बच्चों के लिए प्रिंसेस की 5 बेडटाइम स्टोरीज | Bedtime Stories In Hindi For Princess

फ्रेंड्स, इस पोस्ट में हम बच्चों के लिए प्रिंसेस की बेडटाइम स्टोरीज (Bedtime Stories In Hindi Of Princess)  शेयर कर रहे हैं. बच्चों को राजकुमारियों की कहानियाँ बहुत पसंद होती है. सोते समय उन्हें सुनाने के लिए ये श्रेष्ठ कहानियाँ होती हैं. पढ़िये :

Bedtime Stories In Hindi Of Princess
Bedtime Stories In Hindi Of Princess

Bedtime Stories In Hindi Of Princess

बारह राजकुमारियों की कहानी 

बहुत समय पहले की बात है. एक राज्य में एक राजा राज किया करता था. उसकी बारह पुत्रियाँ थी. सभी बहुत सुंदर थी. वह सबसे बहुत प्रेम करता था. इसलिए उनकी सुरक्षा का विशेष ख्याल रखता था.

किसी भी राजकुमारी को महल से बाहर जाने की अनुमति नहीं थी. वे हर समय कड़ी सुरक्षा में रहती थीं. कुछ सैनिक हर समय उनके आस-पास रहते, ताकि उन पर किसी तरह का खतरा न आ सके.

राजुमारियाँ के रहने की व्यवस्था एक ही कक्ष में थी. रात में उनके सोने जाते ही वह कक्ष बाहर से बंद कर दिया जाता था. ताकि न वे कक्ष से बाहर निकल सकें, न ही कोई उनके कक्ष में प्रवेश कर सके. कक्ष के बाहर सैनिक तैनात रहते थे.

लेकिन इतनी सुरक्षा के बाद भी जब राजा सुबह राजकुमारियों से मिलता, तो उनके जूते फ़टे हुए होते थे. राजा हैरान रह जाता. पूछने पर राजकुमारियाँ कहती कि उन्हें भी नहीं पता कि उनके जूते कैसे फ़ट गए? हर दिन राजकुमारियों के लिए नए जूते लेने पड़ते.  

हर दिन राजकुमारियों के जूतों का फ़टना राजा के लिए एक रहस्य बनता जा रहा था. वह चाहता था कि इस रहस्य का पर्दाफाश हो. इसलिए अपने स्तर पर उसने कई प्रयास किये, लेकिन सफ़ल नहीं हो सका.

अंत में उसने राज्य में यह घोषणा करवा दी कि जो व्यक्ति तीन दिनों में राजकुमारियों के जूते फ़टने के कारण का पता लगा लेगा, उसका विवाह उसकी मनपसंद राजकुमारी से करवा दिया जायेगा. साथ ही उसे राजा का उत्तराधिकारी भी घोषित कर दिया जायेगा. लेकिन इस कार्य में असफ़ल रहने पर उसका सिर धड़ से अलग कर दिया जायेगा.

यह घोषणा पड़ोसी राज्यों तक भी पहुँची और पड़ोसी राज्यों के राजकुमार इस रहस्य का पता लगाने राजा के पास आने लगे. राजा उन्हें राजकुमारियों के कक्ष के साथ वाले कक्ष में ठहराता, ताकि उन्हें निगरानी करने में कोई असुविधा ना हो. लेकिन रात होते ही राजकुमार गहरी नींद में सो जाते और सुबह होने पर देखते कि राजकुमारियों के जूते फ़टे हुए हैं.

कई राजकुमारों को रहस्य का पता न लगा पाने के कारण अपने प्राण देने पड़े. अब राजकुमार भी अपने प्राणों के भय से इस रहस्य का पता लगाने में हिचकने लगे. राजा निराश हो गया. उसे लगने लगा कि अब यह रहस्य सदा रहस्य ही बना रहेगा.

उस राज्य के एक गाँव में एक गरीब युवक रहता था. एक दिन जब उसने राजा की घोषणा सुनी, तो वह राजकुमारी से विवाह के सपने देखने लगा. उसने सोचा कि गरीबी में जीवन यापन करने से अच्छा है कि इस रहस्य का पता लगाने में हाथ अजमाया जाए. सफ़ल रहा, तो राजकुमारी से विवाह के साथ-साथ राज्य का उत्तराधिकारी भी बन जायेगा. अन्यथा, इस गरीबी के जीवन से तो मृत्यु ही भली.

अगले दिन उसने एक पोटली में उसने कुछ रोटियाँ बांध ली और पैदल ही राजमहल की ओर निकल पड़ा. बिना रुके वह चला जा रहा था. शाम तक उसे किसी भी हालत में राजमहल पहुँचना था.

चलते-चलते दोपहर हो गई और उसे भूख लग आई. वह थक भी चुका था. इसलिए एक पेड़ ने नीचे भोजन करने और सुस्ताने के लिए बैठ गया. लेकिन जैसे ही उसने खाने के लिए पोटली खोली, एक बूढ़ी औरत वहाँ आ गई और उसने उससे खाना मांगा.

युवक भूख से बेहाल था, लेकिन दयावश उसने अपनी सारी रोटियाँ उस बूढ़ी औरत को दे दी. रोटियाँ खाकर वह औरत तृप्त हो गई और उसने युवक को ढेर सारा आशीर्वाद दिया. पूछने पर युवक ने उसे बताया कि वह राज्य की बारह राजकुमारियों के जूते फ़टने के रहस्य का पता लगाने जा रहा है.

तब बूढ़ी औरत ने उसे एक टोपी दी और बोली, “बेटा, ये कोई साधारण टोपी नहीं है. ये एक जादुई टोपी है. इसे तुम जब भी पहनोगे, अदृश्य हो जाओगे. हो सकता है, ये तुम्हारे काम आये. और हाँ, मेरी एक बात याद रखना, यदि राजकुमारियाँ तुम्हें कुछ भी खाने-पीने को दे, तो उसे मत खाना.”

टोपी लेकर युवक ने बूढ़ी औरत से विदा ली और महल की ओर चल पड़ा. शाम होते तक वह महल पहुँच गया. महल के द्वारपाल द्वारा उसे राजा के समक्ष ले जाया गया. उसने राजा को अपने आने का प्रयोजन बताया, तो राजा के राजकुमारियों के कक्ष के निकट एक कक्ष में उसके रहने की व्यवस्था कर दी.

रात में युवक अपने कक्ष में बैठा हुआ था कि सबसे बड़ी राजकुमारी शरबत लेकर उसके पास आई और उसे देते हुए बोली, “मैं यह शरबत भेंट कर आपका महल में स्वागत करती हूँ. आपने ऐसा शरबत पहले कभी नहीं पिया होगा.”

इतनी सुंदर राजकुमारी को देख युवक कुछ कह ही नहीं पाया और बूढ़ी औरत द्वारा दी गई चेतावनी भूल गया. शरबत का गिलास हाथ में लेकर वह उसे एक बार में ही गटक गया. राजकुमारी मुस्कुराते हुए चली गई.

राजकुमारी के जाते ही शरबत ने अपना असर दिखाया और युवक नींद के आगोश में समाने लगा. वास्तव में उस शरबत में नींद की दवा मिली हुई थी.

रात भर युवक गहरी नींद में सोता रहा. सुबह उठकर जब वह राजा के पास गया, तो उसे पता चला कि बारह राजकुमारियों ने जूते फटे हुए हैं. राजा ने उसे चेताया कि अब उसने पास मात्र दो दिन का समय शेष है. इन दो दिनों में यदि उसने राजकुमारियों के जूते फ़टने के रहस्य का पता नहीं लगाया, तो उसका सिर धड़ से अलग कर दिया जायेगा.

युवक को अपनी गलती का अहसास था. उसने तय किया कि वह आज की पूरी रात जागेगा और बूढ़ी औरत की दी हुई जादुई टोपी पहनकर राजकुमारियों के कक्ष में जाकर निगरानी करेगा.   

रात हुई, तो सबसे छोटी राजकुमारी शरबत लेकर युवक के पास आ गई. सारी राजकुमारियों में वह सबसे सुंदर थी. उसने जब शरबत का गिलास आगे बढ़ाया, तो युवक फिर बूढ़ी औरत की चेतावनी भूल गया. उस रात भी शरबत पीकर वह गहरी नींद सोया.

सुबह उठने पर उसे फिर से अपनी गलती का अहसास हुआ. राजा ने उसे बुलाकर अंतिम चेतावनी दे दी कि इस रात रहस्य का पता न लगा पाने पर वह अगली सुबह अपने प्राण गंवा देगा.

अब युवक के सामने करो या मरो की स्थिति थी. उसे उस रात हर हाल में जागना था और राजकुमारियों के जूते फ़टने के रहस्य का पता लगाना था.

रात में फिर से छोटी राजकुमारी शरबत लेकर उसके पास आई. लेकिन इस बार वह सावधान था. उसने शरबत का गिलास ले तो लिया, लेकिन पिया नहीं. राजकुमारी के जाने के बाद उसने शरबत खिड़की से बाहर फेंक दिया.

शरबत न पीने के कारण इस बार उसे नींद नहीं आई. देर रात वह बूढ़ी औरत की दी दुई जादुई पहनकर बारह राजकुमारियों के कमरे में चला गया. जादुई टोपी के कारण वह अदृश्य था. कोई उसे देख नहीं पा रहा था, लेकिन वह सब कुछ देख रहा था.

