लेकिन पेड़ से उतरते समय जब जमीन तक की दूरी बहुत कम रह गई थी, तब आपने हमें संभलकर और सावधान रहने को कहा. ऐसा क्यों?”

बाबा बोले, “देखो, पेड़ की सबसे ऊपरी शाखा पर चढ़ना बहुत कठिन है. ये मैं भी जानता हूँ और तुम भी. इसलिए मेरे बिना बोले ही तुम पहले से ही सतर्क थे. ऐसा हर किसी के साथ होता है. कार्य के प्रारंभ में सब सतर्कता से ही आगे बढ़ते हैं. किंतु सतर्कता और सावधानी में चूक तब होती है, जब हम मंजिल के समीप होते हैं. तब हमें लगने लगता है कि हमारा काम तो पूरा होने को है. मंजिल अब दूर नहीं और वहाँ हमारा ध्यान भटक जाता है और हम गलती कर जाते हैं. इसलिए हमेशा याद रखो कि मंजिल के नज़दीक पहुँचने और यथार्थ में मंजिल पर पहुँचने में  बहुत फ़र्क है.”

युवकों को बाबा की इस बात से जीवन की एक बहुत बड़ी सीख प्राप्त हुई.

मित्रों, हमारी जीवन में भी ऐसा कई बार होता है कि किसी काम को पूरा करने के कगार पर होकर भी हम उसे पूरा नहीं कर पाते. अंतिम क्षणों में कुछ गड़बड़ हो जाती है और हम पछताते रह जाते हैं. अंतिम क्षणों की ज़रा सी असावधानी से हमारा पूरा काम बिगड़ देती है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मंजिल के करीब पहुँचकर हम अपना धैर्य खो देते हैं. धैर्य खो देने के कारण हमसे चूक हो जाती है. इसलिए जब तक  मंजिल तक न पहुँचे, धैर्य बनाकर रखें. कार्य के प्रारंभ में जितना धैर्य और सावधानी आवश्यक है, कार्य समाप्ति तक भी आवश्यक है. इसलिए कार्य पूर्ण होने तक धैर्य न खोएं. उतने ही सावधान रहें, जितने प्रारंभ. कहीं धैर्य खो देना लक्ष्य खो देने का कारण न बन जाए.


7. जल की मिठास 

गुरुकुल में शिक्षा प्राप्त कर रहे एक शिष्य को अपने पिता का संदेश मिला. पिता ने उसे घर बुलाया था. बिना देर किये शिष्य गुरु के पास गया और उनसे घर जाने की अनुमति मांगी.

गुरु द्वारा अनुमति दे दी गई और अगले दिन शिष्य घर की ओर निकल पड़ा. वह पैदल चला जा रहा था. गर्मी के दिन थे. रास्ते में उसे प्यास लग आई.

वह पानी का स्रोत ढूंढते हुए आगे बढ़ने लगा. रास्ते एक किनारे उसे एक कुआं दिखाई पड़ा. उसने कुएं से पानी निकाला और अपनी प्यास बुझाई. उस कुएं का पानी शीतल और मीठा था. शिष्य उसे पीकर तृप्त हो गया.

वह आगे बढ़ने को हुआ ही था कि उनके मन में विचार आया – इतना मीठा जल मैंने आज तक कभी नहीं पिया. मुझे गुरूजी के लिए यह जल ले जाना चाहिए. वह भी तो इस मीठे जल का पान करके देखें.

यह सोचकर उसने कुएं से जल निकाला और मशक में भरकर वापस गुरुकुल की ओर चल पड़ा. गुरुकुल में उसे देख गुरूजी ने चकित होकर पूछा, “वत्स, तुम इतनी जल्दी लौट आये?”

शिष्य ने उन्हें अपनी वापसी का कारण बताया और मशक में भरा हुआ जल उनकी ओर बढ़ा दिया. गुरूजी ने वह जल पिया और बोले, “वत्स, ये तो गंगाजल की तरह है. इसे ग्रहण कर मेरी आत्मा तृप्त हो गई.”

