विक्रम बेताल की प्रारंभिक कहानी | Vikram Betal Initial Story In Hindi

फ्रेंड्स, इस पोस्ट में हम विक्रम बेताल की प्रारंभिक कहानी (Vikram Betal Initial Story In Hindi) शेयर कर रहे हैं. यह कहानी राजा विक्रम के बारे में बताती है कि वह कौन थे और बेताल को लेकर कहाँ जा रहे थे? इसके पीछे उनका क्या उद्देश्य था? पढ़िए पूरी कहानी :   

Vikram Betal Initial Story In Hindi

Vikram Betal Initial Story In Hindi

प्राचीन काल में धारा नगरी में गंधर्वसेन नामक राजा का शासन था. उसकी चार रानियाँ थी. उनसे उसे छः पुत्र थे. सभी एक से बढ़कर एक बुद्धिमान और शूरवीर.  

दुर्भाग्य से एक दिन गंधर्वसेन की मृत्यु हो गई. उसका उत्तराधिकारी सबसे बड़े पुत्र शंख को चुना गया और वह राज्य का राजा बना. किंतु वह अधिक दिनों तक राजपाट न संभाल सका. उसका छोटा भाई विक्रम उसका वध कर स्वयं राजा बन बैठा.

राजा विक्रम वीर, बुद्धिमान और व्यवहारकुशल था. उसने कुशलतापूर्वक शासन किया और उसके शासनकाल में राज्य की सीमा का प्रसार और विस्तार भी हुआ. शीघ्र ही वह समस्त जम्बूद्वीप का सम्राट बन गया. किंतु, एक दिन राजा विक्रम के मन में विश्व-भ्रमण का विचार आया और वह राजपाट अपने छोटे भाई भर्तहरी को सौंपकर विश्व भ्रमण पर निकल गया.

धारा नगरी के एक गाँव में एक ब्राहमण रहता था. वह सदा ईश्वर की उपासना में लीन रहता था. एक बार उसने जंगल में ईश्वर की कठोर तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर ईश्वर ने उसे दर्शन दिये और वरदान स्वरुप एक फल प्रदान किया. वह फल अमरत्व का फल था. उसे जो भी खाता, वह अमर हो जाता.

ब्राह्मण प्रसन्नचित्त होकर घर गया और अपनी पत्नी को वह फल देकर सारी बात बता दी. पत्नी बोली, “प्राणनाथ! हम ठहरे निर्धन. अधिक जीकर क्या करेंगे? निर्धनता में ही जीवन कटेगा. इस फल पर तो राजा का अधिकार है. तुम ये उन्हें दे आओ.”

ब्राहमण को अपनी पत्नी की बात उचित प्रतीत हुई और वह फल लेकर राजा भर्तहरी के राजदरबार पहुँच गया. उसने फल भर्तहरी को समर्पित कर दिया और प्रतिफल में भर्तहरी ने उसे कोषालय से ढेरों स्वर्ण मुद्रायें प्रदान कीं. स्वर्ण मुद्रायें लेकर ब्राहमण वापस अपने घर चला गया.

भर्तहरी को अपनी रानियों में से एक रानी अतिप्रिय थी. वह फल लेकर उसके पास पहुँचा और उसे फल देकर कहा, “प्रिये! इस फल को खाकर तुम और तुम्हारा सौंदर्य अमरत्व प्राप्त कर लेगा.”

रानी ने फल ले लिया, किंतु खाया नहीं. उसका प्रेम-प्रसंग नगर के कोतवाल से था. उसने वह फल उसे दे दिया. कोतवाल का नगर की वेश्या के घर आना-जाना था. उसने वह फल उसे दे दिया. फल प्राप्त कर वेश्या ने सोचा – ‘यह फल खाकर मैं क्या करूंगी? राज्य का रक्षक राजा ही इसका अधिकारी है.’

वह फल लेकर भर्तहरी के पास पहुँची और उसे फल देकर उसके बदले ढेर सारा धन लेकर लौट गई. जब भर्तहरी ने फल को ध्यान से देखा, तो उसे वह जाना-पहचाना सा लगा. वह तुरंत रानी के पास गया और उससे पूछा, “प्रिये! मैंने तुम्हें जो फल दिया था, तुमने वह खाया या नहीं.”

“मैं वह फल खा लिया था राजन्!” रानी ने उत्तर दिया.