उसने देखा कि सभी राजकुमारियाँ सुंदर वस्त्र और नए जूते पहनकर सज-धजकर तैयार हैं. युवक ये देख हैरान था. उसे समझ नहीं आ रहा था कि रात के इस पहर राजकुमारियाँ इतनी तैयार क्यों हैं?

तभी सबसे बड़ी राजकुमारी सबसे छोटी राजकुमारी से बोली, “जाओ जाकर पता तो करो कि वह युवक सोया है या नहीं?”

छोटी राजकुमारी युवक के कक्ष की ओर की दीवार पर कान लगाकर खड़ी हो गई और उसके खर्राटे सुनने की कोशिश करने लगी. युवक समझ गया कि उसे खर्राटे की आवाज़ निकालनी होगी, ताकि राजकुमारियाँ उसकी ओर से निश्चिंत हो जाए.

वह अदृश्य अवस्था में दीवार के पास जाकर खर्राटे की आवाज़ निकालने लगा, जिससे छोटी राजकुमारी को लगा कि वह सो गया है. उसने सारी राजकुमारियों को ये खबर दे दी.

फिर सबसे बड़ी राजकुमारी ने बारह बिस्तरों में से एक बिस्तर खिसकाया और तीन बार ताली बजाई. ताली बजाते ही वहाँ की जमीन एक ओर ख़िसक गई. वह एक गुप्त मार्ग था, जहाँ नीचे की ओर सीढ़ियाँ बनी हुई थी.

सभी राजकुमारियाँ एक-एक कर उस गुप्त मार्ग में बनी सीढ़ियों से नीचे उतरने लगी. युवक भी उनके पीछे हो लिया. सीढ़ियाँ ख़त्म होने पर एक घना जंगल पड़ा. उस जंगल में लगे पेड़ों की डालियाँ सुनहरी थी. युवक ने एक सुनहरी डाली तोड़कर अपने पास रख ली.

जंगल पार कर राजकुमारियाँ एक झील के किनारे पहुँची, जहाँ बारह नावों में बारह राजकुमार उनका इतंजार कर रहे थे. सभी राजकुमारियाँ एक-एक नाव में बैठ गई. युवक सबसे छोटी राजकुमारी की नाव में बैठा.

नाव में बैठकर राजकुमारियाँ नदी पार करने लगी. छोटी राजकुमारी को अपनी नाव कुछ भारी प्रतीत हो रही थी. होती भी क्यों ना? युवक उसमें बैठा हुआ था. उसने पास ही एक दूसरी नाव में बैठी अपनी बड़ी बहन को ये बताया, तो वह हंसने लगी और बोली, “लगता है, आज वह नींद में है.”

फिर छोटी राजकुमारी कुछ न बोली. कुछ ही देर में नाव नदी पार पहुँच गई. सभी राजकुमारियाँ राजकुमारों के साथ नाव से उतरीं और आगे बढ़ने लगी. कुछ ही दूर रोशनी से जगमगाता एक शानदार महल था. उस महल में संगीत गूंज रही थी.

राजकुमारियाँ महल के अंदर चली गई. युवक भी पीछे-पीछे महल में चला गया. वहाँ उसने देखा कि कई युवक और युवतियाँ एक साथ नृत्य कर रहे हैं. राजकुमारियाँ भी राजकुमारों के साथ नृत्य करने लगी. युवक को अब बारह राजकुमारियों के जूते फ़टने का कारण समझ आ चुका था.

वह एक किनारे पर खड़ा होकर सबको नृत्य करते देखने लगा. थोड़ी देर बाद उसे भूख लगने लगी. उसने देखा कि उस कक्ष के एक किनारे पर रखी मेज़ पर ढेर सारे पकवान सजे हुए हैं. उसने एक मिठाई उठाई और अपने मुँह में डाल ली. उसी समय सबसे छोटी राजकुमारी की नज़र उस ओर चली गई और उसने मिठाई को हवा में उड़ते और गायब होते देख लिया.

यह देख वह डर गई. वह सबसे बड़ी राजकुमारी के पास गई और यह बात बताई, तो वह बोली, “लगता है तुम आज खुली आँखों से सपने देख रही हो.”

छोटी राजकुमारी क्या कहती? वह चुप हो गई. इधर युवक ने वहाँ रखे बर्तनों में से एक सुनहरा प्याला उठाया और अपने पास रख लिया.  

राजकुमारियाँ रात भर नृत्य करती रही. फिर सुबह होने पर महल से निकलकर नाव में बैठकर नदी पारकर जंगल से होते हुए सीढ़ियाँ चढ़कर गुप्त द्वार से अपने शयन कक्ष में आ गई. युवक भी उनके पीछे-पीछे वापस आ गया.

कुछ देर में ही राजा का बुलावा आ गया. जब वह दरबार पहुँचा, तो बारह राजकुमारियाँ भी वहाँ उपस्थित थीं. उनके जूते फटे हुए थे.

राजा ने युवक से पूछा, “क्या तुम राजकुमारियों के जूते फ़टने का रहस्य पता लगा पाए? यदि नहीं, तो अपनी अंतिम सांसे ले लो.”

युवक बोला, “महाराज! मैंने इस रहस्य के बारे में पता लगा लिया है.” और उसने रात की पूरी घटना राजा को बता दी. प्रमाण स्वरुप उसने जंगल में पेड़ से तोड़ी सुनहरी डाली और महल से उठाया सुनहरा प्याला राजा के समक्ष प्रस्तुत किया.

राजा ने जब राजकुमारियों से इस बारे में पूछा, तो उन्होंने भी ये बात स्वीकार कर ली. राजकुमारियों के जूते फ़टने का रहस्य उजागर हो चुका था. राजा ने अपना वचन निभाते हुए युवक से पूछा कि वह किस राजकुमारी से विवाह करना चाहता है. युवक ने सबसे छोटी राजकुमारी से विवाह की इच्छा जताई.

राजा ने युवक का विवाह सबसे छोटी राजकुमारी से करवा दिया और उसे अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया. इस तरह अपनी नेकदिली और निडरता से एक साधारण युवक उस राज्य का उत्तराधिकारी बन गया.

राजकुमारी और मटर की कहानी

बहुत समय पहले की बात है. एक राज्य में एक शक्तिशाली राजा राज करता था. उसकी एक सुंदर और समझदार रानी थी. दोनों का केवल एक ही पुत्र था. उसके पालन-पोषण और शिक्षा-दीक्षा में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी थी.

राजुकमार जब बड़ा हुआ, तो वह देखने में सजीला, व्यवहार में विनम्र और हर तरह से सुयोग्य था. पड़ोसी राज्यों के कई राजा अपनी पुत्रियों से राजकुमार का विवाह करवाना चाहते थे. इस संबंध में उन्होंने कई संदेशे राजा-रानी के पास भेजे. 

राजा-रानी चाहते थे कि राजकुमार का विवाह ऐसी लड़की से हो, जो सुंदर हो, समझदार हो, संवेदनशील हो और हर तरह से राजकुमार के योग्य हो. वे चाहते थे कि जो भी राजकुमार से विवाह करे, वो हर तरह से गुणी हो और सही मायने में राजकुमारी हो.

उन्होंने राजकुमार को उन राज्यों में भेजा, जहाँ से उसके लिए रिश्ते आये थे, ताकि वह राजकुमारियों से मिलकर उन्हें परख सके. राजकुमार ने कई राज्यों की यात्रा की, लेकिन वहाँ उसे कोई भी सही मायने में राजकुमारी नहीं लगी. हर किसी में कुछ न कुछ कमी थी.

वह अपने राज्य वापस आ गया. वह उदास था. उसे लगने लगा था कि उसके भाग्य में शायद पत्नि सुख लिखा ही नहीं है. इसलिए इस ओर से ध्यान हटा वह राज्य के कार्यों में लग गया.

कुछ माह बाद एक शाम राजमहल के द्वार पर किसी ने दस्तक दी. जब द्वार खोला गया, तो सामने एक लड़की खड़ी थी. उस समय घनघोर बरसात हो रही थी और उस लड़की की पोशाक भीगी हुई थी, बाल बिखरे हुए थे, जूतों में पानी भरा हुआ था और वह पूरी तरह से अस्त-व्यस्त लग रही थी.

उसने द्वारपाल को बताया कि वह पड़ोसी राज्य की राजकुमारी है और बरसात में फंस गई है. ऐसे मौसम में आगे जाना संभव नहीं, इसलिए रात गुज़ारने इस राज्य के राजा की शरण में आई है.

द्वारपाल उसे राजा-रानी के पास ले गया. उसकी दशा देख किसी को विश्वास नहीं हो रहा था कि वह राजकुमारी है. रानी के उसकी परीक्षा लेने की सोची, ताकि पता चल सके कि वह सही मायने में राजकुमारी है या नहीं.

उसके सोने का प्रबंध जहाँ किया गया, उस पलंग में २० मुलायम गद्दे बिछाए गए. फिर उसके ऊपर रेशम की चादर बिछाई गई. लेकिन रानी ने उन गद्दों के नीचे मटर का एक दाना रखवा दिया. राजकुमारी को उस बिस्तर पर सोने को कहा गया.