गुरु के शब्द सुन शिष्य प्रसन्न हो गया. उसने पुनः गुरु से आज्ञा ली और अपने घर की ओर निकल गया.

शिष्य द्वारा लाया गया मशक गुरूजी के पास ही रखा था. उसमें कुछ जल अब भी शेष था. उस शिष्य के जाने के थोड़ी देर बाद गुरुकुल का एक छात्र गुरूजी के पास आया.

उसने वह जल पीने की इच्छा जताई, तो गुरूजी ने उस मशक दे दिया. छात्र ने मशक के जल का एक घूंट अपने मुँह में भरा और तुरंत बाहर थूक दिया.

वह बोला, “गुरूजी, ये जल कितना कड़वा है. मैं तो उस शिष्य की आपके द्वारा की गई प्रशंषा सुन इसका स्वाद लेने आया था. किंतु अब मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि आपके उसकी झूठी प्रशंषा क्यों की?”

गुरूजी ने उत्तर दिया, “वत्स, हो सकता है. इस जल में शीतलता और मिठास नहीं, किंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि इसे लाने वाले के मन में अवश्य है. जब उसने वह जल पिया, तो मेरे प्रति मन में उमड़े प्रेम के कारण वह मशक में जल भरकर गुरुकुल वापस लौट आया, ताकि मैं उस जल की मिठास का अनुभव कर सकूं. मैंने भी जब इस जल को ग्रहण किया, तो इसका स्वाद मुझे ठीक नहीं लगा, किंतु मैं उस शिष्य के हृदय में उमड़े प्रेम को देखते हुए उसे दु:खी नहीं करना चाहता था. इसलिए मैंने इस जल की प्रशंषा की. ये भी संभव है कि मशक के साफ़ न होने के कारण जल का स्वाद बिगड़ गया हो और वह वैसा न रहा हो, जैसा कुएं से निकाले जाते समय था. जो भी हो, मेरे लिए वह मायने नहीं रखता. जो मायने रखता है, वह है उस शिष्य का मेरे प्रति प्रेम. उस प्रेम की मिठास मेरे लिए जल की मिठास से अधिक महत्वपूर्ण है.”

सीख (Moral of the story)

“हमें किसी भी घटना का सकारात्मक पक्ष देखना चाहिए. नकारत्मक पक्ष देखकर न सिर्फ़ हम अपना मन मलिन करते हैं, बल्कि दूसरों का भी. इसलिए सदा अच्छाई पर ध्यान दें. “

8. दान का हिसाब 

एक राज्य में एक राजा का शासन था. वह कीमती वस्त्रों, आभूषणों और मनोरंजन में अत्यधिक धन खर्च कर दिया करता था. परन्तु, दान-धर्म में एक दमड़ी खर्च नहीं करता था.

जब भी कोई ज़रूरतमंद और लाचार व्यक्ति सहायता की आस में उसके दरबार में आता, तो उसे खाली हाथ लौटा दिया जाता था. इसलिए लोगों ने उसके पास जाना ही छोड़ दिया था.

एक वर्ष राज्य में वर्षा नहीं हुई, जिससे वहाँ सूखा पड़ गया. सूखे से फ़सल नष्ट हो गई. चारो ओर त्राहि-त्राहि मच गई. लोग भूख-प्यास से मरने लगे.  

राजा के कानों तक जब प्रजा का हाल पहुँचा, तो वह कन्नी काटते हुए बोला, “अब इंद्र देवता रूठ गए हैं, तो इसमें मेरा क्या दोष है. मैं भला क्या कर सकता हूँ?”

प्रजा उनके समक्ष सहायता की गुहार लेकर आई, “महाराज सहायता करें. अब आपका ही सहारा है. राजकोष से थोड़ा धन प्रदान कर दें, ताकि अन्य देशों से अनाज क्रय कर भूखे मरने से बच सकें.”

