पंचतंत्र की 21 सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ | 21 Best Panchatantra Stories In Hindi

पंचतंत्र की कहानियाँ(Panchatantra Stories In Hindi) पंडित विष्णु शर्मा द्वारा रचित कहानियाँ हैं. यह संस्कृत की सर्वश्रेष्ठ नीतिकथा मानी जाती है. पाँच तंत्रों में विभाजित यह नीतिकथा पशु-पक्षियों को प्रमुख पात्र रखकर लिखा गया है. पंचतंत्र के पाँच तंत्र है :

१. मित्रभेद

२. मित्रलाभ या मित्रसंप्राप्ति

३. संधि-विग्रह/ककोलूकियम

४. लब्ध प्रणाश

५. अपरीक्षित कारक 

इस लेख में हम पंचतंत्र के पाँचों भाग में से चुनी हुई 21 कहानियाँ (21 Best Panchatantra Stories In Hindi) प्रस्तुत कर रहे हैं. प्रत्येक कथा नैतिक ज्ञान और शिक्षा प्रदान करती है. पढ़िये पंचतंत्र की 21 सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ (Panchatantra Ki Kahaniyan) : 

Best Panchatantra Stories In Hindi
Best Panchatantra Stories In Hindi

21 Best Panchatantra Stories In Hindi

Table of Contents

Panchatantra Stories In Hindi 1# संगीतमय गधा 

Panchatantra Stories In Hindi : गाँव में रहने वाले एक धोबी के पास उद्धत नामक एक गधा (Donkey) था. धोबी गधे से काम तो दिन भर लेता, किंतु खाने को कुछ नहीं देता था. हाँ, रात्रि के पहर वह उसे खुला अवश्य छोड़ देता था, ताकि इधर-उधर घूमकर वह कुछ खा सके. गधा रात भर खाने की तलाश में भटकता रहता और धोबी की मार के डर से सुबह-सुबह घर वापस आ जाया करता था.  

एक रात खाने के लिए भटकते-भटकते गधे की भेंट एक सियार से हो गई. सियार ने गधे से पूछा, “मित्र! इतनी रात गए कहाँ भटक रहे हो?”

सियार के इस प्रश्न पर गधा उदास हो गया. उसने सियार को अपने व्यथा सुनाई, “मित्र! मैं  दिन भर अपनी पीठ पर कपड़े लादकर घूमता हूँ. दिन भर की मेहनत के बाद भी धोबी मुझे खाने को कुछ नहीं देता. इसलिए मैं रात में खाने की तलाश में निकलता हूँ. आज मेरी किस्मत ख़राब है. मुझे खाने को कुछ भी नसीब नहीं हुआ. मैं इस जीवन से तंग आ चुका हूँ.”

गधे की व्यथा सुनकर सियार को तरस आ गया. वह उसे सब्जियों के एक खेत में ले गया. ढेर सारी सब्जियाँ देखकर गधा बहुत ख़ुश हुआ. उसने वहाँ पेट भर कर सब्जियाँ खाई और सियार को धन्यवाद देकर वापस धोबी के पास आ गया. उस दिन के बाद से गधा और सियार रात में  सब्जियों के उस खेत में मिलने लगे. गधा छककर ककड़ी, गोभी, मूली, शलजम जैसी कई सब्जियों का स्वाद लेता. धीरे-धीरे उसका शरीर भरने लगा और वह मोटा-ताज़ा हो गया. अब वह अपना दुःख भूलकर मज़े में रहने लगा.

एक रात पेट भर सब्जियाँ खाने के बाद गधे मदमस्त हो गया. वह स्वयं को संगीत का बहुत बड़ा ज्ञाता समझता था. उसका मन गाना गाने मचल उठा. उसने सियार से कहा, “मित्र! आज मैं बहुत ख़ुश हूँ. इस खुशी को मैं गाना गाकर व्यक्त करना चाहता हूँ. तुम बताओ कि मैं कौन सा आलाप लूं?”

गधे की बात सुनकर सियार बोला, “मित्र! क्या तुम भूल गए कि हम यहाँ चोरी-छुपे घुसे हैं. तुम्हारी आवाज़ बहुत कर्कश है. यह आवाज़ खेत के रखवाले ने सुन ली और वह यहाँ आ गया, तो हमारी खैर नहीं. बेमौत मारे जायेंगे. मेरी बात मानो, यहाँ से चलो.”

गधे को सियार की बात बुरी लग गई. वह मुँह बनाकर बोला, “तुम जंगल में रहने वाले जंगली हो. तुम्हें संगीत का क्या ज्ञान? मैं संगीत के सातों सुरों का ज्ञाता हूँ. तुम अज्ञानी मेरी आवाज़ को कर्कश कैसे कह सकते हो? मैं अभी सिद्ध करता हूँ कि मेरी आवाज़ कितनी मधुर है.”

सियार समझ गया कि गधे को समझाना असंभव है. वह बोला, “मुझे क्षमा कर दो मित्र. मैं तुम्हारे संगीत के ज्ञान को समझ नहीं पाया. तुम यहाँ गाना गाओ. मैं बाहर खड़ा होकर रखवाली करता हूँ. ख़तरा भांपकर मैं तुम्हें आगाह कर दूंगा.”

इतना कहकर सियार बाहर जाकर एक पेड़ के पीछे छुप गया. गधा खेत के बीचों-बीच खड़ा होकर अपनी कर्कश आवाज़ में रेंकने लगा. उसके रेंकने की आवाज़ जब खेत के रखवाले के कानों में पड़ी, तो वह भागा-भागा खेत की ओर आने लगा. सियार ने जब उसे खेत की ओर आते देखा, तो गधे को चेताने का प्रयास किया. लेकिन रेंकने में मस्त गधे ने उस ओर ध्यान ही नहीं दिया.

सियार क्या करता? वह अपनी जान बचाकर वहाँ से भाग गया. इधर खेत के रखवाले ने जब गधे को अपने खेत में रेंकते हुए देखा, तो उसे दबोचकर उसकी जमकर धुनाई की. गधे के संगीत का भूत उतर गया और वह पछताने लगा कि उसने अपने मित्र सियार की बात क्यों नहीं मानी.

सीख – अपने अभिमान में मित्र के उचित परामर्श को न मानना संकट को बुलावा देना है.        

Panchatantra Stories In Hindi 2 # दो मछलियाँ और एक मेंढक  

Panchatantra Stories In Hindi : एक तालाब में शतबुद्धि (सौ बुद्धियों वाली) और सहस्त्रबुद्धि (हज़ार बुद्धियों वाली) नामक दो मछलियाँ रहा करती थी. उसी तालाब में एकबुद्धि नामक मेंढक भी रहता था. एक ही तालाब में रहने के कारण तीनों में अच्छी मित्रता थी.

दोनों मछलियों शतबुद्धि और सहस्त्रबुद्धि को अपनी बुद्धि पर बड़ा अभिमान था और वे अपनी बुद्धि का गुणगान करने से कभी चूकती नहीं थीं. एकबुद्धि सदा चुपचाप उनकी बातें सुनता रहता. उसे पता था कि शतबुद्धि और सहस्त्रबुद्धि के सामने उसकी बुद्धि कुछ नहीं है.