अगले दिन रानी बेसब्री से राजकुमारी के शयन कक्ष से बाहर आने का इंतज़ार कर रही थी. राजकुमारी जब अपने शयन कक्ष से बाहर आई और रानी के पास गई, तो रानी ने पूछा, “तुम्हें रात में नींद तो अच्छी आई ना?”

राजकुमारी बोली, “नहीं, मैं एक क्षण के लिए भी सो नहीं पाई, क्योंकि उस बिस्तर पर कुछ था, जो मुझे चुभ रहा था.”

यह सुनकर रानी को विश्वास हो गया कि वह सही मायने में राजकुमारी है. बीस गद्दों के नीचे रखे मटर को दाने को जो महसूस कर लें, ऐसी ये संवेदनशीलता एक राजकुमारी की ही हो सकती है. रानी को राजकुमार के लिए ऐसी ही राजकुमारी की तलाश थी.

राजकुमारी को उसके राज्य में छोड़ने स्वयं राजा और रानी गए. वहाँ के राजा के सामने उन्होंने अपने पुत्र के साथ राजकुमारी के विवाह का प्रस्ताव रखा, जिसे राजा ने स्वीकार कर लिया. कुछ दिनों बाद राजकुमार और राजकुमारी का विवाह हो गया और दोनों ख़ुशी-ख़ुशी रहने लगे.  

 सोई हुई राजकुमारी की कहानी 

एक खुशहाल राज्य में एक राजा और रानी रहा करते थे. सारी खुशियाँ होने के बावजूद वे दु:खी थे, क्योंकि विवाह को वर्षों बीत जाने बाद भी उनकी कोई संतान नहीं थी. वे हर समय भगवान से प्रार्थना करते कि उन्हें संतान प्राप्ति हो जाये.

एक सुबह रानी राजमहल के सरोवर के किनारे हाथ जोड़कर सूर्यदेवता से प्रार्थना कर रही थी, कि तभी एक चमत्कार हुआ. सूर्य की उजली किरण सरोवर के किनारे रखे पत्थर पर पड़ी और वह पत्थर एक मेंढक में परिवर्तित हो गया. मेंढक ने भविष्यवाणी की कि १ वर्ष के भीतर रानी एक बच्ची को जन्म देनी और ठीक वैसा ही हुआ.

१ वर्ष बाद रानी ने एक ख़ूबसूरत बच्ची को जन्म दिया. उस बच्ची के मुख पर सूर्य की किरणों सी चमक थी. उसका नाम ‘रोज़ामंड’ रखा गया.

पुत्री के जन्म की ख़ुशी में राजा-रानी ने एक बहुत बड़ा जश्न आयोजित किया, जिसमें राज्य की पूरी प्रजा को बुलाया गया. राज्य के बाहरी छोर पर स्थित सुनहरे वन में तेरह परियाँ रहा करती थी. राजा-रानी ने उनमें से बारह परियों को तो जश्न में बुलाया. किंतु वे तेरहवीं परी को बुलाना भूल गए.

जश्न के दिन पूरे राजमहल में उल्लास का वातावरण था. मधुर संगीत, नृत्य, रंगा-रंग कार्यक्रमों के साथ ही एक बड़े भोज का आयोजन किया गया था. नन्हीं राजकुमारी ‘रोज़ामंड’ सोने के पालने पर लेटी हुई थी. एक-एक सभी मेहमान राजकुमारी के पास आकर उसे उपहार के साथ आशीर्वाद भी दे रहे थे.  

परियों ने भी रोज़ामंड को बेशकीमती उपहार दिए. उपहारों के साथ ही उन्होंने कई आशीर्वाद भी रोज़ामंड को दिए. किसी ने उसे सुंदरता का, तो किसी ने दयालुता का आशीर्वाद दिया. किसी ने अपार धन का तो किसी ने सुंदर मन का आशीर्वाद दिया. यह सिलसिला ग्यारहवीं परी तक चला. बारहवीं परी के आशीर्वाद देने के पहले ही तेरहवीं परी वहाँ आ गई. वह जश्न में न बुलाये जाने के कारण बहुत क्रोधित थी.

उसने रोज़ामंड को श्राप दे दिया कि अपने सोलहवें जन्मदिन के दिन उसे एक सुई चुभेगी और वह मर जायेगी. श्राप देकर तेरहवीं परी वहाँ से चली गई.

जश्न में उपस्थित सभी लोग अवाक् रह गए. राजा-रानी बहुत दु:खी थी. वे परियों से प्रार्थना करने लगे कि किसी तरह रोज़ामंड को दिए गए श्राप को समाप्त कर दें. किंतु यह संभव नहीं था.

परियों ने बताया कि किसी भी श्राप को समाप्त नहीं किया जा सकता. यह सुनकर रानी विलाप करने लगी. बारहवीं परी का आशीर्वाद शेष था. रानी को विलाप करता देख वह बोली, “तेरहवीं परी का श्राप समाप्त तो नहीं किया जा सकता. किंतु मैं अपने आशीर्वाद से उसे कम कर सकती हूँ.”

उसने रोज़ामंड को आशीर्वाद दिया कि अपने सोलहवें जन्मदिन पर सुई चुभने पर वह मरेगी नहीं, बल्कि सौ वर्षों के लिए गहरी नींद में सो जाएगी.”

यह सुनकर राजा-रानी का दु:ख कुछ कम अवश्य हुआ. उन्होंने बारहवीं परी को धन्यवाद दिया. राजा-रानी की इच्छा रोज़ामंड का विवाह देखने की थी. वे परियों से बोले, “आपने तेरहवीं परी का श्राप कम कर दिया. इस बात की हमें बेहद ख़ुशी है. किंतु दुःख ये है कि हम लोग रोज़ामंड का विवाह नहीं देख  पाएंगे. जव सौ वर्षों एक बाद वह सोकर उठेगी, तब तक हम मर चुके होंगे.”

तब बारहवीं परी बोली, “जैसे ही रोज़ामंड सौ वर्षों के लिए सोयेगी. राजा-रानी सहित पूरी प्रजा भी सो जाएगी. रोज़ामंड के जागने पर ही सब जागेंगे और रोज़ामंड नींद से तब जागेगी, जब एक सच्चा प्यार करने वाला राजकुमार उसे चूम लेगा.”

इसके बाद सभी परियाँ राजमहल से चली गई. परियों के जाने के बाद राजा-रानी ने सेवकों से कहकर राजमहल के सारे चरखे और सुईयाँ नष्ट करवा दी. वे किसी भी सूरत में रोज़ामंड को दुष्ट परी के श्राप से बचाना चाहते थे.

दिन बीतने लगे और रोज़ामंड बड़ी होने लगी. वह बहुत सुंदर और दयालु होने के साथ ही बुद्धिमान भी थी. समस्त प्रजा उससे बहुत प्रेम करती थी.

आखिरकार, रोज़ामंड का सोलहवां जन्मदिन आ ही गया. राजा-रानी ने इस अवसर को धूम-धाम से मनाने के लिए शाम को एक बड़े जश्न और भोज का आयोजन किया था. किंतु वे चिंतित भी थे. उन्हें दुष्ट परी के श्राप के सच हो जाने की आशंका ने घेर रखा था. किंतु पूरा दिन बीत जाने के बाद भी कुछ नहीं हुआ. 

शाम को एक सेवक रानी के पिता का पत्र लेकर आया, जिसमें लिखा था कि रानी के पिता की तबियत बहुत ख़राब है. राजा-रानी तुरंत रानी के पिता से मिलने निकल पड़े. राजमहल से जाने के पहले उन्होंने अपनी विश्वासपात्र दासी डायना को हिदायत दी कि वह रोजामांड का ख्याल रखे और उसे राजमहल से बाहर जाने न दे. डायना ने भी उन्हें आश्वासन दिया कि वह रोजामांड को कुछ नहीं होने देगी.

राजा-रानी के जाने के बाद डायना साये की तरह रोजामांड के साथ रही. लेकिन जब वह भोजन बनाने में व्यस्त हुई, तो रोजामांड छुपकर बगीचे में आ गई और वहाँ पक्षियों के साथ खेलने लगी. खेलते-खेलते उसे एक फूल पर बैठी सुनहरी तितली नज़र आई. उसे पकड़ने जैसे ही रोजामांड ने हाथ बढ़ाया, वह उड़ गई. रोजामांड उसके पीछे भागने लगी.  

उड़ते-उड़ते तितली एक मीनार के सामने पहुँच गई. वह एक पुरानी मीनार थी और बहुत ऊँची थी. रोजामांड के मीनार के सामने पहुँचने पर तितली मीनार के भीतर चली गई. रोजामांड भी तितली के पीछे मीनार में चली गई.

मीनार में गोलाकार सीढ़ियाँ बनी हुई थी. रोजामांड तितली के पीछे जाते हुए सीढ़ियाँ चढ़ने लगी. तितली उड़ते-उड़ते मीनार के सबसे ऊपरी मंज़िल पर पहुँच गई और उसके पीछे रोजामांड भी. मीनार के उस हिस्से पर एक छोटा सा कमरा था. तितली के पीछे रोजामांड उस कमरे में चली गई. वहाँ एक बूढ़ी औरत चरखा चला रही थी.