रानी का झूठ सुनकर भर्तहरी ने उसे वह फल दिखाया. अब रानी के पास सच कहने के अतिरिक्त कोई विकल्प न था. उसने सारी बात भर्तहरी को बता दी. सबकुछ जानकर भर्तहरी बहुत दु:खी हुआ. उसे लगने लगा कि यह दुनिया मात्र छलावा है. उसने वह फल खाया और राजपाट त्यागकर योगी का वेश धरकर वन की ओर प्रस्थान कर गया.

उसके जाने के बाद राजपाट चलाने वाला कोई न था. तब देवराज इंद्र ने अपने एक देव को धारा नगरी की निगरानी के लिए भेजा. वह देव रात-दिन नगर द्वार पर खड़ा रहकर नगर की निगरानी करने लगा.

इधर विश्व भ्रमण पर निकले राजा विक्रम को जब यह समाचार ज्ञात हुआ कि भर्तहरी ने राजपाट का त्याग कर दिया है, तो वह नगर लौट आया. किंतु, द्वार पर उसे देवराज इंद्र के भेजे देव ने रोक लिया. विक्रम ने उसे बाताया कि वह नगर का राजा है. किंतु देव ने उसका विश्वास नहीं किया और परीक्षा देने को कहा.

“यदि तुम वास्तव में इस नगर के राजा हो, तो मुझे युद्ध में पराजित करके दिखाओ.” देव ने उसे चुनौती दी.

चुनौती स्वीकार कर विक्रम देव से युद्ध करने लगा और कुछ ही देर में अपने पराक्रम से देव को पराजित कर दिया. देव समझ गया कि यह वास्तव में राज्य का राजा विक्रम है.

वह राज्य विक्रम को सौंपते हुए बोला, “मैं जा रहा हूँ. किंतु, जाने के पहले तुम्हें एक बात बताना चाहता हूँ. कुछ वर्ष पूर्व एक नगर और एक नक्षत्र में तीन व्यक्तियों ने जन्म लिया था – एक तुम थे, एक तेली और एक कुम्हार. तुम धारा नगरी के राजा बने और तेली पाताल लोक का राजा. कुम्हार निर्धनता का जीवन जीता रहा. उसके ह्रदय में तुम्हारे और तेली के प्रति ईर्ष्या समाई है. इसलिए उसने योग साधना द्वारा अर्जित शक्तियों द्वारा तेली का वध करके उसे शमशान में शीशम के पेड़ पर लटका दिया है. अब उसकी दृष्टि तुम पर है. तुम सावधान रहना.”

यह कहकर देव अंतर्ध्यान हो गये. विक्रम ने पुनः राज्य की कमान अपने हाथों में ले ली. प्रजा अपने राजा विक्रम के वापस आ जाने पर बहुत प्रसन्न थी.

एक दिन राजा विक्रम के दरबार में शांतिशील नामक एक योगी आया. उसने एक फल विक्रम को दिया और चला गया. विक्रम को उस योगी पर संदेह हुआ कि कहीं ये वही योगी तो नहीं, जिसके बारे में देव ने बताया था. इसलिए वह फल उसने नहीं खाया और उसे कोषाध्यक्ष को दे दिया.

योगी का विक्रम के दरबार में आना जारी रहा. वह आता और उसे एक फल देकर चला जाता. विक्रम भी वह फल कोषाध्यक्ष को दे देता. इस तरह कई दिन व्यतीत हो गये.

एक दिन विक्रम अस्तबल में अपने घोड़ों का मुआयना कर रहा था. योगी विक्रम को दरबार में न पाकर अस्तबल पहुँच गया और फल विक्रम के हाथ में देने लगा. पकड़ते समय फल विक्रम के हाथ से फिसलकर जमीन पर गिर पड़ा और फूट गया. उसके अंदर से एक मणि निकली, जिसे देखकर विक्रम सहित अस्तबल में उपस्थित समस्त व्यक्ति चकित रह गये.

विक्रम के अपने कोषाध्यक्ष को बुलाया और उसने फलों के बारे में पूछा. कोषाध्यक्ष ने बताया कि इतने दिनों में सारे फल सड़ गये हैं. किंतु आश्चर्य की बात है कि हर फल के भीतर से एक मणि निकली है. ये मणियाँ अनमोल है.   

विक्रम ने योगी से पूछा, “योगीराज! आपका मुझे इतने दिनों से फल के भीतर मणि रखकर क्यों देते रहे? आपका प्रयोजन क्या है?”

योगी ने उत्तर दिया, “राजन्! राजा, गुरू, वैध्य, ज्योतिषी और पुत्री के पास कभी खाली हाथ नहीं जाना चाहिए. आप इस राज्य के राजा हैं, आपके पास खाली हाथ कैसे आ सकता था.”