एक शाम वे तीनों तालाब किनारे वार्तालाप कर रहे थे. तभी समीप के तालाब से मछलियाँ पकड़कर घर लौटते मछुआरों की बातें उनकी कानों में पड़ी. वे अगले दिन उस तालाब में जाल डालने की बात कर रहे थे, जिसमें शतबुद्धि, सहस्त्रबुद्धि और एकबुद्धि रहा करते थे.

यह बात ज्ञात होते ही तीनों ने उस तालाब रहने वाली मछलियों और जीव-जंतुओं की सभा बुलाई और मछुआरों की बातें उन्हें बताई. सभी चिंतित हो उठे और शतबुद्धि और सहस्त्रबुद्धि से कोई उपाय निकालने का अनुनय करने लगे.

सहस्त्रबुद्धि सबको समझाते हुए बोली, “चिंता की कोई बात नहीं है. दुष्ट व्यक्ति की हर कामना पूरी नहीं होती. मुझे नहीं लगता वे आयेंगे. यदि आ भी गए, तो किसी न किसी उपाय से मैं सबके प्राणों की रक्षा कर लूंगी.”

शतबुद्धि ने भी सहस्त्रबुद्धि की बात का समर्थन करते हुए कहा, “डरना कायरों और बुद्धिहीनों का काम है. मछुआरों के कथन मात्र से हम अपना वर्षों का गृहस्थान छोड़कर प्रस्थान नहीं कर सकते. मेरी बुद्धि आखिर कब काम आयेगी? कल यदि मछुआरे आयेंगे, तो उनका सामना युक्तिपूर्ण रीति से कर लेंगे. इसलिए डर और चिंता का त्याग कर दें.”

तालाब में रहने वाली मछलियों और जीवों को शतबुद्धि और सहस्त्रबुद्धि के द्वारा दिए आश्वासन पर विश्वास हो गया. लेकिन एकबुद्धि को इस संकट की घड़ी में पलायन करना उचित लगा. अंतिम बार वह सबको आगाह करते हुए बोला, “मेरी एकबुद्धित कहती है कि प्राणों की रक्षा करनी है, तो यह स्थान छोड़कर अन्यत्र जाना सही है. मैं तो जा रहा हूँ. आप लोगों को चलना है, तो मेरे साथ चलें.”

इतना कहकर वह वहाँ से दूसरे तालाब में चला गया. किसी ने उस पर विश्वास नहीं किया और शतबुद्धि और सहस्त्रबुद्धि की बात मानकर उसी तालाब में रहे.

अलगे दिन मछुआरे आये और तालाब में जाल डाल दिया. तालाब की सभी मछलियाँ उसमें फंस गई. शतबुद्धि और सहस्त्रबुद्धि ने अपने बचाव के बहुत यत्न करे, किंतु सब व्यर्थ रहा. मछुआरों के सामने उनकी कोई युक्ति नहीं चली और वे उनके बिछाए जाल में फंस ही गई.

जाल बाहर खींचने के बाद सभी मछलियाँ तड़प-तड़प कर मर गई. मछुआरे भी जाल को अपने कंधे पर लटकाकर वापस अपने घर के लिए निकल पड़े. शतबुद्धि और सहस्त्रबुद्धि बड़ी मछलियाँ थीं. इसलिए मछुआरों ने उन्हें जाल से निकालकर अपने कंधे पर लटका लिया था.

जब एकबुद्धि ने दूसरे तालाब से उनकी ये दुर्दशा देखी, तो सोचने लगा : अच्छा हुआ कि मैं एकबुद्धि हूँ और मैंने अपनी उस एक बुद्धि का उपयोग कर अपने प्राणों की रक्षा कर ली. शतबुद्धि या सहस्त्रबुद्धि होने की अपेक्षा एकबुद्धि होना ही अधिक व्यवहारिक है.

सीख –

१. बुद्धि का अहंकार नहीं करना चाहिए.
२. एक व्यवहारिक बुद्धि सौ अव्यवहारिक बुद्धियों से कहीं बेहतर है.

Hindi Panchatantra Stories 3 # चतुर ख़रगोश और शेर 

Panchatantra Stories In Hindi : एक जंगल में भारसुक नामक बलशाली शेर (Lion) रहा करता था. वह रोज़ शिकार पर निकलता और जंगल के जानवरों का शिकार कर अपनी भूख शांत करता था. एक साथ वह कई-कई जानवरों को मार देता. ऐसे में जंगल में जानवरों की संख्या दिन पर दिन कम होने लगी.

डरे हुए जानवरों ने इस समस्या से निपटने के लिए सभा बुलाई. वहाँ निर्णय लिया गया कि शेर से मिलकर इस विषय पर बात की जानी चाहिए. इसके लिए जानवरों का एक दल बनाया गया. अगले दिन वह दल शेर से मिलने पहुँचा. शेर ने जब इतने सारे जानवरों को अपनी गुफ़ा की ओर आते देखा, तो आश्चर्य में पड़ गया.

वह गुफ़ा से बाहर आया और गरजकर जानवरों के दल से वहाँ आने का कारण पूछा. दल का मुखिया डरते-डरते बोला, “वनराज! आप तो वन के राजा हैं. हम सभी आपकी प्रजा है. आज आपकी प्रजा आपसे एक विनती करने आई है.”

“कैसी विनती?” शेर ने पूछा.

“वनराज! आप रोज़ शिकार पर निकलते हैं और कई जानवरों को मार देते हैं. आप उन सभी मरे हुए जानवरों का भक्षण भी नहीं कर पाते. हम सबका विचार था कि आपकी भूख मिटाने यदि रोज़ एक जानवर आपके पास भेज दिया जाये, तो आपको भी आराम रहेगा और हम भी भयमुक्त रहेंगे.”

शेर को बिना मेहनत शिकार प्राप्त हो रहा था, इसलिए उसने यह निवेदन स्वीकार कर लिया. किंतु साथ ही चेतावनी भी दी कि जिस दिन उसके पास जानवर नहीं पहुँचेगा, उस दिन वह सबको मार डालेगा.”

उस दिन के बाद से प्रतिदिन एक जानवर का चुनाव कर उसे शेर के पास भेजा जाने लगा. अब शेर दिन भर गुफ़ा में पड़ा आराम करता रहता. परिणामस्वरुप अन्य जानवर जंगल में सुकून से जीवन जीने लगे.

एक दिन शेर का भोजन बनने की एक ख़रगोश की बारी आई. ख़रगोश शेर की गुफ़ा की ओर चल तो पड़ा, किंतु मृत्यु निकट होने के कारण वह अत्यंत भयभीत था. वह धीरे-धीरे कदम बढ़ाता हुआ चला जा रहा था. साथ ही किसी तरह अपने प्राण बचाने का उपाय भी सोचता जा रहा था.  

चलते-चलते रास्ते में एक कुआं पड़ा. कुएं के पास जाकर जब ख़रगोश ने उसमें झांका, तो उसे अपनी परछाई दिखाई पड़ी. उसी क्षण ख़रगोश को अपनी जान बचाने का एक उपाय सूझ गया.  