रोजामांड ने कभी चरखा (Spinning Wheel) नहीं देखा था. वह आश्चर्य से उसे देखने लगी. बूढ़ी औरत ने जब सिर उठाकर रोजामांड  को देखा, तो रोजामांड ने पूछा, “आप ये क्या कर रही हैं?”

“मैं इस चरखे से सूत काट रही हूँ. क्या तुम भी सूत कातना चाहोगी?” बूढ़ी औरत ने उत्तर दिया.

  रोजामांड ने कभी चरखा नहीं देखा था. इसलिए उसका मन सूत कातने मचल उठा. वह चरखे के पास बैठ गई और चरखा चलाने लगी. बूढ़ी औरत उसे देखकर कुटिलता से मुस्कुराने लगी. वह बूढ़ी औरत और कोई नहीं बल्कि दुष्ट तेरहवीं परी थी.

बूढ़ी चरखा चलाते हुए बहुत ख़ुश थी, लेकिन अचानक ही एक नुकीली सुई उसकी उंगली में आ घुसी और वह गिर पड़ी. गिरते साथ ही वह गहरी नींद में सो गई. दुष्ट तेरहवीं परी का श्राप पूरा हो चुका था. वह हँसते हुए वहाँ से चली गई.

इधर राजा-रानी जब वापस लौटे, तो रोजामांड को महल में न पाकर चिंतित हो उठे. डायना भी उन्हें कुछ बता नहीं पाई. राजा ने सैनिकों को रोजामांड को ढूंढने के लिए भेजा. वे स्वयं भी उसे ढूंढने लगा. पूरा महल तलाशा गया, किंतु रोजामांड नहीं मिली.

खोजते-खोजते सैनिकों के साथ राजा-रानी मीनार में पहुँचे. वहाँ ऊपरी मंजिल के कमरे में उन्होंने रोजामांड को सोते हुए पाया. पास ही चरखा भी रखा हुआ था. वे समझ गए कि दुष्ट परी के श्राप ने अपना काम कर दिया है.

रानी दुःख के मारे विलाप करने लगी. तब राजा ने उसे समझाया कि हमें रोजामांड को लेकर महल चलना चाहिए क्योंकि कुछ ही देर में हम सब भी सो जायेंगे.

रोजामांड को राजमहल ले जाया गया और उसे तैयार कर मखमली बिछौने वाले एक बिस्तर पर लिटा दिया गया. सोती हुई रोजामांड बहुत ही सुंदर लग रही थी. कुछ ही देर में राजा-रानी, दरबारी और राज्य की पूरी प्रजा सो गई. काला बादल राज्य के ऊपर छा गया और पूरा राज्य अंधेरे में डूब गया. समय बीतने के साथ राज्य के चारों ओर कंटीली झाड़ियाँ उग गई और राज्य उसके पीछे छुप गया.

अब वह राज्य राज्य बस किस्से-कहानियों में रह गया था. वहाँ की सोयी हुई राजकुमारी के किस्से दूर-दूर तक सुनाये जाते थे. राजकुमारी को देखने की आस में कई राजकुमार उस राज्य में जाने का प्रयास करते, किंतु कंटीली झाड़ियों को पार नहीं कर पाते. कई घायल होकर वापस लौट आते, तो कई उनमें फंसकर मर जाते. राजकुमारों की मौत की ख़बर फैलने के बाद सबने वहाँ जाना छोड़ दिया.

ऐसे ही १०० वर्ष बीत गए. एक दिन इवान नामक राजकुमार ने सोयी हुई राजकुमारी की कहानी सुनी. कहानी सुनकर वह उसे चाहने लगा. उसने तय किया कि वह उसे एक बार देखने अवश्य जायेगा और उसे नींद से जगाने का प्रयास करेगा. ख़तरे को देखते हुए सबने उसे वहाँ जाने से मना किया. किंतु वह नहीं माना और रोजामांड की खोज में निकल पड़ा.

कई दिनों की लंबी यात्रा के बाद वह कंटीली झाड़ियों के पीछे छुपे उस राज्य के पास पहुँच गया, जहाँ रोजामांड सोई हुई थी. जिस दिन वह वहाँ पहुँचा, तब तक रोजामांड को सोये सौ वर्ष पूरे हो चुके थे. राजकुमार इवान ने कंटीली झाड़ियों को किसी तरह अपनी तलवार से काटकर पार किया और राज्य में घुस गया.

राज्य के अंदर जाने पर उसने देखा कि पूरी प्रजा सोयी हुई है. वह राजमहल के पास पहुँचा, तो दरबानों को भी सोता हुआ पाया. महल के अंदर प्रवेश कर वह राजदरबार में पहुँचा. वहाँ राजा-रानी सहित सारे दरबारी सो रहे थे. महल में घूमता हुआ वह अंततः उस कक्ष में पहुँच गया, जहाँ रोजामांड सोई हुई थी.

सोई हुई राजकुमारी रोजामांड को देखकर राजकुमार का उसके प्रति प्रेम और बढ़ गया. वह रोजामांड के पास गया और उसके हाथों को अपने हाथ में लेकर चूम लिया. जैसे ही उसके रोजामांड को चूमा दुष्ट परी का श्राप समाप्त हो गया और रोजामांड नींद की नींद टूट गई.

आँखें खोलते ही उसने एक सुंदर राजकुमार को अपने सामने पाया. वह जान गई कि यही वो सच्चा प्रेम करने वाला राजकुमार है, जिसने उसे सौ वर्षों की गहरी नींद से जगाया है. राजकुमार ने रोजामांड को बताया कि वह उससे प्रेम करता है और उससे विवाह करना चाहता है. रोजामांड ने उसका यह विवाह प्रस्ताव ख़ुशी-ख़ुशी स्वीकार कर लिया.

दोनो उस अकमरे से निकलकर राजदरबार पहुँचे, तो देखा कि राजा-रानी और सभी दरबारी भी नींद से जाग चुके हैं. सबने  रोजामांड और राजकुमार इवान का स्वागत किया. रोजामांड  ने राजा-रानी को राजकुमार से मिलवाया.

 राजा-रानी राजकुमार से मिलकर बहुत ख़ुश हुए. राजकुमार ने उनसे रोजामांड का हाथ मांगा और राजा-रानी ने ख़ुशी-ख़ुशी रोजामांड का हाथ राजकुमार इवान के हाथ में दे दिया.

राजमहल के ऊपर छाये काले बदल हट गए और वहाँ सूर्य फिर से चमकने लगा. सबने मिलकर सूर्य देवता की प्रार्थना की और उन्हें धन्यवाद दिया. उसी दिन रोजामांड और राजकुमार का विवाह कर दिया गया.

जब रोजामांड और राजकुमार का विवाह हुआ, तो सूर्य से आग का एक गोला निकला और दूर जंगल में बनी एक झोपड़ी पर जा गिरा. वह झोपड़ी में दुष्ट तेरहवीं परी की थी. झोपड़ी के साथ वह भी जलकर मर गई.

रोजामांड और राजकुमार इवान ख़ुशी-ख़ुशी रहने लगे.

सिन्ड्रेला की कहानी

एक नगर में एक धनी व्यापारी रहा करता था. उसकी ‘एला’ नाम की एक बहुत  सुंदर बेटी थी. एला की माँ नहीं थी. बिन माँ की बच्ची एला को उसके पिता बहुत प्यार करते और उसकी हर ज़रूरतों का ख्याल रखते थे. एला भी अपने पिता से बहुत प्यार करती थी. लेकिन माँ की कमी उसे अक्सर महसूस होती और वह उसे याद कर रोया करती थी.

एला के पिता व्यापार के सिलसिले में अक्सर नगर से बाहर रहते थे. अपने पीछे उसे सदा एला की चिंता सताया करती थी. इसिलिये दूसरा विवाह कर वे एला के लिए माँ ले आये. एला की सौतेली माँ एक दुष्ट औरत थी. उसका इरादा एला के पिता की दौलत पर ऐशो-आराम का जीवन व्यतीत करना था. उसकी पहले से ही दो बेटियां थी. वे बदसूरत और अपनी अपनी माँ की तरह दुष्ट थी.

शादी के बाद एला की सौतेली माँ और बहनें उसके घर पर रहने लगी. एला के पिता के सामने तो वे उससे बहुत मीठी बातें और बहुत अच्छा व्यवहार करती. लेकिन उसके पीठ पीछे उसे तंग करने का कोई अवसर हाथ से जाने नहीं देती थी.

एक रोज़ एला के पिता को व्यापार के सिलसिले में नगर से बाहर जाना पड़ा. कई महिने गुजर गए. एला इंतज़ार करती रही. लेकिन उसके पिता नहीं लौटे. एक दिन उनके मौत की ख़बर आई. पिता के जाने के बाद एला अकेली रह गई थी. उसकी दुष्ट सौतेली माँ घर की मालकिन बन बैठी और एला की हालत अपने ही घर में नौकरानी जैसी हो गई.  

राजकुमारी की तरह जीवन जीने वाली एला को उसकी सौतेली माँ पहनने के लिए फटे-पुराने कपड़े देती और घर का पूरा काम करवाती. फटे-पुराने कपड़ों में भी एला बहुत सुंदर लगती थी. इसलिए उसकी दोनों बदसूरत बहनें उससे जलती-कुढ़ती रहती थी.   