विक्रम समझ गया था कि योगी का कोई न कोई प्रयोजन अवश्य है. इसलिए वह उसे एकांत में ले गया. और पूछा, “योगीराज! बताइए मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ?”

योगी बोला, “राजन्! मैं गोदावरी नदी के किनारे स्थित शमशान में मंत्रसाधना कर रहा हूँ. मंत्रसाधना पूर्ण होते ही मेरा मनोरथ सिद्ध हो जायेगा. यदि तुम वास्तव में मेरे लिए कुछ करना चाहते हो, तो कल रात अकेले अपने हथियार सहित उस शमशान में आओ. तुम्हें क्या करना है, मैं तुम्हें वहीं बताऊंगा.”

योगी की बात सुनकर विक्रम चकित हुआ. किंतु, योगी का रहस्य जानने के लिए उसे शमशान में जाना ही था. उसने वह निमंत्रण स्वीकार किया और योगी को वचन दिया कि वह अगली रात शमशान अवश्य आयेगा.

अगली रात विक्रम अपनी तलवार लेकर शमशान पहुँचा. वहाँ उसने देखा कि योगी आँखें बंदकर मंत्र साधना में लीन है. उसने पास जाकर योगी को प्रणाम किया, तो योगी ने आँखें खोली और उसे बैठने का संकेत दिया. विक्रम उसके सामने बैठ गया. कुछ देर बाद योगी बोला, “राजन्! मैं वर्षों से एक मंत्र सिद्ध करने के लिए ये साधना कर रहा हूँ. मेरी साधना तभी पूर्ण होगी, जब तुम मेरे लिए यहाँ से दो कोस की दूरी पर दक्षिण दिशा में स्थित शमशान से शीशम के पेड़ पर लटका मुर्दा ले आओगे. क्या तुम मेरे लिए ये करोगे राजन्?”

“आपकी आज्ञा सिरोधार्य योगीराज!” कहकर विक्रम मुद्रा चला गया.

योगी वहीँ बैठा साधना करने लगा.

उस काली अंधियारी रात में विक्रम योगी की बताई दिशा में चला जा रहा था. रास्ते में सुनसान जंगल था, जिसमें भांति-भांति के जीव शोर मचा रहे थे. साँप फन फैलाये फुंफकार रहे थे. किंतु विक्रम निर्भीकता से आगे बढ़ा चला जा रहा था. अंततः वह उस शमशान में पहुँच गया, जो योगी ने उसे बताया था. वह अंदर गया और शीशम का वह पेड़ ढूंढने लगा, जिस पर मुर्दा लटका हो. एक कोने में उसे वह पेड़ दिखाई दिया. वह पेड़ के पास पहुँचा, तो देखा कि एक मुर्दा रस्सी के सहारे उस पर उल्टा लटका हुआ है.

विक्रम पेड़ पर चढ़ा और तलवार से रस्सी काट दी. मुर्दा नीचे गिर पड़ा. नीचे गिरते ही वह तेज आवाज़ में विलाप करने लगा. यह देख विक्रम अचरज में पड़ गया. उसने मुर्दे से पूछा, “बता तू कौन है?”

ये सुनकर मुर्दा हँसने लगा और फिर से पेड़ पर जाकर लटक गया. विक्रम ने फिर से उसे पेड़ पर चढ़ा और मुर्दे को नीचे उतारकर अपनी पीठ पर लाद लिया. फिर वह शमशान से निकल गया.

रास्ते में मुर्दे ने उससे पूछा, “कौन है तू? और मुझे कहाँ ले जा रहा है?”

विक्रम बोला, “मैं धारा नगरी का राजा विक्रम हूँ. मैं तुझे योगी के पास ले जा रहा हूँ. तू कौन है?”

“मैं बेताल हूँ.” मुर्दा बोला, “मैं तेरे साथ चलने को तैयार हूँ, किंतु एक शर्त पर.”

“वह क्या?” विक्रम ने पूछा.

“तुझे पूरे रास्ते मौन रहना है. कुछ बोलना नहीं हैं. तू बोला, तो मैं वापस वहीं उसी पेड़ पर जाकर लटक जाऊंगा.”

विक्रम शर्त मान गया और आगे बढ़ने लगा. कुछ देर बार बेताल बोला,  “रास्ता लंबा है. मैं तुझे एक कहानी सुनाता हूँ. तेरा समय भी कट जायेगा और मेरा भी.”

इसके बाद बेताल कहानी सुनाने लगा. 

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