उपाय सूझते ही ख़रगोश में एक नए जोश का संचार हो गया. उसे शेर के पास जाने की कोई जल्दी नहीं थी. कुछ देर कुएं के पास आराम करने के बाद वह शेर के पास पहुँचा.

इधर भूखा शेर अपने भोजन के आने में हो रही देरी से क्रोध में लाल-पीला हुआ जा रहा था. जैसे ही उसने एक पिद्दी से ख़रगोश को देखा, उसका क्रोध और बढ़ गया. वह गरजकर खरगोश से बोला, “पिद्दी खरगोश, मैं कबसे प्रतीक्षा कर रहा हूँ और तू अब आया है. अब मेरी भूख बढ़ चुकी है. तुझ अकेले से मेरा क्या होगा? तुझ पिद्दी को किस बेवकूफ ने मेरे पास भेजा है तुझे? तेरे बाद अब मैं उसे भी मारकर खा जाऊंगा.”

खरगोश हाथ जोड़कर गिपड़ड़ाया, “वनराज! देरी के लिए मुझे क्षमा करें. विश्वास करिए इसमें न मेरा दोष है, न ही मुझे भेजने वाले का. हम तो पाँच ख़रगोश आपका भोजन बनने निकले थे. किंतु रास्ते में एक दूसरे शेर ने हमें रोक लिया. जब हमने उसे बताया कि हम अपने राजा का भोजन बनने जा रहे है, तो वह चार खरगोशों को मारकर खा गया और मुझे आपके पास यह संदेश देने भेजा कि अब से वह जंगल का राजा है.”

“ऐसा कहा उसने?” शेर गुस्से में दहाड़ा.

“जी वनराज! उसने आपको लड़ाई के लिए ललकारा है. उसने कहा है कि वह आपको मारकर इस जंगल में एकक्षत्र राज करेगा.”

ये सुनना था कि शेर गरजता हुआ बोला, “मुझे अभी इसी समय उसके पास ले चल. मैं उसे बताता हूँ कि इस जंगल का राजा कौन है? आज तो उसकी खैर नहीं.”

ख़रगोश तुरंत तैयार हो गया और शेर को लेकर कुँए के पास आ गया. कुएं को दिखाते हुए वह बोला, “वनराज, ये उस शेर का दुर्ग है. वह इसी दुर्ग में रहता है. आप दुर्ग के द्वार से उसे ललकारिये.”

शेर ने कुएं में झांककर देखा, तो उसे अपनी परछाई नज़र आई. परछाई देखकर उसने सोचा कि अवश्य ही वह दूसरा शेर है और जोर से दहाड़ते हुए उसे ललकारने लगा. कुएं की दीवारों से टकराकर आती हुई अपनी ही दहाड़ की प्रतिध्वनि सुनकर और अपनी परछाई देखकर उसे लगा कि दूसरा शेर भी दहाड़ते हुए उसे ललकार रहा है. उस ललकार का उत्तर देते हुए उसने कुएं में छलांग लगा दी. कुएं की दीवारों से टकराता हुआ वह पानी में गिरा और डूबकर मर गया.

शेर के मरने के बाद ख़रगोश ख़ुशी-ख़ुशी वापस लौटा और जंगल के अन्य जानवरों को खुशखबरी सुनाई. सुनकर सभी बहुत खुश हुए और सबने ख़रगोश की ख़ूब प्रशंसा की.

सीखबुद्धि बल सबसे बड़ा बल होता है. इसलिए मुश्किल घड़ी में सदा बुद्धिमानी से काम लेना चाहिए. बुद्धि का इस्तेमाल कर हर समस्या का समाधान किया जा सकता है. 

Panchatantra Stories 4# मूर्ख बगुला और नेवला 

Panchatantra Stories In Hindi : जंगल की बीच स्थित वट वृक्ष के खोल में कुछ बगुलों का डेरा था. वे वहाँ वर्षों से रहते आ रहे थे. एक दिन उस वृक्ष की जड़ में बिल बनाकर एक सांप रहने लगा. जब भी अवसर प्राप्त होता, वह बगुलों के बच्चों को मारकर खा जाता.

अपने बच्चों के मारे जाने से बगुले बड़े दु:खी थे. वे किसी तरह उस सांप से छुटकारा पाना चाहते थे. एक दिन वे नदी किनारे उदास बैठे थे, तभी पानी से निकलकर एक केकड़ा उनके पास आया और बोला, “क्या हुआ मित्रों! तुम लोग इतने दु:खी क्यों लग रहे हो? क्या मैं तुम्हारी कोई सहायता कर सकता हूँ?”

दु:खी बगुलों ने अपनी समस्या केकड़े को बता दी. केकड़ा दुष्ट था. उसने मन ही मन सोचा – ‘ये बगुले मेरे परम शत्रु हैं. क्यों ना इनको ऐसा उपाय बताऊँ कि सांप के साथ-साथ इनका भी काम-तमाम हो जाये.’

किंतु ऊपर से दुःख व्यक्त करने का दिखावा करता हुआ वह बोला, “मित्रों, तुम्हारी समस्या सुनकर बड़ा दुःख हुआ. किंतु अब तुम लोगों को चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है. मैं तुम्हें एक ऐसा उपाय बताऊंगा, जिससे तुम्हें सदा के लिए उस दुष्ट सांप से छुटकारा मिला जायेगा.”

केकड़े की बात सुनकर बगुले प्रसन्न हो गए और बोले, “तो फिर देर न करो मित्र और शीघ्र हमें वह उपाय बता दो.”

“तुम लोग कहीं से मांस के टुकड़ों की व्यवस्था करो. मांस के टुकड़ों में से कुछ टुकड़े नेवले के बिल के सामने डाल दो. शेष टुकड़े नेवले के बिल से लेकर सांप के बिल तक बिखेर दो. नेवला उन मांस के टुकड़ों को खाता हुआ सांप के बिल तक पहुँच जायेगा. सांप और नेवले जन्म-जन्मांतर के बैरी है. नेवला सांप का काम-तमाम कर देगा और तुम लोगों को सांप से सदा के लिए छुटकारा मिल जायेगा.”

बगुले शीघ्र सांप से छुटकारा पाना चाहते थे. उन्होंने ज्यादा सोच-विचार किये बिना ही केकड़े की बात मान ली. उन्होंने वैसा ही किया, जैसा केकड़े ने कहा था.

जैसी योजना थी, वैसा ही हुआ. नेवला मांस के टुकड़ों को खाता हुआ सांप के बिल तक पहुँच गया और सांप को मारकर खा गया. लेकिन वृक्ष में खोल देखकर वह वहाँ भी पहुँच गया और बगुलों को भी मारकर खा गया.

बगुलों के जल्दबाज़ी में केकड़े की योजना के दुष्परिणाम के बारे में विचार नहीं किया और मूर्खता कर दी थी, जिसका फल उन्हें अपनी जान से हाथ धोकर चुकाना पड़ा.  