अकेली एला के दोस्त उस घर में रहने वाले दो चूहे और एक नन्ही चिड़िया थी. दिन भर काम करने के बाद जब भी समय मिलता, वह उनके साथ खेला करती. रात को थककर वह अंगीठी के किनारे ही सो जाती. सोते समय अंगीठी की राख (सिंडर) छिटककर उस पर गिरने लगती. सुबह-सुबह उस पर अंगीठी की राख बिखरी होती, जिसे देखकर उसकी सौतेली बहनें उसे ‘सिंडर-एला’ के नाम से चिढ़ाती. धीरे-धीरे उसका नाम ‘सिन्ड्रेला’ (Cinderella) पड़ गया.

एक बार पूरे राज्य में यह घोषणा हुई कि राजा राजमहल में एक बहुत बड़े जलसे का आयोजन कर रहे हैं. उस जलसे में आने वाली लड़कियों में से ही एक लड़की राजकुमार विवाह के लिए चुनेंगे. जलसे में राज्य की सभी लड़कियों को बुलाया गया.

इस घोषणा के बारे में जब सिन्ड्रेला की सौतेली बहनों को पता चला, तो वे भी जलसे में जाने की तैयारियाँ करने लगी. सिन्ड्रेला भी राजमहल का जलसा देखने उत्साहित थी. लेकिन उसकी सौतेली माँ सिन्ड्रेला के वहाँ जाने के खिलाफ़ थी. उसे पता था कि सिन्ड्रेला की सुंदरता के सामने उसकी बदसूरत बेटियों की दाल नहीं गलने वाली. उसने सिन्ड्रेला को जलसे में जाने की अनुमति नहीं दी.

जलसे के दिन सिन्ड्रेला को दुगुना काम सौंपकर उसकी सौतेली माँ अपनी दोनों बेटियों के साथ जलसे में चली गई. उदास सिन्ड्रेला दिन भर घर का काम करती रही और जलसे के बारे में सोचती रही. काम ख़त्म कर जब वह अंगीठी के पास बैठी, तो नन्हीं चिड़िया और दोनों चूहे उसकी पास आये और उसका मन बहलाने की कोशिश करने लगे. लेकिन उदास सिन्ड्रेला का मन नहीं बहला और उसकी आँखों में आँसू आ गए. वह अपनी माँ को याद करने लगी और सोचने लगी कि उसकी माँ होती, तो आज वह भी जलसे में जा पाती.

सिन्ड्रेला यह सोच ही रही थी कि अचानक उसके सामने एक परी प्रकट हुई. परी ने सिन्ड्रेला से उसकी उदासी का कारण पूछा, तो उसने जलसे की बात उसे बता दी. परी ने सिन्ड्रेला को जलसे में जाने के लिए तैयार किया. अपनी जादुई छड़ी से उसके उसके फटे-पुराने कपड़े को नये और ख़ूबसूरत कपड़े में बदल दिया. रसोई में रखे कद्दू को उसके जादू से एक ख़ूबसूरत बग्गी बना दी. दोनों चूहे घोड़े बन गए और चिड़िया कोचवान.

सिन्ड्रेला के ख़ूबसूरत पैरों में परी ने काँच की जूतियाँ पहनाई और आँखों पर नक़ाब पहना दिया. अब सिन्ड्रेला बग्गी पर बैठकर जलसे में जाने के लिए तैयार थी. जाते-जाते परी ने उसे कहा कि उसका जादू रात १२ तक ही है. १२ बजे के पहले उसे किसी भी सूरत में वापस आना होगा, नहीं तो जादू समाप्त होते ही वह अपने फटे-पुराने कपड़ों में आ जायेगी. सिन्ड्रेला ने परी को वचन दिया कि वह रात १२ बजे के पहले घर वापस आ जाएगी और जलसे के लिए निकल गई.

सिन्ड्रेला जब जलसे में पहुँची, तो सब उसकी सुंदरता देखकर हैरान थे. वह जलसे की सबसे सुंदर लड़की थी. जब उसकी सौतेली बहनों ने उसे देखा, तो जल-भुन कर रह गई. लेकिन नक़ाब के कारण उसे पहचान न सकी. राजकुमार की नज़रें भी सिन्ड्रेला पर ठहर गई.  

राजकुमार को पहली ही नज़र में सिन्ड्रेला से प्रेम हो गया था. वह उसे पास गया और उसे नृत्य के लिए आमंत्रित किया. सिन्ड्रेला और राजकुमार पूरी शाम एक साथ नृत्य करते रहे. जलसे में उपस्थित हर लड़की उन्हें देखकर ईर्ष्या करती रही.  नृत्य करते समय राजकुमार ने सिन्ड्रेला से उसके बारे में पूछा, तो सिन्ड्रेला ने अपनी पहचान छुपा ली और उसे कुछ नहीं बताया.

बहुत दिनों बाद घर से बाहर निकली सिन्ड्रेला बहुत ख़ुश थी. इस ख़ुशी में परी की बात उसने ज़ेहन से निकल गई. रात के १२ बजते साथ ही जब घड़ी का घंटा बजा, तो उसे परी की बात याद आई कि १२ बजे के पहले उसे हर हाल में वापस आना है.

वह राजकुमार का हाथ छुड़ाकर महल के बाहर खड़ी बग्गी की ओर भागी. राजुकमार उसे जाने नहीं देना चाहता था. वह भी उसके पीछे भागा. भागते-भागते महल के दरवाज़े के पास सिन्ड्रेला के एक पैर की जूती निकल गई. सिन्ड्रेला के पास उसे फिर से पहनने का समय नहीं था. वह उसे वहीं छोड़कर बग्गी में बैठ गई. राजकुमार जब दरवाज़े तक पहुँचा, बग्गी जा चुकी थी और सिन्ड्रेला भी. राजकुमार उदास हो गया और महल में जाने लगा. तभी दरवाज़े पर पड़ी काँच की जूती पर उसकी नज़र पड़ी और उसने उसे उठा लिया.

इधर सिन्ड्रेला जैसे ही घर पहुँची, परी के जादू का प्रभाव समाप्त हो गया. वह पहले की तरह अपने फटे-पुराने कपड़ों में आ गई. बग्गी फिर से कद्दू बन गया. चूहे और नन्ही चिड़िया भी अपने असली रूप में वापस आ गये. लेकिन सिन्ड्रेला बहुत ख़ुश थी. उसने परी का शुक्रिया अदा किया. परी उसे ढेर सारा आशीर्वाद देकर वापस चली गई.

दिन बीतने लगे. राजकुमार के मन में अब भी सिन्ड्रेला बसी हुई थी. वह उसे भूल नहीं पा रहा था. उसने मन बना लिया कि वह किसी भी तरह सिन्ड्रेला को ढूंढ निकलेगा और उससे विवाह करेगा. सिन्ड्रेला को ढूंढने के लिए उसके पास उसकी काँच की जूती थी. उसने पूरे राज्य में यह घोषणा करवा दी कि जिस भी लड़की के पैर में काँच की वह जूती आ जायेगी. वह उससे विवाह करेगा.  

राज्य की सभी लड़कियाँ राजुकमार से विवाह करने की इच्छुक थी. सभी उस काँच की जूती को अपना बताकर पहनने का प्रयास करने लगी. लेकिन वह जूती किसी के पैरों में नहीं आई. राजकुमार सेवकों के साथ नगर-नगर घूम रहा था. एक दिन घूमते-घूमते वह सिन्ड्रेला के घर पहुँच गया.

सिन्ड्रेला की माँ ने राजकुमार का स्वागत कर उसे घर के अंदर ले गई. वहाँ उसे अपनी दोनों बेटियों से मिलवाया. लेकिन सिन्ड्रेला को राजकुमार के सामने आने नहीं दिया. सिन्ड्रेला की सौतेली बहनें काँच की वह जूती पैर में घुसाने में लग गई. लेकिन लाख कोशिशों के बाद भी वह उनके पैरों में नहीं आई.

निराश राजकुमार वहाँ से जाने लगा था, कि उसकी नज़र परदे के पीछे से झांकती सिन्ड्रेला पर पड़ गई. सिन्ड्रेला की माँ के बहुत मना करने के बाद भी उसने उसे जूती पहनने के लिए बाहर बुला लिया. सिन्ड्रेला ने बाहर आकर जब जूती पहनी, तो वह उसके पैर में आ गई. उसने दूसरी जूती भी निकालकर पहन ली. यह देखकर उसकी सौतेली माँ और बहनों की आँखें फटी की फटी रह गई.

लेकिन राजकुमार समझ गया था कि सिन्ड्रेला ही वह लड़की है, जो उसे जलसे में मिली थी और जिससे वह प्रेम करने लगा था. उसने सिन्ड्रेला के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा. सिन्ड्रेला ने भी वह प्रस्ताव सहर्ष स्वीकार कर लिया. राजकुमार और सिन्ड्रेला का विवाह हो गया और दोनों ख़ुशी-ख़ुशी रहने लगे. 

मेंढक राजकुमार की कहानी 

एक राज्य में एक दयालु राजा का शासन था. उसकी एक बहुत सुंदर बेटी थी. उजला रंग, तीखे नैन-नक्श और सुनहरे बालों के साथ वह परी सी लगती थी. राजा उससे बहुत प्रेम करता था.