राजा उन्हें दुत्कारते हुए बोला, “जाओ अपनी व्यवस्था स्वयं करो. आज सूखे से तुम्हारी फ़सल नष्ट हो गई. कल अतिवृष्टि से हो जायेगी और तुम लोग ऐसे ही हाथ फैलाये मेरे पास आ जाओगे. तुम लोगों पर यूं ही राजकोष का धन लुटाता रहा, तो मैं कंगाल हो जाऊंगा. जाओ यहाँ से.”

दु:खी मन से लोग वापस चले गए. किंतु, समय बीतने के साथ सूखे का प्रकोप बढ़ता चला गया. अन्न के एक-एक दाने को मोहताज़ हो जाने पर लोगों के पास कोई चारा नहीं रहा और वे फिर से राजा के पास पहुँचे.

सहायता की याचना करते हुए वे बोले, “महाराज! हम लाचार हैं. खाने को अन्न का एक दाना नहीं है. राजकोष से मात्र दस हज़ार रूपये की सहायता प्रदान कर दीजिये. आजीवन आपके ऋणी रहेंगे.”

“दस हज़ार रूपये! जानते भी हो कि ये कितने होते हैं? इस तरह मैं तुम लोगों पर धन नहीं लुटा सकता.” राजा बोला.

“महाराज! राजकोष सगार है और दस हज़ार रूपये एक बूंद. एक बूँद दे देने से सागर थोड़े ही खाली हो जायेगा.” लोग बोले.

“तो इसका अर्थ है कि मैं दोनों हाथों से धन लुटाता फिरूं.” राजा तुनककर बोला.

“महाराज! हम धन लुटाने को नहीं कह रहे. सहायता के लिए कह रहे हैं. वैसे भी हजारों रूपये कीमती वस्त्रों, आभूषणों, मनोरंजन में प्रतिदिन व्यय होते है. वही रूपये हम निर्धनों के काम आ जायेंगे.”  

“मेरा धन है. मैं जैसे चाहे उपयोग करूं? तुम लोग कौन होते हो, मुझे ज्ञान देने वाले? तत्काल मेरी दृष्टि से दूर हो जाओ, अन्यथा कारागार में डलवा दूंगा.” राजा क्रोधित होकर बोला.

राजा का क्रोध देख लोग चले गए.

दरबारी भी राजा का व्यवहार देख दु:खी थे. ऐसी आपदा के समय प्रजा अपने राजा से आस न रखे, तो किससे रखे? ये बात वे राजा से कहना चाहते थे, किंतु उसका क्रोध देख कुछ न कह सके.

राजा ही बोला, “दस हज़ार रूपये मांगने आये थे. अगर सौ-दो सौ रूपये भी मांगे होते, तो दे देता और उसकी क्षतिपूर्ति किसी तरह कर लेता. किंतु, इन लोगों ने तो बिना सोचे-समझे अपना मुँह खोल दिया. सच में अब तो नाक में दम हो गया है.”

अब दरबारी क्या कहते? शांत रहे. किंतु, मन ही मन सोच रहे थे कि राजा ने प्रजा के प्रति अपना कर्तव्य नहीं निभाया.

कुछ दिन और बीत गए. किंतु, सूखे का प्रकोप रुका नहीं, बढ़ता ही गया. इधर राजा इन सबके प्रति आँखें मूंद अपने भोग-विलास में लगा रहा.

एक दिन एक सन्यासी दरबार में आया और राजा को प्रणाम कर बोला, “महाराज! सुना है आप दानवीर हैं. सहायता की गुहार लेकर उपस्थित हुआ हूँ.”

राजा आश्चर्य में पड़ गया, सोचने लगा कि ये सन्यासी कहाँ से मेरे दान-पुण्य के बारे में सुनकर आया है. मैंने तो कभी किसी को दान नहीं दिया. कहीं दान लेने के लिए ये बात तो नहीं बना रहा.