सीख –  किसी भी कार्य को करने के पूर्व उसके हर पहलू के बारे में अच्छी तरह विचार कर लेना चाहिए.

Panchatantra Stories 5# नीला सियार

Panchatantra Stories In Hindi : चंडरव नामक एक भूखा सियार भोजन की तलाश में भटकता हुआ जंगल के निकट स्थित गाँव में चला गया. गाँव की गलियों में घूमते हुए उसे कुछ कुत्तों के देखा, तो उस पर टूट पड़े.

किसी तरह जान बचाकर चंडरव वहाँ से भागा और एक मकान में घुस गया. वह मकान एक धोबी का था. मकान के एक कोने में बड़ा सा ड्रम रखा हुआ था. चंडरव उसमें छुप कर बैठ गया. वह रात भर वहीं छुपा रहा.

सुबह होने तक कुत्ते वहाँ से जा चुके थे. चंडरव ड्रम से निकल कर जंगल की ओर गया. उसे बड़े ज़ोरों की प्यास लगी थी. वह पानी पीने नदी किनारे गया, तो पानी में अपनी परछाई देख चौंक गया.

उसका रंग नीला हो चुका था. रात में वह जिस ड्रम में छुपकर बैठा था, उसमें धोबी ने नील घोला हुआ था. उस नील का रंग चंडरव के शरीर पर चढ़ गया था.

पानी पीकर जब वह जंगल में पहुँचा, तो दूसरे जानवर उसे देख डर गए. नीले रंग का विचित्र जानवर उन्होंने कभी नहीं देखा था. वे डर के मारे भागने लगे.

चंडरव ने जानवरों को भयभीत देखा, तो बड़ा खुश हुआ. उसके दिमाग में जानवरों को मूर्ख बनाकर जंगल का राजा बनने का विचार कौंधा.

उसने भागते हुए जानवरों को रोका और उन्हें अपने पास बुलाकर बोला, “मित्रों, मुझसे मत डरों. मैं ब्रह्मा जी का दूत हूँ. उन्होंने मुझे तुम लोगों की रक्षा के लिए भेजा है. इस जंगल का कोई राजा नहीं है. अब से मैं तुम्हारा राजा हूँ. तुम लोगों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी अब मेरी है. तुम मेरे राज में आनंद से रहो.”

सभी जानवर उसकी बातों में आ गए और उसे अपना राजा स्वीकार कर लिया. उसने शेर को अपना मंत्री, चीते को अपना सेनापति और भेड़िये को अपना संतरी नियुक्त कर लिया. सियारों को उसने जंगल से निकाल दिया क्योंकि उसे उनके द्वारा पहचाने जाने का डर था.

अब चंडरव के मजे हो गए. दिन भर वह छोटे जानवरों से अपनी सेवा करवाता. हाथी की सवारी कर जंगल में घूमता. शेर, चीते और भेड़िये उसके लिए शिकार कर लाते. वह छककर उसका भक्षण करता और बचा हुआ मांस उन्हें दे देता. दिन बड़े ही शांतिपूर्ण रीति से गुजर रहे थे.

लेकिन झूठ आखिर कितने दिन छुपता? एक न एक दिन असलियत बाहर आनी ही थी.

एक सुबह चंडरव सोकर उठा और अपनी मांद से निकला. अचानक उसे कहीं दूर से सियारों की हुआ-हुआ की आवाज़ सुनाई पड़ी. चंडरव आखिर था तो सियार ही. वह भूल गया कि उसने अन्य जानवरों के सामने ब्रम्हा के भेजे दूत होने का नाटक किया है और वह भी मदमस्त होकर हुआ-हुआ चिल्लाने लगा.

जब दूसरे जानवरों ने उसकी आवाज़ सुनी, तो समझ गए कि वास्तव में वह एक सियार है और उन्हें मूर्ख बनाकर उनका राजा बना बैठा है. सब उसे मारने के लिए उसके पीछे दौड़े. चंडरव ने भागने का प्रयास किया, किंतु शेर-चीते के पंजों से बच ना सका और मारा गया.

सीख

१. जो अपनों को ठुकराकर परायों को अपनाता है, उसका नाश हो जाता है.

२. झूठ की उम्र लंबी नहीं होती. जब वह खुलता है, तो उसका दुष्परिणाम भुगतना पड़ता है.

Panchatantra Story In Hindi 6# बगुला भगत

Bagula Bhagat Panchatantra Stories In Hindi : दूरस्थ वन में स्थित एक जलाशय में मछलियाँ, केकड़े, मेंढक और ना-ना प्रकार के जीव-जंतु रहा करते थे. तालाब के किनारे एक बूढ़ा बगुला भी रहा करता था.

बूढ़ा बगुला भोजन के लिए तालाब की मछलियों पर निर्भर था. वह दिन भर तालाब किनारे घात लगाये बैठा रहता. जैसे ही कोई मछली नज़र आती, उसे लपककर पकड़ लेता और अपने पेट की ज्वाला शांत कर लेता था.

लेकिन धीरे-धीरे उसकी आँखें कमज़ोर होने लगी और मछलियाँ पकड़ना उसके लिए दुष्कर हो गया. अब वह दिन-रात एक टांग पर खड़ा होकर सोचता रहता कि ऐसी हालत में कैसे भोजन की व्यवस्था की जाये.

एक दिन उसे एक युक्ति सूझी. युक्तिनुसार वह तालाब के किनारे गया और एक टांग पर खड़ा होकर जोर-जोर से विलाप करने लगा. उसे इस तरह विलाप करता देख तालाब में रहने वाला एक केकड़ा आश्चर्यचकित हो उसके पास आया और पूछने लगा, “बगुला मामा! क्या बात है? इस तरह आँसू क्यों बहा रहे हो? क्या आज कोई मछली हाथ नहीं लगी?”

बगुला बोला, “बेटा! कैसी बात कर रहे हो? अब मैंने वैराग्य का जीवन अपना लिया है और मछलियों तथा अन्य जीवों का शिकार छोड़ दिया है. वैसे भी इस जलाशय के समीप रहते मुझे वर्षों हो गए है. यहाँ रहने वाले जलचरों के प्रति मन में प्रेम और अपनत्व का भाव जाग चुका है. इसलिए मैं उनके प्राण नहीं हर सकता.”

“तो इस तरह विलाप करने का क्या कारण है मामा?” केकड़े ने उत्सुकतावश पूछा.

“मैं तो इस तालाब में रहने वाले अपने भाई-बंधुओं के लिए विलाप कर रहा हूँ. आज ही एक जाने-माने ज्योतिष को मैंने ये भविष्यवाणी करते सुना कि इस क्षेत्र में १२ वर्षों के लिए अकाल पड़ेगा. यहाँ स्थित समस्त जलाशय सूख जायेंगे और उनमें रहने वाले जीव-जंतु भूख-प्यास से मर जायेंगे. आसपास के सभी छोटे जलाशयों के जीव-जंतु बड़ी-बड़ी झीलों की ओर प्रस्थान कर रहे हैं. किंतु इस जलाशय के जीव-जंतु निश्चिंत बैठे हैं. इस जलाशय का जलस्तर अत्यंत कम है. सूखा पड़ने पर ये अतिशीघ्र सूख जायेगा. यहाँ के रहवासी सभी जलचर मारे जायेंगें. यही सोच-सोचकर मेरे आँसू नहीं थम रहे हैं.”