राजकुमारी जितनी सुंदर थी, उतनी ही जिद्दी और अड़ियल भी थी. बात-बात पर वह किसी का निरादर कर देती या कटु शब्द कह देती थी. राजा सदा उसे नम्र और दयालु बनने की सीख दिया करता, उसे बहुत समझाता. किंतु राजकुमारी उन सीखों और समझाईशों को अनसुना कर देती थी. उस पर कोई असर न होता देख राजा ने सब समय पर छोड़ दिया.

राजकुमारी के १६वें जन्मदिवस के दिन राजा ने उसे बुलाया और उपहार में एक सुनहरी गेंद दी. साथ ही यह हिदायत भी दी कि इस गेंद को मत गुमाना. उपहार  पाकर राजकुमारी बहुत ख़ुश हुई. वह दौड़कर बाग़ में चली गई और गेंद से खेलने लगी. खेलते-खेलते अचानक वह गेंद उछलकर बाग़ के कोने में स्थित कुएं में जा गिरी.

राजकुमारी दौड़कर कुएं के पास पहुँची और मुंडेर पर खड़ी होकर अंदर झांकने लगी. गेंद कुएं के पानी पर तैर रही थी, किंतु उसे उस गहराई से बाहर निकाल पाना राजकुमारी के लिए असंभव था. वह दु:खी होकर रोने लगी.

तभी एक आवाज़ उसके कानों में पड़ी, “राजकुमारी! क्या बात है? क्यों रो रही हो?”

राजकुमारी चौंक गई और इधर-उधर देखने लगी.

“नीचे कुएं में देखो. मैं यहाँ रहने वाला मेंढक हूँ.” वह आवाज़ फिर से गूंजी.

राजकुमारी ने ध्यान दिया, तो उसे कुएं की दीवार से चिपका एक मेंढक दिखाई पड़ा.

मेंढक ने फिर से पूछा, “क्यों रो रही हो राजकुमारी? बताओ ना!”

“मेरी सुनहरी गेंद कुएं में गिर गई है. समझ नहीं आ रहा कि उसे कैसे निकालूं.”

“बस इतनी सी बात. मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूँ और तुम्हारी गेंद कुएं से बाहर निकालकर तुम्हें दे सकता हूँ.”

“सच” राजकुमारी चहकते हुए बोली.

“बिल्कुल सच. लेकिन पहले तुम ये बताओ कि यदि मैं तुम्हारी मदद करूंगा, तो बदले में तुम मेरे लिए क्या करोगी?”

“जो तुम बोलो.” राजकुमारी ने उत्तर दिया, “मैं तुम्हें अपना सोने का हार, मोतियों की माला और अपना हीरों का मुकुट देने तैयार हूँ. बस तुम मेरी सुनहरी गेंद कुएं से बाहर निकाल दो.”

“मैं इस सब चीज़ों का क्या करूंगा? मुझे ये सब नहीं चाहिए. मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे अपना दोस्त बना लो और मुझे अपने साथ महल ले चलो. मेरे साथ खेलो, एक ही थाली में भोजन करो और मुझे अपने साथ अपने बिस्तर पर सुलाओ. यदि तुम ये करने का वचन देने तैयार हो, तो मैं तुम्हारी गेंद अभी बाहर निकाल देता हूँ.”

राजकुमारी को किसी भी सूरत में अपनी सुनहरी गेंद वापस चाहिए थी. इसलिये उसने बेमन से वचन दे दिया. मेंढक ने तुरंत राजकुमारी की गेंद कुएं से बाहर फेंक दी. गेंद मिलते ही राजकुमारी भागकर महल के भीतर चली गई. इधर मेंढक उसे पुकारता रह गया.

रात को राजा, रानी और राजकुमारी एक साथ भोजन करने बैठे. उन्होंने भोजन करना प्रारंभ ही किया था कि दरवाज़े पर दस्तक हुई. राजा ने राजकुमारी से कहा, “देखो दरवाज़े पर कौन है?”

राजकुमारी उठकर दरवाज़ा तक गई और दरवाज़ा खोलकर बाहर देखने लगी. उसे कोई नज़र नहीं आया. वह दरवाज़ा बंद करने को हुई, तो मेंढक के टर्र-टर्र की आवाज़ उसके कानों में पड़ी. राजकुमारी ने चौंककर जमीन की ओर देखा. वहाँ वही कुएं वाला मेंढक खड़ा था. वह बोला, “राजकुमारी, तुम मुझे छोड़कर क्यों चली आई? भूल गई, तुमने मुझे क्या वचन दिया था.”

राजकुमारी चिढ़कर बोली, “तुम जैसे घिनौने और बदसूरत मेंढक को मैं नहीं देखना चाहती. मैं अपना वचन भूल गई हूँ. तुम भी भूल जाओ और भागो यहाँ से.”

गुस्से में दरवाज़ा बंदकर राजकुमारी अंदर चली आई. उसे विश्वास नहीं हो रहा था  कि वह अदना सा मेंढक उसके पीछे-पीछे महल तक चला आया है.

अंदर आकर मेज पर बैठकर वह खाना खाने लगी. राजा ने पूछा, “दरवाज़े पर कौन है?”

“एक बदसूरत और घिनौना मेंढक.” राजकुमारी ने उत्तर दिया. फिर उसने गेंद के कुएं में गिरने की घटना और मेंढक को दिए वचन के बारे में राजा को बताया.

राजा बोला, “हर मनुष्य को अपना वचन निभाना चाहिए. तुम तो राजकुल की हो, तुम्हारी ज़िम्मेदारी दूसरों से ज्यादा है. तुरंत जाओ और दरवाज़ा खोलो. मेंढक को अंदर लेकर आओ और अपना वचन निभाओ.”

न चाहते हुए भी राजकुमारी उठी और दरवाज़ा खोलकर मेंढक को अंदर ले आई. अंदर आकर मेंढक कूदकर खाने की मेज़ पर राजकुमारी की थाली के पास बैठ गया और बोला, “राजकुमारी, मुझे भूख लगी है. अपनी थाली में से मुझे भी भोजन कराओ.”

“गंदे मेंढक, मैं ऐसा बिल्कुल नहीं करूंगी.” राजकुमारी नाक-भौं सिकोड़ते हुए बोली.

राजकुमारी के उत्तर पर राजा क्रोधित हो गए और बोले, “तुमने मेंढक को वचन दिया है. इसलिए तुम्हें इसे अपनी थाली में से खाना खिलाना पड़ेगा.”

बेमन से राजकुमारी ने मेंढक को अपनी थाली में से भोजन कराया. मेंढक ख़ुश हो गया. भर पेट भोजन करने के बाद मेंढक बोला, “अब मुझे नींद आ रही है. मुझे अपने कमरे में ले चलो. मैं तुम्हारे नरम बिस्तर पर सोऊंगा.”

राजकुमारी मेंढक को छूना नहीं चाहती थी. किंतु राजा के डर से वह उसे उठाकर अपने कमरे में ले गई. वहाँ जाकर उसे एक कोने में छोड़कर ख़ुद नरम बिस्तर पर लेट गई.

मेंढक बोला, “राजकुमारी! मैं भी थका हुआ हूँ. मुझे भी अपने बिस्तर पर सोने दो.” राजकुमारी का गुस्सा बढ़ चुका था. वह उठी और उसने मेंढक को उठाकर दीवार पर फेंक दिया और बोली, “तुम ऐसे ही चुप रहोगे.”

दीवार से टकराकर मेंढक नीचे गिर पड़ा. उसकी हलचल बंद हो गई. यह देखकर राजकुमारी डर गई. उसे लगा कि मेंढक मर गया है. वह अपने किये पर पछताने लगी. वह मेंढक के पास ज़मीन पर बैठ गई और रोने लगी. रोते-रोते उसने मेंढक को उठाया और चूमते हुए बोली, “मुझे माफ़ कर दो मेंढक. मुझे तुमसे ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए था.”

तभी अचानक एक चमत्कार हुआ और मेंढक एक राजकुमार में बदल गया. अपने सामने राजकुमार को देख राजकुमारी चकित रह गई. राजकुमार ने उसे बताया कि वनदेवी के श्राप के कारण वह मेंढक बन गया था. आज वह श्राप टूट गया और वह अपने असली रूप में आ पाया है.

राजकुमार ने राजकुमारी को अपने मेंढक की कहानी सुनाई, “मैं बहुत कठोर स्वभाव का था. निरीह प्राणियों के शिकार में मुझे बहुत आनंद आता था. एक दिन वन में शिकार करते समय वनदेवी ने मुझे रोका, तो मैंने उनका निरादर कर दिया. तब वनदेवी ने श्राप देकर मुझे मेंढक बना दिया. वह जानती थी कि निरीह प्राणियों पर क्या गुजरती है, मैं वह तब समझ सकूंगा, जब सांप जैसे जीवों के कारण खुद मेरी जान पर बन आएगी. मैं पछताने लगा और क्षमा मांगने लगा. तब वनदेवी ने श्राप का तोड़ बताया कि जब किसी जिद्दी, अड़ियल और कठोर हृदय राजकुमारी का स्वभाव तुम्हारे वजह से बदल जायेगा और वह चूमेगी, तब तुम अपने असली रूप में वापस आ पाओगे.”