फिर सन्यासी से पूछा, “क्या चाहिए तुम्हें? यदि अपनी सीमा में रहकर मांगोगे, तो तुम्हें प्रदान किया जाएगा. किंतु, अत्यधिक की आस मत रखना.”

सन्यासी बोला, “महाराज! मैं तो एक सन्यासी हूँ. मुझे अत्यधिक धन का लोभ नहीं. बस इक्कीस दिनों तक राजकोष से कुछ भिक्षा दे दीजिए. किंतु, भिक्षा लेने का मेरा तरीका है. मैं हर दिन पिछले दिन से दुगुनी भिक्षा लेता हूँ. आपको भी ऐसा ही करना होगा”

राजा सोचते हुए बोला, “पहले ये बताओ कि पहले दिन कितनी भिक्षा लोगे. तब मैं निर्णय करूंगा कि तुम्हें राजकोष से भिक्षा दी जाए या नहीं. दो-चार रूपये मांगोगे, तो मिल सकते हैं. दस-बीस रुपये मांगोगे, तो कठिनाई होगी.”

सन्यासी बोला, “महाराज! कहा ना मैं ठहरा सन्यासी. अधिक धन का क्या करूंगा? आप मुझे पहले दिन मात्र एक रूपया दे देना.”

सुनकर राजा बोला, “ठीक है, मैं तुम्हें पहले दिन एक रुपया और उसके बाद बीस दिनों तक प्रतिदिन पिछले दिन का दुगुना धन देने का वचन देता हूँ.”

राजा ने तत्काल कोषाध्यक्ष को बुलवाया और उसे अपना आदेश सुना दिया. राजकोष से सन्यासी को एक रुपया मिल गया और वह राजा की जयकार करता हुआ चला गया.

उसके बाद प्रतिदिन सन्यासी को राजकोष से धन मिलने लगा. कुछ दिन बीतने के बाद राजभंडारी ने हिसाब लगाया, तो पाया कि राजकोष का धन कम हुए जा रहा है और इसका कारण सन्यासी को दिया जाने वाला दान है.

उसने मंत्री को यह जानकारी दी. मंत्री भी उलझन में पड़ गया. वह बोला, “यह बात हमें पहले विचार करनी चाहिए थी. अब क्या कर सकते हैं. ये तो महाराज का आदेश है. हम उनके आदेश का उल्लंघन कैसे कर सकते हैं?”

राजभंडारी कुछ नहीं बोला. कुछ दिन और बीते और राजकोष से धन की निकासी बढ़ने लगी, तो वह फिर से भागा-भागा मंत्री के पास पहुँचा और बोला, “मंत्री जी! इस बार मैंने पूरा हिसाब किया है. वह हिसाब लेकर ही आपके पास उपस्थित हुआ हूँ.”

मंत्री ने जब हिसाब देखा, तो चकित रह गया. उसके माथे पर पसीना आ गया. उसने पूछा, “क्या यह हिसाब सही है.”

“बिल्कुल सही. मैंने कई बार स्वयं गणना की है.” राजभंडारी बोला.

“इतना धन चला गया है और अभी इक्कीस दिन होने में बहुत समय है. इक्कीस दिनों बाद क्या स्थिति बनेगी? जरा बताओ तो?”

भंडारी बोला, “वह हिसाब तो मैंने नहीं लगाया है.”

“तो तत्काल हिसाब लगाकर मुझे बताओ.” मंत्री ने आदेश दिया.

भंडारी हिसाब करने लगा और पूरा हिसाब करके बोला, “मंत्री जी! इक्कीस दिनों में सन्यासी की दान की रकम दस लाख अड़तालीस हजार पांच सौ छिहत्तर रूपये होगी.”

“क्या?” मंत्री बोला, “तुमने सही हिसाब तो लगाया है. इतना धन सन्यासी ले जायेगा, तो राजकोष खाली हो जायेगा. हमें तत्काल ये जानकारी महाराज को देनी होगी.”

