सर्वश्रेष्ठ वर कौन? : विक्रम बेताल की नवीं कहानी | Vikram Betal Ninth Story In Hindi

फ्रेंड्स, इस पोस्ट में हम विक्रम बेताल की नवीं कहानी (Vikram Betal Ki Navi Kahani) शेयर कर रहे हैं। Vikram Betal Ninth Story In Hindi बेताल रास्ता काटने के लिए राजा विक्रम को नवीं कहानी सुनाता है। ये कहानी उज्जैन की राजकुमारी अनंगरति की है, जो विशेष कला में दक्ष पुरूष से विवाह करना चाहती थी। उससे विवाह करने के इच्छुक चार पुरूष आये, जो विभिन्न कलाओं में पारंगत थे। वे कलायें कौन सी थी? राजकुमारी ने किससे विवाह किया? यह जानने के लिए पढ़िए बेताल पच्चीसी की नवीं कहानी

Vikram Betal Ki Navi Kahani

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Vikram Betal Ki Navi Kahani
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उज्जैन नगर में एक साहसी राजा वीरदेव का शासन था। राजा जितना वीर था, उसकी पत्नी रानी पद्यरति उतनी ही रूपवती थी। उनके जीवन में समस्त सुख थे, किंतु वे संतान सुख से वंचित थे।

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पुत्र रत्न की प्राप्ति हेतु राजा और रानी ने मंदाकिनी के तट पर जाकर भोले शंकर की उपासना आरंभ की। कई दिनों तक चली उनकी उपासना अव भोले शंकर प्रसन्न हुए और एक आकाशवाणी हुई –

“मैं तुम्हारी आराधना से अत्यंत प्रसन्न हूँ। मेरा आशीर्वाद सदैव तुम्हारे साथ है। तुम्हारी समस्त मनोकामना पूर्ण होगी। शीघ्र ही तुम्हें महाप्रतापी पुत्ररत्न की प्राप्ति होगी और एक रूपवती कन्या भी तुम्हारे घर जन्म लेगी।”

राजा और रानी आनंदपूर्वक अपने नगर लौट आये। अगले वर्ष रानी पद्यरति ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम शूरदेव रखा गया। पुत्र के पश्चात रानी ने एक पुत्री को जन्म दिया, जिसके सौंदर्य के सामने अप्सरायें भी पानी भरती थी। उसका नाम अनंगरति रखा गया।

अनंगरति के युवा होने पर कई राज्यों के राजकुमारों ने उसके लिए विवाह प्रस्ताव भेजे, किंतु राजा को कोई भी प्रस्ताव अपनी पुत्री अनंगरति के योग्य नहीं लगा। उसने कोई भी प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया।

एक दिन वह अनंगरति से बोला, “पुत्री! तुम्हारे योग्य कोई वर मेरी दृष्टि में नहीं है। मैं चाहता हूँ कि तुम स्वयंवर द्वारा अपने लिए योग्य वर चुनो।”

अनंगरति बोली, “पिताश्री! मुझे इस कार्य में लज्जा का अनुभव होता है। अतः यह कार्य आप ही करें। मेरी यही विनती है कि आप मेरे लिए कोई ऐसा वर चुने, जो किसी विशेष कला में दक्ष हो।”

राजा ने उस दिन के उपरांत से अनंगरति के लिए अनूठी कला के ज्ञाता पुरुष की खोज प्रारंभ की।

एक बात दूरस्थ प्रदेशों तक फैली, जिसे सुनकर एक दिन चार पुरुष राजा के दरबार में उपस्थित हुए और राजकुमारी से विवाह की कामना प्रकट की। राजा ने उनका स्वागत किया और उन्हें अपनी कला का वर्णन करने को कहा।