“आज तुम्हारा ह्रदय मेरे प्रति दया से भर उठा और तुमने मेरे लिए आंसू बहाते हुए मुझे चूमा, तो मैं अपने असली रूप में आ गया. तुम्हारा बहुत धन्यवाद. आशा है, अब से तुम दयालु और कोमल ह्रदय ही रहोगी.”

राजकुमार की कहानी सुनकर राजकुमारी की आँखें खुल गई और उसने निश्चय किया कि वह कभी किसी का निरादर नहीं करेगी और दयालु बनेगी.

राजकुमार राजकुमारी से प्रेम करने लगा था. उसने उसके सामने विवाह का प्रस्ताव रखा. राजकुमारी ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया. राजा-रानी के आशीर्वाद से दोनों का विवाह हुआ और दोनों ख़ुशी-ख़ुशी रहने लगे.

 सुंदरी और राक्षस की कहानी 

एक नगर में एक धनी व्यापारी अपनी तीन बेटियों के साथ रहता था. सबसे बड़ी बेटी का नाम ब्लिस था. मझली का ब्लॉसम और सबसे छोटी बेटी का नाम ब्यूटी (Beauty) था.

पत्नि की मृत्यु के बाद से बेटियों की देखभाल की सारी ज़िम्मेदारी उसने ख़ुद ही संभाली थी. समय के साथ उसकी तीनों बेटियाँ बड़ी हुई. तीनों में ब्यूटी की सुंदरता सबसे ज्यादा निखरी.

ब्यूटी की सुंदरता के कारण दोंनो बड़ी बहनें उससे जलने लगी. वे दोनों गुस्सैल, लालची और स्वार्थी स्वभाव की थी. लेकिन ब्यूटी का स्वभाव नम्र और दयालु था. अपनी बहनों के विपरीत वह उनसे प्रेम करती थी. 

एक बार भयंकर समुद्री तूफ़ान में व्यापारी के सामान से लदे जहाज फंस गए. कई जहाज समुद्र में डूब गए. कई लापता हो गए. व्यापारी की बहुत बड़ी राशि इन जहाजों और समानों पर लगी हुई थी. इस नुकसान से उसका पूरा व्यवसाय बर्बाद हो गया. नुकसान की भरपाई करते-करते उसका सब कुछ बिक गया. घर छोड़कर उसके पास कुछ न बचा.

ऐसे में वह अपनी बेटियों के साथ गरीबी का जीवन व्यतीत करने विवश था. धन-धान्य के भरपूर जीवन जीने की आदी दोनों बड़ी बेटियों को अभाव का ये जीवन रास नहीं आ रहा था. वे दिन-भर अपने पिता को कोसती रहती थीं. घर के काम से उन्हें कोई लेना-देना नहीं था. अपना अधिकांश समय वे आराम करने में बिताती थीं. इस कारण घर का सारा काम ब्यूटी के हिस्से आता. 

गरीबी के जीवन की आदी ब्यूटी भी नहीं थी. लेकिन वह अपने पिता का दुःख समझती थी. इसलिए उन हालातों में भी वह अपने पिता की ख़ुशी का ख्याल रखने की कोशिश किया करती थी. वह घर का सारा काम ख़ुशी-ख़ुशी करती और हर समय ख़ुश रहती थी.

कई महिने बीत गये. एक दिन व्यापारी को कहीं से ख़बर मिली कि उसके लापता जहाजों में से एक जहाज बंदरगाह पहुँच गया है. इस  ख़बर को सुनकर व्यापारी ख़ुश हो गया और बंदरगाह जाने की तैयारी करने लगा. 

बंदरगाह रवाना होने के पहले व्यापारी ने अपनी बेटियों से पूछा कि वापसी में वह उनके लिए क्या लेकर आये? दोनों बड़ी बेटियों ने कपड़े, जूते, आभूषण और ऐसी ही अन्य चीज़ों की सूची बनाकर उसे दे दी. जब ब्यूटी की बारी आई, तो वह बोली, “पिताजी! आप मेरे लिए एक सुंदर लाल गुलाब का फूल लेकर आना.”

व्यापारी बंदरगाह जाने के लिए रवाना हो गया. लंबी यात्रा कर जब वह बंदरगाह पहुँचा, तो बहुत निराश हुआ. उसका जहाज टूट चुका था. उस पर लदा पूरा सामान नष्ट हो गया था. अब वह क्या करता? खाली हाथ घर लौटने लगा.

वापस लौटते-लौटते रात हो गई थी. रास्ते में एक घना जंगल पड़ता था. व्यापारी जल्दी से वह जंगल पार कर लेने की कोशिश में था. लेकिन वह अचानक शुरू हुए आंधी-तूफ़ान में फंस गया. आगे का सफ़र जारी रख पाना अब संभव नहीं था.

वह कोई ठिकाना ढूंढने लगा, ताकि वहाँ रात बिता सके. जंगल में इधर-उधर भटकने के बाद उसे एक जगह रौशनी नज़र आई. वह रौशनी की दिशा में चलने लगा. पास पहुँचने पर उसने देखा कि वह रौशनी एक महल से आ रही है.  रात गुजारने के लिए आसरे की उम्मीद में वह महल के दरवाज़े पर पहुँचा. 

महल का दरवाज़ा खुला हुआ है. उसने दरवाज़े से ही आवाज़ लगाई, “कोई है? कोई है?” लेकिन महल के भीतर से कोई बाहर नहीं आया. कुछ देर इतंजार करने के बाद वह अंदर चला गया.

वह महल शानदार था. वहाँ सभी चीज़ें करीने से सजी हुई थी. व्यापारी ने फिर से आवाज़ लगाईं. लेकिन इस बार भी कोई नहीं आया. यह व्यापारी को कुछ विचित्र लगा. वह महल में घूमने लगा कि कहीं कोई उसे दिखाई पड़ जाये. लेकिन पूरा महल सूना पड़ा था.

एक कमरे में उसे खाने की मेज़ दिखाई पड़ी, जो लज़ीज़ पकवानों से सजी हुई थी. दिन भर की यात्रा के बाद अब व्यापारी को ज़ोरों की भूख लग आई थी. उसने मेज़ पर रखा खाना खाया और उसके बाद एक कमरे में जाकर सो गया.

रात में उसे गहरी नींद आई. सुबह सूरज की रौशनी आँखों में पड़ी, तब उसकी नींद खुली. नींद खुलने पर उसकी नज़र बिस्तर के किनारे पर पड़ी, जहाँ नए कपड़े रखे हुए थे. नहाकर तरो-ताज़ा होकर उसने वे कपड़े पहन लिए.

अब वह वापस घर के लिए रवाना होने तैयार था. मौसम भी साफ़ हो चुका था. इसलिए कोई परेशानी न थी. खाने की मेज़ पर उसे गर्मा-गर्म नाश्ता तैयार मिला. पेट भरकर नाश्ता करने के बाद वह महल के बाहर निकल आया.

महल के बाहर एक ख़ूबसूरत बगीचा था, जिसमें रंग-बिरंगे फूल खिले थी. उनमें गुलाब के फूल भी थे. गुलाब के फूल देख व्यापारी को अपनी बेटी ब्यूटी की याद आ गई, जिसने उससे लाल गुलाब का फूल लाने की गुज़ारिश की थी.

उसने सोचा कि दोनों बड़ी बेटियों की इच्छा तो मैं पूरी नहीं कर सका, कम से कम ब्यूटी की इच्छा तो पूरी कर ही सकता हूँ. यह सोचकर उसने लाल रंग के गुलाब को तोड़ने के लिए अपना हाथ बढ़ाया. लेकिन तभी एक भयानक हँसी की आवाज़ ने उसे डरा दिया. वह हँसी एक राक्षस (Beast) की थी, जो बड़ा भयानक था. उसकी आँखें जलते अंगारों सी लाल थी. वह बहुत क्रोधित दिखाई पड़ रहा था.

व्यापारी पर चिल्लाते हुए वह बोला, “दुष्ट आदमी! मैंने तुम्हें अपने महल में आसरा दिया. स्वादिष्ट भोजन से तेरी भूख मिटाई. मुलायम और नरम बिस्तर पर तेरे सोने की व्यवस्था की. नए शानदार कपड़े पहनने को दिए. इस सबके बदले तूने क्या किया? मेरा एहसान मानने की जगह तू मेरे बगीचे से फूल चुरा रहा है. मैं तुझे मार डालूंगा.”

व्यापारी डर के मारे कांपने लगा. वह राक्षस से क्षमा याचना करते हुए बोला, “मुझे क्षमा कर दो! मैं यह गुलाब अपनी बेटी के लिए तोड़ रहा था. उसने मुझसे लाल गुलाब का फूल लाने को कहा था. मैं बस उसकी इच्छा पूरी करना चाहता था. मेरी जान मत लो. तुम जो चाहोगे, मैं करने को तैयार हूँ.”

व्यापारी की बात सुनकर राक्षस (Beast) बोला, “ठीक है! मैं तुम्हें नहीं मारूंगा. लेकिन मेरी एक शर्त है. अपनी जिस बेटी के लिए तुम मेरे बाग़ से गुलाब तोड़ रहे हो. तुम उसे मेरे पास लेकर आओगे.”