वे तत्क्षण राजा के पास पहुँचे और पूरा हिसाब उसके सामने रख दिया. राजा ने जब हिसाब देखा, तो उसे चक्कर आ गया. फिर ख़ुद को संभालकर वह बोला, “ये सब क्या है?”

मंत्री बोला, “सन्यासी को दान देने के कारण राजकोष खाली हो रहा है.”

राजा बोला, “ऐसा कैसे हो सकता है? मैंने तो उसे बहुत ही कम धन देने का आदेश दिया था.”

मंत्री बोला, “महाराज! वह सन्यासी बहुत चतुर निकला. अपनी बातों में फंसाकर वह राजकोष से बहुत सारा धन ऐंठने के प्रयास में है.”

राजा ने राजभंडारी से पूछा, “फिर से बताओ कितना धन सन्यासी लेने वाला है?”

“दस लाख अड़तालीस हजार पांच सौ छिहत्तर“ राजभंडारी बोला.

“परन्तु मुझे लगता है कि मैंने इतना धन देने का आदेश तो नहीं दिया था. मैं ऐसा आदेश दे ही नहीं सकता. जब मैंने अकाल पीड़ित प्रजा को दस हजार रुपये नहीं दिए, तो भला एक सन्यासी को इतना धन क्यों दूंगा?” राजा सोचते हुए बोला.

“किंतु सब आपके आदेश अनुसार ही हो रहा है महाराज. चाहे तो आप स्वयं हिसाब कर लीजिये.” राजभंडारी बोला. मंत्री ने भी उसका समर्थन किया.

“अभी इसी समय उस सन्यासी को मेरे समक्ष प्रस्तुत करो.” राजा चिल्लाया.

तुरंत कुछ सैनिक भेजे गए और वे सन्यासी को लेकर राजा के सामने उपस्थित हुए. सन्यासी को देखते ही राजा उसके चरणों पर गिर पड़ा और बोला, “बाबा, आपको दिए वचन से मेरा राजकोष खाली हुआ जा रहा है. इस तरह तो मैं कंगाल हो जाऊँगा. फिर मैं राजपाट कैसे चला पाऊँगा? किसी तरह मुझे इस वचन से मुक्त कर दीजिये. दया कीजिये.”

सन्यासी ने राजा को उठाया और बोला, “ठीक है मैं तुम्हें इस वचन से मुक्त करता हूँ. किंतु इसके बदले तुम्हें राज्य की प्रजा को पचास हज़ार रूपये देने होंगे. ताकि वे अकाल का सामना कर सकें.”

राजा बोला, “किंतु बाबा, वे लोग जब आये थे, तब दस हजार मांग रहे थे.”

“किंतु मैं पचास हजार ही लूँगा. उससे एक ढेला कम नहीं.” सन्यासी  ने अपना निर्णय सुनाया.

राजा बहुत गिड़गिड़ाया, किंतु सन्यासी अपनी बात अड़ा रहा. अंततः  विवश होकर राजा पचास हजार रूपये देने तैयार हो गया.

सन्यासी ने अपना वचन वापस ले लिया और चला गया. राजकोष से प्रजा को पचास हजार रूपये दिए गए. प्रजा बहुत प्रसन्न हुई और राजा की जय-जयकार करने लगी. दु:खी राजा बहुत दिनों तक भोग-विलास से दूर रहा.

सीख (Moral of the story)

१. जब सीढ़ी उंगली से घी ना निकले, तो उंगली टेढ़ी करनी पड़ती है.

२. भला करोगे, तो चारों ओर गुणगान होगा.


 9. आज का काम कल पर मत टालें 

वन में स्थित एक आश्रम में एक ज्ञानी साधु रहा करते थे. ज्ञान प्राप्ति की लालसा में दूर-दूर से छात्र उनके पास आया करते थे और उनके सानिध्य में आश्रम में ही रहकर शिक्षा प्राप्त किया करते थे.