बगुले की बात सुनकर केकड़ा तुरंत तालाब में रहने वाली मछलियों और अन्य जलचरों के पास गया और उन्हें बगुले की अकाल संबंधी बात बता दी.

ये सुनना था कि सभी जलचर बगुले के पास जा पहुँचे और उससे इस समस्या से निकलने का उपाय पूछने लगे.

दुष्ट बगुला तो इसी अवसर की ताक में था. वह बोला, “बंधुओं, चिंता की कोई बात नहीं है. यहाँ से कुछ ही दूरी पर जल से लबालब एक बड़ी झील अवस्थित है. वहाँ का जल अगले ५० वर्षों तक नहीं सूखेगा मैं तुम्हें अपनी पीठ पर लादकर उस झील में छोड़ आऊंगा. इस तरह तुम सबकी जान बच जायेगी.”

बगुले की बात सुनकर सभी जलचरों में पहले जाने की होड़ लग गई और वे बगुले से अनुनय करने लग गए, “बगुला मामा, हमें वहाँ पहले पहुँचा दो.”

ये देख बगुले की बांछे खिल गई. उसने सबको शांत किया और बोला, “बंधुओं, मैं तुम सबको एक-एक कर अपनी पीठ पर लादकर उस झील तक ले जाऊंगा. फिर चाहे मेरा जो हाल हो. आखिर तुम सब मेरे अपने हो.”

उस दिन के बाद से बगुला प्रतिदिन एक मछली को अपनी पीठ पर लादकर ले जाता और कुछ दूरी तय करने के बाद एक बड़ी शिला पर पटककर मार डालता. फिर छककर अपना पेट भरने के बाद दूसरे दिन दूसरा शिकार अपनी पीठ पर लादकर चल पड़ता.

ऐसे ही कई दिन बीत गये. बगुले को बिना परिश्रम के रोज़ एक मछली का आहार मिलने लगा. एक दिन जब बगुला तालाब के किनारे गया, तो केकड़ा बोला, “बगुला मामा! आपने सूखा पड़ने की बात मुझे सबसे पहले बताई. किंतु अब तक आप मुझे बड़ी झील लेकर नहीं गए. आज मैं आपकी कुछ नहीं सुनूंगा. आज आपको मुझे ही लेकर जाना होगा.”

बगुला भी रोज़ मछली खाकर ऊब चुका था. उसने सोचा कि क्यों ना आज केकड़े को ही अपना आहार बनाया जाये? और वह केकड़े को अपनी गर्दन पर बैठाकर उड़ने लगा.

कुछ दूर जाने के बाद केकड़े ने देखा कि एक बड़ी शिला के पास मछलियों की हड्डियों का अंबार लगा हुआ है. उसे संदेह हुआ कि हो न हो ये सब बगुले का ही किया धरा है.

उसने बगुले से पूछा, “मामा, और कितनी दूर जाना है. तुम मुझे उठाये-उथाये थक गये होगे.”

शिला तक पहुँचने के बाद बगुले ने सोचा कि अब वास्तविकता बताने में कोई हर्ज़ नहीं. उसने केकड़े को सारी बात बता दी और बोला, “केकड़े, ईश्वर का स्मरण कर ले. तेरा अंत समय आ चुका है. अब मैं तुझे भी इन मछलियों की तरह इस शिला पर पटककर मार दूंगा और अपना आहार बनाऊंगा.”

ये सुनना था कि केकड़े ने अपने नुकीले दांत बगुले की गर्दन पर गड़ा दिए. बगुले की गर्दन कट गई और वह वहीं तड़पकर मर गया.

केकड़ा बगुले की कटी हुई गर्दन लेकर वापस तालाब में पहुँचा और दुष्ट बगुले की दुष्टता की कहानी सब जलचरों को बताई और बोला, “अब वह दुष्ट मर चुका है. तुम सब लोग यहाँ आनंद के साथ रहो.”

सीखकिसी भी बात का बिना सोचे-समझे विश्वास नहीं करना चाहिए. मुसीबत में धैर्य से काम लेना चाहिये.

Panchatantra Stories In Hindi 7# ख़रगोश, तीतर और धूर्त बिल्ली

Panchatantra Stories In Hindi : दूरस्थ वन में एक ऊँचे पेड़ की खोह में कपिंजल नामक तीतर का निवास था. कई वर्षों से वह वहाँ आनंदपूर्वक जीवन व्यतीत कर रहा था.

एक दिन भोजन की ख़ोज में वह अपना खोह छोड़ निकला और एक हरे-भरे खेत में पहुँच गया. वहाँ हरी-भरी कोपलें देख उसका मन ललचा गया और उसने कुछ दिन उसी खेत में रहने का निर्णय किया. कोपलों से रोज़ अपना पेट भरने के पश्चात् वह वहीं सोने लगा.

कुछ ही दिनों में खेत की हरी-भरी कोपलें खाकर कपिंजल मोटा-ताज़ा हो गया. किंतु पराया स्थान पराया ही होता है. उसे अपने खोह की याद सताने लगी. वापसी का मन बना वह अपने खोह की ओर चल पड़ा. 

खोह पहुँचकर उसने वहाँ एक ख़रगोश को वास करते हुए पाया. कपिंजल की अनुपस्थिति में एक दिन ‘शीघ्रको’ नामक ख़रगोश उस पेड़ पर आया और खाली खोह देख वहीं मज़े से रहने लगा.

अपने खोह में शीघ्रको का कब्ज़ा देख कपिंजल क्रोधित हो गया. उसे भगाते हुए वह बोला, “चोर, तुम मेरे खोह में क्या कर रहे हो? मैं कुछ दिन बाहर क्या गया, तुमने इसे अपना निवास बना लिया. अब मैं वापस आ गया हूँ. चलो भागो यहाँ से.”

किंतु शीघ्रको टस से मस नहीं हुआ और अकड़कर बोला, “तुम्हारा खोह? कौन सा? अब यहाँ मैं रहता हूँ. ये मेरा निवास है. इसे छोड़कर जाने के उपरांत तुम इस पर से अपना अधिकार खो चुके हो. इसलिये तुम यहाँ से भागो.”

कपिंजल ने कुछ देर विचार किया. उसे शीघ्रको से विवाद बढ़ाने में कोई औचित्य दिखाई नहीं पड़ा. वह बोला, “हमें इस विवाद के निराकरण के लिए किसी मध्यस्थ के पास चलना चाहिए. अन्यथा यह बिना परिणाम के बढ़ता ही चला जायेगा. मध्यस्थ हम दोनों का पक्ष सुनने के पश्चात जो भी निर्णय देगा, हम उसे स्वीकार कर लेंगे.”

शीघ्रको को भी कपिंजल की बात उचित प्रतीत हुई और दोनों मध्यस्थ की खोज में निकल पड़े.