उस समय राक्षस से पीछा छुड़ाने व्यापारी ने वह बात मान ली. राक्षस से उसे अपने बाग़ से गुलाब तोड़ने की इज़ाज़त दे दी. एक लाल गुलाब का फूल लेकर व्यापारी वहाँ से अपने घर के लिए रवाना हो गया.

जब वह घर पहुँचा, तब भी बहुत घबराया और डरा हुआ था. उसने ब्यूटी को महल और राक्षस की बात बता दी. पूरी बात जानने के बाद ब्यूटी बोली, “पिताजी! आपकी जान बचाने के लिए मैं अपनी जान भी कुर्बान करने को तैयार हूँ. आप मुझे उस राक्षस के पास छोड़ दीजिये.”

व्यापारी अपनी प्यारी बेटी को कैसे एक राक्षस के हवाले कर देता? वह रोने लगा. वह ब्यूटी को समझाने लगा कि वह इतना स्वार्थी नहीं कि अपनी जान बचाने के लिए अपनी बेटी को एक राक्षस के हवाले कर दे.

ब्यूटी जानती थी कि उसकी दोनों बड़ी बहनों के लिए उसके पिता का जीवित रहना आवश्यक है. वह ज़िद पर अड़ गई. आखिरकार व्यापारी को उसकी इस ज़िद के सामने झुकना पड़ा.

वह दु:खी मन से ब्यूटी को राक्षस के महल में छोड़ आया. जब ब्यूटी का राक्षस से सामना हुआ, तो वह उसके भयानक रूप को देखकर डर गई. लेकिन कुछ ही दिनों में उसका ये डर ख़त्म हो गया क्योंकि  राक्षस का व्यवहार बहुत अच्छा था.

राक्षस ने ब्यूटी को बहुत ही सुंदर कमरे में रखा. उसे सुंदर-सुंदर कपड़े और गहने दिये और उसका हर तरह से ख्याल रखा. वह उससे बहुत प्यार से बातें किया करता था. जिससे ब्यूटी को राक्षस का साथ अच्छा लगने लगा. दिन बीतने के साथ ब्यूटी और राक्षस बहुत अच्छे दोस्त बन गए.

राक्षस ब्यूटी से मन ही मन प्यार करने लगा था. लेकिन अपने भयानक और बदसूरत चेहरे के कारण ब्यूटी से अपने प्यार का इज़हार करने से डरता था. लेकिन एक दिन उसने हिम्मत कर ब्यूटी के सामने विवाह का प्रस्ताव रख ही दिया.

यह प्रस्ताव पाकर ब्यूटी हैरान रह गई. वह राक्षस को अच्छा दोस्त मानती थी. लेकिन उससे शादी कैसे कर सकती थी? वह बहुत बदसूरत था और वह उसे प्यार नहीं करती थी. लेकिन डर के मारे वह कुछ बोल नहीं पाई. राक्षस ब्यूटी की ख़ामोशी समझ गया. उसने उस दिन के बाद कभी भी इस बारे में ब्यूटी से बात नहीं की.

ब्यूटी को महल में किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं थी. लेकिन उसे अपने पिता और बहनों की बहुत याद आती थी. एक दिन वह बाग़ में उदास बैठी हुई थी. राक्षस वहाँ आया और उससे उसकी उदासी का कारण पूछा. तब ब्यूटी बोली कि उसे अपने पिता और बहनों की याद आ रही है.

ब्यूटी की उदासी दूर करने राक्षस ने उसे एक जादुई आईना दिया. उस आईने में ब्यूटी जब चाहे अपने पिता और बहनों को देख सकती थी. आईना पाकर ब्यूटी बहुत ख़ुश हुई. उसके बाद से जब भी मन करता, वह आईने में अपने पिता और बहनों को देख लेती थी.

एक दिन आईने में ब्यूटी ने देखा कि उसका पिता बहुत बीमार हैं. पिता की यह हालत देख ब्यूटी बहुत दु:खी गई. वह राक्षस के पास गई और बोली, “मेरे पिता बहुत बीमार हैं. मैं उनसे आखिरी बार मिलना चाहती हूँ. मुझे जाने दो.”

पहले तो राक्षस ने मना कर दिया, लेकिन लेकिन जब ब्यूटी रोने लगी, तो उसने इस शर्त पर उसे जाने की इज़ाज़त दे दी कि सात दिन के अंदर उसे वापस लौटना होगा. अन्यथा, वह उसकी याद में मर जायेगा.

ब्यूटी ने वादा किया कि वह सात दिन के भीतर वापस आ जाएगी. तब राक्षस ने उसे एक अंगूठी दी और बोला, “इस अंगूठी को जब भी अपनी उंगली से उतारोगी, ख़ुद को इस महल में पाओगी.”

ब्यूटी ने वह अंगूठी पहन ली. अगले दिन सोकर उठने पर उसने खुद को अपने पिता के घर पर पाया. वह अपने पिता से मिली, तो वह बहुत ख़ुश हुआ. ब्यूटी को राक्षस के पास छोड़ देने के दुःख में वह बीमार पड़ गया था.

ब्यूटी ने उसे बताया कि राक्षस उससे बहुत अच्छा बर्ताव करता है और उसका बहुत ख्याल रखता है. यह सुनकर व्यापारी को तसल्ली हुई और धीरे-धीरे वह ठीक होने लगा.

कुछ दिनों बाद ब्यूटी को राक्षस की याद आने लगी. उसे भी राक्षस की आदत पड़ गई थी. उसके अच्छे और दयालु व्यवहार के कारण वह भी उससे प्यार करने लगी थी. लेकिन ख़ुद इस बात से अनजान थी.

ब्यूटी की दोनों बहनें ब्लिस और ब्लॉसम का विवाह हो चुका था. एक दिन दोनों उससे मिलने आई. जब उन्होंने ब्यूटी के मुँह से राक्षस के महल और वहाँ के शानदार जीवन के बारे में सुना, तो जल उठी.

ब्यूटी ने उन्हें यह भी बता दिया था कि उसे सात दिन के भीतर राक्षस के पास वापस जाना है. तब झूठ-मूठ रोते हुए दोनों ब्यूटी से कुछ और दिन रुकने का अनुनय करने लगीं. वे चाहती थीं कि राक्षस ब्यूटी से नाराज़ हो जाये और उसे मार डाले. ब्यूटी अपनी बहनों को इंकार न कर सकी और कुछ दिन और रुक गई.

उधर महल में राक्षस ब्यूटी का बेसब्री से इंतजार कर रहा था. लेकिन जब सात दिनों में ब्यूटी वापस नहीं लौटी, तो वह उदास हो गया. उदासी में उसने खाना-पीना छोड़ दिया, जिससे वह बीमार रहने लगा.

इधर अपने घर पर ब्यूटी भी राक्षस को याद कर रही थी. एक रात उसने सपना देखा कि राक्षस मर रहा है. इस सपने ने ब्यूटी की नींद तोड़ दी. अपना वादा न निभाने के कारण ब्यूटी पछताने लगी. उसने बिना समय गंवाए अपनी उंगली में से अंगूठी निकाल दी. दूसरे दिन सोकर उठने पर उसने ख़ुद को राक्षस के महल में पाया.

ब्यूटी ने दिन भर महल में राक्षस का इंतजार किया, लेकिन वह उससे मिलने नहीं पहुँचा. पूरे महल में ढूंढने पर भी उसे राक्षस नहीं दिखा. वह परेशान हो गई. शाम को वह महल से बाहर निकली और बगीचे में राक्षस को खोजने लगी. लेकिन वह उसे वहाँ भी नहीं मिला.

जब वह महल के पीछे वाले हिस्से में गई, तो वहाँ एक कोने में उसे राक्षस नीचे पड़ा हुआ दिखा. वह बहुत कमजोर नज़र आ रहा था और  ऐसा लग रहा था मानो वह बस मरने ही वाला है.

ब्यूटी उसके पास गई और बोली, “तुम्हें क्या हो गया है?”

राक्षस बोला, “मैंने कहा था कि तुम्हारी याद में मैं मर जाऊंगा. देखो मैं मर रहा हूँ.”

राक्षस की वह हालत देख ब्यूटी रो पड़ी और बोली, “मुझे माफ़ कर दो. मैं समय पर नहीं आ पाई. लेकिन मैं भी तुम्हें बहुत याद कर रही थी. मैं तुमसे प्यार करने लगी हूँ. तुम्हारे बिना मैं भी मर जाऊंगी. मुझे छोड़ कर मत जाओ. मुझसे विवाह कर लो.”

ब्यूटी के ये कहते ही एक चमत्कार हुआ और राक्षस एक सुंदर नौजवान राजकुमार में बदल गया. ब्यूटी यह देखकर हैरान रह गई. राजकुमार ने उसे बताया, “एक दुष्ट जादूगरनी के श्राप के कारण मैं राक्षस बन गया था. उस श्राप का प्रभाव तभी समाप्त होता, जब कोई मुझसे सच्चा प्यार करता. लेकिन मेरी बदसूरती के कारण कभी किसी ने मुझसे प्यार नहीं किया और मैं वर्षों तक राक्षस बना रहा. आज तुम्हारे सच्चे प्यार के कारण वह श्राप समाप्त हो सका है और मैं वापस अपने असली रूप में आ सका हूँ.”

राक्षस और ब्यूटी ने विवाह कर लिया और खुशी-खुशी रहने लगे.  

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