पहला पुरुष कहने लगा, “मैं पंचपट्टिक नाम का शूद्र कुल में जन्मा पुरुष हूँ। मैं उत्तम वस्त्र निर्माण में कुशल हूँ। प्रतिदिन मैं पांच जोड़े वस्त्र निर्मित कर उनमें से एक जोड़ा देवता को चढ़ाकर एक जोड़ा ब्राह्मण को भेंट करता हूँ। एक जोड़ा मैं स्वयं पहनने के लिए अपने पास रखता हूँ। यदि आप राजकुमारी का विवाह मुझसे करेंगे, तो एक जोड़ी वस्त्र मैं उसे दूंगा और शेष एक जोड़ी वस्त्र हाट में बेचकर जीवन निर्वाह के लिए धन अर्जित करूंगा। महाराज, हमारा जीवन सुखमय होगा। अतः राजकुमारी अनंगरति का विवाह मुझसे करने की कृपा करें।”

दूसरा पुरुष बोला, “राजन! मैं एक वैश्य पुरुष हूँ और कई भाषाओं का ज्ञाता हूँ। मैं इस धरती के समस्त पशु-पक्षियों की बोलियाँ भी बोल सकता हूँ। आप राजकुमारी का विवाह मुझसे कर दें। मैं सदा उनका मनोरंजन करता रहूंगा।”

तीसरा पुरुष बोला, ““महराज! मैं ब्राह्मण हूँ और मेरा नाम जीवदत्त है। मुझमें मृत जीवों में प्राण डाल देने की विद्या है। कृपया मुझे राजकुमारी का वर स्वीकार करें, क्योंकि ऐसी अनूठी विद्या इस संसार में किसी के पास नहीं।”

चौथा पुरुष बोला, “राजन!  मेरा नाम खड्गधर है और मैं एक क्षत्रिय हूँ। मैं खड्ग विद्या में पारंगत हूँ और इस धरती पर मुझे खड्ग में मुझे कोई परास्त नहीं कर सकता। अतः आप राजकुमारी का विवाह मुझसे कर दें, मैं सदा उसकी रक्षा करूंगा।”

चार विभिन्न कलाओं में दक्ष उन पुरुषों की बात सुनकर राजा विचार करने लगा कि कौन अनंगरति के लिए सर्वश्रेष्ठ वर होगा।

इतनी कहानी सुनाकर बेताल रुक गया और विक्रमादित्य से बोला, “राजन! अब तुम बताओ कि राजकुमारी अनंगरति से विवाह के लिए उन चारों में से सर्वश्रेष्ठ वर कौन है? उत्तर जानते हुए भी यदि न बताया, तो तुम्हारे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जायेंगे।”

राजा विक्रम ने उत्तर दिया –

“प्रतिदिन पांच जोड़ी वस्त्र बनाने वाले शूद्र जुलाहे से विवाह कर राजकुमारी को क्या लाभ होगा? मात्र एक जोड़ी वस्त्र प्रतिदिन प्राप्त करने के लिए विवाह करने का कोई औचित्य नहीं।

पशु-पक्षियों की भाषा के ज्ञाता वैश्य पुरुष से भी विवाह करने का कोई औचित्य नहीं। उससे विवाह करके क्या प्राप्त होगा, मात्र कुछ समय का मनोरंजन!

जो ब्राह्मण पुरुष अपनी पंडिताई छोड़कर जादूगर बन गया है, उससे विवाह करने का कोई लाभ नहीं। क्योंकि एक न दिन सबको मृत्यु प्राप्त करना ही है। अनंत काल तक जीवित रहकर भी कोई क्या करेगा। इसलिए वह भी राजकुमारी का पति बनने के योग्य नहीं है।

अब शेष है क्षत्रिय पुरुष। वही राजकुमारी के लिए योग्य वर है। वह खड्ग विद्या में पारंगत है, साहसी और पराक्रमी है। वह राजकुमारी की रक्षा कर सकेगा। वाही सर्वश्रेष्ठ वर है। अतः राजकुमारी का विवाह उससे ही होना चाहिए।”

राजा ने विक्रम की बात सुनकर बेताल ने बोला, “तुमने सही उत्तर दिया है राजन। किंतु तुम मेरी शर्त भूल गये। तुम बोले और मैं चला।”

यह कहकर बेताल विक्रम के कंधे से उड़ चला और जाकर उसी मसान के पर पर लटक गया।

राजा विक्रम उसके भागा और मसान पहुँचकर बेताल को उस पेड़ से उतारकर अपनी पीठ पर लाद लिया। बेताल पुनः रास्ता काटने के लिए कहानी सुनाने लगा।

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