जब कपिंजल और शीघ्रको में मध्य ये वार्तालाप चल रहा था, ठीक उसी समय एक जंगली बिल्ली वहाँ से गुजर रही थी. उसने दोनों की बातें सुन ली और सोचा क्यों ना स्थिति का लाभ उठाते हुए मैं इन दोनों की मध्यस्थ बन जाऊं. जैसे ही अवसर मिलेगा, मैं इन्हें मारकर खा जाऊंगी.

वह तुरंत पास बहती एक नदी के किनारे माला लेकर बैठ गई और सूर्य की ओर मुख कर ऑंखें बंद कर धर्मपाठ करने का दिखावा करने लगी.

कपिंजल और शीघ्रको मध्यस्थ की खोज करते-करते नदी किनारे पहुँचे. धर्मपाठ करती बिल्ली को देख उन्होंने सोचा कि ये अवश्य कोई धर्मगुरु है. न्याय के लिए उन्हें उससे परामर्श लेना उचित प्रतीत हुआ.  

वे कुछ दूरी पर खड़े हो गए और बिल्ली को अपनी समस्या बताकर अनुनय करने लगे, “गुरूवर, कृपया हमारे विवाद का निपटारा कर दीजिये. हमें विश्वास है कि आप जैसे धर्मगुरू का निर्णय धर्म के पक्ष में ही होगा. इसलिए आपका निर्णय हर स्थिति में हमें स्वीकार्य है. हममें से जिसका भी पक्ष धर्म विरूद्ध हुआ, वो आपका आहार बनने के लिए तैयार रहेगा.”

अनुनय सुन धर्मगुरू बनी पाखंडी बिल्ली ने आँखें खोल ली और बोली, “राम राम ! कैसी बातें करते हो? हिंसा का मार्ग त्याग कर मैंने धर्म का मार्ग अपना लिया है. इसलिए मैं हिंसा नहीं करूंगी. किंतु तुम्हारे विवाद का निराकरण कर तुम्हारी सहायता अवश्य करूंगी. मैं वृद्ध हो चुकी हूँ और मेरी श्रवण शक्ति क्षीण हो चुकी है. इसलिए मेरे निकट आकर मुझे अपना-अपना पक्ष बताओ.”

पाखंडी बिल्ली की चिकनी-चुपड़ी बातों पर कपिंजल और शीघ्रको विश्वास कर बैठे और अपना पक्ष बताने उसके निकट पहुँच गये. निकट पहुँचते ही पाखंडी बिल्ली ने शीघ्रको को पंजे में दबोच लिया और कपिंजल को अपने मुँह में दबा लिया. कुछ ही देर में दोनों को सफाचट कर पाखंडी बिल्ली वहाँ से चलती बनी.

सीख – अपनी शत्रु पर कभी भी आँख मूंदकर भरोसा नहीं करना चाहिए. परिणाम घातक  हो सकता है.

    Panchatantra Ki Kahani 8# सिंह और सियार

Panchatantra Stories In Hindi : बहुत समय पहले की बात है. हिमालय की गुफ़ा में एक सिंह रहा करता था. जंगल के जीव-जंतुओं को अपना आहार बना वह दिन-प्रतिदिन बलिष्ठ होता जा रहा था.

एक दिन जंगली भैंसे का शिकार कर उसने अपनी क्षुधा शांत की और गुफ़ा की ओर लौटने लगा. तभी रास्ते में एक अत्यंत कमज़ोर सियार से उसका सामना हुआ.

निरीह सियार अपने समक्ष बलशाली सिंह को देख नत-मस्तक हो गया और बोला, “वनराज! मैं आपकी शरण में आना चाहता हूँ. मुझे अपना दास बना लीजिये. मैं आजीवन आपकी सेवा करूंगा और आपके शिकार के अवशेष से अपना पेट भर लूंगा.”

सिंह को सियार पर दया आ गई. उसके उसे अपनी शरण में रख लिया. सिंह की शरण में सियार को बिना दर-दर भटके भोजन प्राप्त होने लगा. सिंह के शिकार का छोड़ा हुआ अवशेष उसका होता. जिसे खाकर वह कुछ ही दिनों में हट्टा-कट्ठा हो गया.

शारीरिक सुगढ़ता आने के बाद सियार स्वयं को सिंह के समतुल्य समझने लगा. वह सोचने लगा कि अब वह भी सिंह के सामान बलशाली हो गया है.

इसी दंभ में वह एक दिन सिंह से बोला, “अरे सिंह! मेरा हृष्ट-पुष्ट शरीर देख. बोल, क्या अब मैं तुमसे कम बलशाली रह गया हूँ? नहीं ना. इसलिए आज से मैं शिकार कर उसका भक्षण करूंगा. मेरे छोड़े हुए अवशेष से तुम अपना पेट भर लेना.”

सिंह सियार के प्रति मित्रवत था. उसने उसकी दंभपूर्ण बातों का बुरा नहीं माना. किंतु उसे सियार की चिंता थी. इसलिए उसने उसे समझाया और अकेले शिकार पर जाने से मना किया.

लेकिन दंभ सियार के सिर पर चढ़कर बोल रहा था. उसने सिंह का परामर्श अनसुना कर दिया. वह पहाड़ की चोटी पर जाकर खड़ा हो गया. वहाँ से उसने देखा कि नीचे हाथियों का झुण्ड जा रहा है. उन्हें देख उसने भी सिंह की तरह सिंहनाद करने की सोची, लेकिन था तो वह सियार ही.

सियार की तरह जोर से ‘हुआ हुआ’ की आवाज़ निकालने के बाद वह पहाड़ से हाथियों के झुण्ड के ऊपर कूद पड़ा. लेकिन उनके सिर के ऊपर गिरने के स्थान पर वह उनके पैरों में जा गिरा. मदमस्त हाथी अपनी ही धुन में उसे कुचलते हुए निकल गए.

इस तरह सियार के प्राण-पखेरू उड़ गए. पहाडी के ऊपर खड़ा सिंह अपने मित्र सियार की दशा देख बोला, “होते हैं जो मूर्ख और घमण्डी, होती है उनकी ऐसी ही गति.”

सीख – घमंड विनाश का कारण बनता है. जब घमंड सिर चढ़कर बोलता है, तो मूर्खता हावी होने लगती है और उस दशा में किये गए कर्म विनाश की ओर ले जाते हैं. 

  Panchatantra Stories In Hindi 9# तीन मछलियाँ

The Three Fishes Panchatantra Stories In Hindi : एक जलाशय में तीन मछलियाँ रहा करती थी : अनागतविधाता, प्रत्युत्पन्नमति और यभ्दविष्य. तीनों के स्वभाव एक-दूसरे से भिन्न थे. अनागतविधाता संकट आने के पूर्व ही उसके समाधान में विश्वास रखती थी. प्रत्युत्पन्नमति की सोच थी कि संकट आने पर उसका कोई न कोई समाधान निकल ही आता है. यभ्दविष्य किस्मत के भरोसे रहने वालों में से थी. उसका मानना था कि जो किस्मत में लिखा है, वह तो होकर ही रहेगा. चाहे कितने ही प्रयत्न क्यों न कर लिए जायें, उसे टाला नहीं जा सकता.