आश्रम में रहकर शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों में से एक छात्र बहुत आलसी था. उसे समय व्यर्थ गंवाने और आज का काम कल पर टालने की बुरी आदत थी. साधु को इस बात का ज्ञान था. इसलिए वे चाहते थे कि शिक्षा पूर्ण कर आश्रम से प्रस्थान करने के पूर्व वह छात्र आलस्य छोड़कर समय का महत्त्व समझ जाए.  

इसी उद्देश्य से एक दिन संध्याकाल में उन्होंने उस आलसी छात्र को अपने पास बुलाया और उसे एक पत्थर देते हुए कहा, “पुत्र! यह कोई सामान्य पत्थर नहीं, बल्कि पारस पत्थर है. लोहे की जिस भी वस्तु को यह छू ले, वह सोना बन जाती है. मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ. इसलिए दो दिनों के लिए ये पारस पत्थर तुम्हें दे रहा हूँ. इन दो दिनों में मैं आश्रम में नहीं रहूंगा. मैं पड़ोसी गाँव में रहने वाले अपने एक मित्र के घर जा रहा हूँ. जब वापस आऊंगा, तब तुमसे ये पारस पत्थर ले लूंगा. उसके पहले जितना चाहो, उतना सोना बना लो.”

छात्र को पारस पत्थर देकर साधु अपने मित्र के गाँव चले गए. इधर छात्र अपने हाथ में पारस पत्थर देख बड़ा प्रसन्न हुआ. उसने सोचा कि इसके द्वारा मैं इतना सोना बना लूंगा कि मुझे जीवन भर काम करने की आवश्यकता नहीं रहेगी और मैं आनंदपूर्वक अपना जीवन व्यतीत कर पारूंगा.     

उसके पास दो दिन थे. उसने सोचा कि अभी तो पूरे दो दिन शेष हैं. ऐसा करता हूँ कि एक दिन आराम करता हूँ. अगला पूरा दिन सोना बनाता रहूंगा. इस तरह एक दिन उसने आराम करने में बिता दिया.

जब दूसरा दिन आया, तो उसने सोचा कि आज बाज़ार जाकर ढेर सारा लोहा ले आऊंगा और पारस पत्थर से छूकर उसे सोना बना दूंगा. लेकिन इस काम में अधिम समय तो लगेगा नहीं. इसलिए पहले भरपेट भोजन करता हूँ. फिर सोना बनाने में जुट जाऊंगा.

भरपेट भोजन करते ही वह नींद में आगोश में समाने लगा. ऐसे में उसने सोचा कि अभी मेरे पास शाम तक का समय है. कुछ देर सो लेता हूँ. जागने के बाद सोना बनाने का काम कर लूंगा. फिर क्या? वह गहरी नींद में सो गया. जब उसकी नींद खुली, तो सूर्य अस्त हो चुका था और दो दिन का समय पूरा हो चुका था. साधु आश्रम लौट आये थे और उसके सामने खड़े थे.

साधु ने कहा, “पुत्र! सूर्यास्त के साथ ही दो दिन पूरे हो चुके हैं. अब तुम मुझे वह पारस पत्थर वापस कर दो.”

छात्र क्या करता? आलस के कारण उसने अमूल्य समय व्यर्थ गंवा दिया था और साथ ही धन कमाने का एक सुअवसर भी. उसे अपनी गलती का अहसास हो चुका था और समय का महत्त्व भी समझ आ गया. वह पछताने लगा और उसी क्षण निश्चिय किया कि अब से वह कभी आलस नहीं करेगा.

सीख

१. जीवन में उन्नति करना चाहते हैं, तो आज का काम कल पर टालने की आदत छोड़ दीजिये.

२. समय अमूल्य है, इसे व्यर्थ मत गंवाइये. क्योंकि एक बार हाथ से निकल जाने पर समय कभी दोबारा वापस नहीं आता.

10. गुरू गुरू होता है 

एक नगर में एक महान तलवारबाज़ रहता था. उसके जैसा तलवारबाज़ उस पूरे नगर में तो क्या पूरे राज्य में नहीं था. राज्य भर में उसकी ख्याति फैली हुई थी. अपनी तलवारबाज़ी के दम पर उसने अपने राजा को कई युद्धों में जीत दिलवाई थी. इसलिए सभी उसका बहुत सम्मान करते थे.