तीनों मछलियाँ जिस जलाशय में रहती थीं, वह मुख्य नदी से जुड़ा हुआ था. किंतु घनी झाड़ियों से ढका होने के कारण सीधे दिखाई नहीं पड़ता था. यही कारण था कि वह अब तक मछुआरों की दृष्टि से बचा हुआ था.

एक शाम मछुआरे नदी से मछलियाँ पकड़कर वापस लौट रहे थे. बहुत ही कम मछलियाँ हाथ आने के कारण वे उदास थे. तभी उनकी दृष्टि मछलीखोर पक्षियों पर पड़ी, जो नदी से लगी झाड़ियों के पीछे से उड़ते चले आ रहे थे. उन मछलीखोर पक्षियों की चोंच में मछलियाँ दबी हुई थी.

यह देख मछुआरों को समझते देर न लगी कि झाड़ियों के पीछे नदी से लगा हुआ कोई जलाशय है. वे झाड़ियों के पार जाकर जलाशय के पास पहुँच गए. वे बहुत ख़ुश थे. एक मछुआरा बोला, “लगता है यह जलाशय मछलियों से भरा हुआ है. यहाँ से हम ढेर सारी मछलियाँ पकड़ पायेंगे.”

“सही कह रहे हो भाई. लेकिन आज तो शाम घिर आई है. कल सुबह-सुबह आकर यहाँ पर अपना जाल बिछाते हैं.” दूसरे मछुआरे ने कहा. दूसरे दिन आने की योजना बनाकर मछुआरे वहाँ से चले गए.

मछुआरों की बातें अनागतविधाता ने सुन ली. वह तुरंत प्रत्युत्पन्नमति और यभ्दविष्य के पास पहुँची और बोली, “कल मछुआरे जाल डालने इस जलाशय में आ रहे हैं. यहाँ रहना अब ख़तरे से खाली नहीं रह गया है. हमें यथाशीघ्र यह स्थान छोड़ देना चाहिए. मैं तो तुरंत ही नहर से होती हुई नदी में जा रही हूँ. तुम लोग भी साथ चलो.”

अनागतविधाता की बात सुनकर प्रत्युत्पन्नमति बोली, “अभी ख़तरा आया कहाँ है? हो सकता है कि वो आये ही नहीं. जब तक ख़तरा सामने नहीं आएगा, मैं जलाशय छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगी. हो सकता है कि मछुआरों को मछलियों से भरा कोई दूसरा जलाशय मिल जाये और वे यहाँ आने का इरादा छोड़ दें. यदि वे आ भी गए, तो ये भी संभव है कि मैं उनके जाल फंसू ही ना.”

यभ्दविष्य बोली, “किस्मत के आगे क्या भला किसकी चली है? मछुआरों को आना होगा तो आयेंगे और मुझे उनके जाल में फंसना होगा, तो मैं फंसूंगी ही. मेरे कुछ भी करने से किस्मत का लिखा थोड़ी बदल जाएगा.”

अनागतविधाता ने अपनी योजना अनुसार वहाँ से प्रस्थान करना ही उचित समझा और वह तुरंत वहाँ से चली गई. प्रत्युत्पन्नमति और यभ्दविष्य जलाशय में ही रुकी रही.

अगले दिन सुबह मछुआरे जाल लेकर आये और जलाशय में जाल फेंक दिया. संकट सामने देख बचाव हेतु प्रत्युत्पन्नमति अपना दिमाग दौड़ाने लगी. उसने इधर-उधर देखा, किंतु उसे कोई खोखली जगह नहीं मिली, जहाँ जाकर वह छुप सके. तभी उसे एक उदबिलाव की सड़ी हुई लाश पानी में तैरती हुई दिखाई पड़ी. वह उस लाश में घुस गई और उसकी सड़ांध अपने ऊपर लपेटकर बाहर आ गई.

थोड़ी देर बाद वह एक मछुआरे के जाल में फंस गई. मछुआरे ने जब जाल बाहर निकाला और सारी मछलियों को जाल से एक किनारे पर उलट दिया, तब प्रत्युत्पन्नमति सड़ांध लपेटे हुए मरी मछली की तरह जमीन पर पड़ी रही. उसमें कोई हलचल न देख मछुआरे ने उसे उठाकर सूंघा.

उसके ऊपर से आ रही बदबू से उसने अनुमान लगाया कि ये अवश्य कई दिनों पहले मरी मछली है और उसने उसे पानी में फेंक दिया. पानी में पहुँचते ही प्रत्युत्पन्नमति तैरकर सुरक्षित स्थान पर चली गई. इस तरह बुद्धि का प्रयोग कर वह बच गई.

वहीं दूसरे मछुआरे के जाल में फंसी यभ्दविष्य कुछ किये बिना किस्मत के भरोसे रही और अन्य मछलियों के साथ दम तोड़ दिया.

सीख  – किस्मत उसी का साथ देती है, जो खुद का साथ देते हैं. किस्मत के भरोसे रहकर हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने वालों का विनाश निश्चित है.  

 Panchatantra Stories In Hindi 10# बंदर और लकड़ी का खूंटा

Panchatantra Stories In Hindi : एक गाँव के निकट के जंगल में मंदिर का निर्माण हो रहा था. निर्माण कार्य सुबह से लेकर शाम तक चलता था. बहुत से कारीगर इसमें जुटे हुए थे.

सुबह से शाम तक कारीगर वहाँ काम करते और दोपहर में भोजन करने गाँव आ जाया करते थे.

एक दोपहर सभी कारीगर भोजन करने गाँव आये हुए थे. तभी बंदरों का एक दल निर्माणधीन मंदिर के पास आ धमका और उछल-कूद मचाने लगा.

मंदिर में उस समय लकड़ी का काम चल रहा है. चीरी हुई शहतूत और अन्य लकड़ियाँ इधर-उधर पड़ी हुई थी. बंदरों के सरदार ने बंदरों को वहाँ जाने से मना किया. किंतु एक शरारती बंदर नहीं माना.

सभी बंदर जहाँ पेड़ पर चढ़ गए. वह शरारती बंदर शहतूत की लकड़ियों पर धमाचौकड़ी करने लगा. वहाँ शहतूत के कई अधचिरे लठ्ठे रखे हुए थे. उन अधचिरे लठ्ठे के बीच कील फंसी हुई थी.

कारीगर भोजन के लिए जाने के पूर्व लठ्ठों के बीच कील फंसाकर जाते थे, ताकि वापस आने के बाद उनमें आरी घुसाने में सुविधा हो.

शरारती बंदर कौतूहलवश एक अधचिरे शहतूत के बीच फंसे कील को देखने लगा. वह सोचने लगा कि यदि इस कील को यहाँ से निकाल दिया जाये, तो क्या होगा. वह अधचिरे शहतूत के ऊपर बैठकर कील पर अपनी ज़ोर अजमाइश करने लगा.

बंदरों के सरदार ने जब उसे ऐसा करते देखा, तो चेतावनी देकर उसे बुलाने का प्रयास भी किया. किंतु हठी बंदर नहीं माना.