समय बीतने के साथ वह वृद्ध हो चला था. वह नहीं चाहता था कि उसकी कला उसके साथ ही इस दुनिया से चली जाये. इसलिए उसने पूरे राज्य में एलान करवाया कि जो भी तलवारबाज़ी सीखना चाहता है, वह उसके पास आकर सीख सकता है.

राज्य के कई युवक उसके पास आये और उसके शिष्य बनकर तलवारबाज़ी सीखने लगे. वह भी अपनी कला के हर गुर अपने शिष्यों को सिखाने लगा. उन शिष्यों में से एक शिष्य असाधारण था. उसने शीघ्र ही तलवारबाज़ी के सारे गुर सीख लिए और तलवारबाज़ी में पारंगत हो गया.

पारंगत होने के बाद उसे अपनी तलवारबाज़ी पर घमंड हो गया. वह स्वयं को अपने गुरू से भी महान तलवारबाज़ समझने लगा. किंतु उसे अपने गुरू सरीखी प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं थी.

वह प्रतिष्ठा पाने नित नए उपाय सोचा करता. एक दिन उसने सोचा क्यों ना तलवारबाज़ी का एक मुकाबला गुरू के साथ किया जाये. उन्हें पराजित कर दूंगा, तो लोग मुझे उनसे महान तलवारबाज़ स्वीकार कर लेंगे.

उसने अपने वृद्ध गुरू को तलवारबाज़ी की चुनौती दे दी. गुरू ने वह चुनौती स्वीकार कर ली. सात दिन बाद दोनों में मध्य तलवारबाज़ी का मुकाबला नियत किया गया.

पूरे राज्य में इस मुकाबले की चर्चा थी. यहाँ तक कि राज्य के राजा भी वह मुकाबला देखने को आतुर थे. शिष्य को अपनी तलवारबाज़ी पर पूरा भरोसा था. किंतु दिन गुजरने के साथ उसका यह भरोसा कम होने लगा. उसे लगने लगा कि गुरू ने अवश्य तलवारबाज़ी की एक न एक विधा उसे नहीं सिखाई होगी. वह अपने गुरू पर नज़र रखने लगा, ताकि अभ्यास के दौरान यदि गुरू वह विधा प्रयोग करे, तो उसे देखकर वह सीख सके.

एक दिन उसने देखा कि गुरू कहीं जा रहा है. वह उसका पीछा करने लगा. गुरू लोहार के पास पहुँचा और लोहार को १५ फुट लंबी म्यान तैयार करने का आदेश दिया है. शिष्य ने सोचा अवश्य ही गुरू १५ फुट लंबी तलवार बनवाकर उतनी दूर से ही उसका सिर कलम कर देने की योजना बना रहा है. बिना समय व्यर्थ किये वह एक अन्य लोहार के पास गया और उससे १६ फुट लंबी तलवार बनवा ली.

मुकाबले का दिन आया. गुरू और शिष्य दोनों एक-दूसरे के आमने-सामने थे. जैसे ही मुकाबला शुरू हुआ, गुरू ने म्यान से तलवार निकालकर शिष्य की गर्दन पर रख दी. उधर शिष्य म्यान से अपनी १६ फुट लंबी तलवार निकालता ही रह गया. वास्तव में, गुरू ने म्यान १५ फुट की बनवाई थी, किंतु उसकी तलवार एक सामान्य तलवार थी.

सीख – 

  • जीवन में हर युद्ध ताकत और बल के सहारे नहीं जीते जाते. आत्मज्ञान और अनुभव के सामने ताकत और बल भी फ़ीके पड़ जाते हैं.
  •  घमंड को कभी न कभी नीचा देखना ही पड़ता है. अपनी कला पर घमंड करने के बजाय उसे निखारने में समय लगायें.  

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