वह दम लगाकर कील को खींचने लगा. किंतु कील नहीं निकली. बंदर और जोर से कील को खींचने लगा. इस जोर अजमाइश में उसकी पूंछ पाटों के बीच आ गई. लेकिन बंदर ने इस ओर ध्यान नहीं दिया और अपनी धुन में लगा रहा.

कुछ देर तक कील को खींचने पर वह थोड़ी हिलने लगी. यह देख बंदर ख़ुश हो गया और दुगुने उत्साह से कील को निकालने में लग गया. अंत में जोर के झटके के साथ कील बाहर निकल गई.

लेकिन जैसे ही कील बाहर निकली, अधचिरे पाट आपस में आ मिले और बंदर की पूंछ उसमें दब गई. बंदर दर्द से चीख उठा. कराहते हुए उसने वहाँ से निकलने का भरसक प्रयास किया. किंतु नाकाम रहा.

वह जितना दम लगाकर वहाँ से निकलने का प्रयास करता, उसकी पूंछ उतनी जख्मी होती जाती. बहुत देर तक वह वहाँ फंसा तड़पता रहा और अंततः अत्यधिक रक्त बह जाने के कारण मर गया.

सीख –   जिस काम की जानकारी नहीं उसमें अनावश्यक हस्तक्षेप करना मूर्खता है. ऐसा करना मुसीबत को बुलावा देना है.

Hindi Panchatantra Stories 11# सांप और कौवा

Panchatantra Stories In Hindi : नगर के पास बरगद के पेड़ (Banyan Tree) पर एक घोंसला था, जिसमें वर्षों से कौवा (Crow) और कौवी का एक जोड़ा रहा करता था. दोनों वहाँ सुखमय जीवन व्यतीत कर रहे थे. दिन भर भोजन की तलाश में वे बाहर रहते और शाम ढलने पर घोंसले में लौटकर आराम करते.

एक दिन एक काला सांप (snake) भटकते हुए उस बरगद के पेड़ के पास आ गया. पेड़ के तने में एक बड़ा खोल देख वह वहीं निवास करने लगा. कौवा-कौवी इस बात से अनजान थे. उनकी दिनचर्या यूं ही चलती रही.

मौसम आने पर कौवी ने अंडे दिए. कौवा और कौवी दोनों बड़े प्रसन्न थे और अपने नन्हे बच्चों के अंडों से निकलने की प्रतीक्षा कर रहे थे. लेकिन एक दिन जब  वे दोनों भोजन की तलाश में निकले, तो अवसर पाकर पेड़ की खोल में रहने वाले सांप ने ऊपर जाकर उनके अंडों को खा लिया और चुपचाप अपनी खोल में आकर सो गया.

कौवा-कौवी ने लौटने पर जब अंडों को घोंसलों में नहीं पाया, तो बहुत दु:खी हुए. उसके बाद से जब भी कौवी अंडे देती, सांप उन्हें खाकर अपनी भूख मिटा लेता. कौवा-कौवी रोते रह जाते.

मौसम आने पर कौवी ने फिर से अंडे दिए. लेकिन इस बार वे सतर्क थे. वे जानना चाहते थे कि आखिर उनके अंडे कहाँ गायब हो जाते हैं.

योजनानुसार एक दिन वे रोज़ की तरह घोंसले से बाहर निकले और दूर जाकर पेड़ के पास छुपकर अपने घोंसले की निगरानी करने लगे. कौवा-कौवी को बाहर गया देख काला सांप पेड़ की खोल से निकला और घोंसले में जाकर अंडों को खा गया.

आँखों के सामने अपने बच्चों को मरते देख कौवा-कौवी तड़प कर रह गए. वे सांप का सामना नहीं कर सकते थे. वे उसकी तुलना में कमज़ोर थे. इसलिए उन्होंने अपने वर्षों पुराने निवास को छोड़कर अन्यत्र जाने का निर्णय किया.

जाने के पूर्व वे अपने मित्र गीदड़ से अंतिम बार भेंट करने पहुँचे. गीदड़ को पूरा वृतांत सुनाकर जब वे विदा लेने लगे, तो गीदड़ बोला, “मित्रों, इन तरह भयभीत होकर अपना वर्षों पुराना निवास छोड़ना उचित नहीं है. समस्या सामने है, तो उसका कोई न कोई हल अवश्य होगा.”

कौवा बोला, “मित्र, हम कर भी क्या सकते हैं. उस दुष्ट सांप की शक्ति के सामने हम निरीह हैं. हम उसका मुकाबला नहीं कर सकते. अब कहीं और जाने के अलावा हमारे पास कोई चारा नहीं है. हम हर समय अपने बच्चों को मरते हुए नहीं देख सकते.”

गीदड़ कुछ सोचते हुए बोला, “मित्रों, जहाँ शक्ति काम न आये, वहाँ बुद्धि का प्रयोग करना चाहिए.” यह कहकर उसने सांप से छुटकारा पाने की एक योजना कौवा-कौवी को बताई.

अगले दिन योजनानुसार कौवा-कौवी नगर ने सरोवर में पहुँचे, जहाँ राज्य की राजकुमारी अपने सखियों के साथ रोज़ स्नान करने आया करती थी. उन दिन भी राजकुमारी अपने वस्त्र और आभूषण किनारे रख सरोवर में स्नान कर रही थी. पास ही सैनिक निगरानी कर रहे थे.

अवसर पाकर कौवे ने राजकुमारी का हीरों का हार अपनी चोंच में दबाया और काव-काव करता हुआ राजकुमारी और सैनिकों के दिखाते हुए ले उड़ा.

कौवे को अपना हार ले जाते देख राजकुमारी चिल्लाने लगी. सैनिक कौवे के पीछे भागे. वे कौवे के पीछे-पीछे बरगद के पेड़ के पास पहुँच गए. कौवा यही तो चाहता था.

राजकुमारी का हार पेड़ के खोल में गिराकर वह उड़ गया. सैनिकों ने यह देखा, तो हार निकालने पेड़ की खोल के पास पहुँचे.

हार निकालने उन्होंने खोल में एक डंडा डाला. उस समय सांप खोल में ही आराम कर रहा था. डंडे के स्पर्श पर वह फन फैलाये बाहर निकला. सांप को देख सैनिक हरक़त में आ गए और उसे तलवार और भले से मार डाला.

सांप के मरने के बाद कौवा-कौवी ख़ुशी-ख़ुशी अपने घोंसले में रहने लगे. उस वर्ष जब कौवी ने अंडे दिए, तो वे सुरक्षित रहे.

सीखजहाँ शारीरिक शक्ति काम न आये, वहाँ बुद्धि से काम लेना चाहिए. बुद्धि से बड़ा से बड़ा काम किया जा सकता है और किसी भी संकट का हल निकाला जा सकता है.       

Panchatantra Kahani 12# खटमल और बेचारी जूं

Panchatantra Stories In Hindi : एक राजा के शयनकक्ष में मंद्विसर्पिणी नामक जूं ने अपना डेरा डाला हुआ था. वह राजा की शैय्या की सफ़ेद चादरों के बीच छुपकर रहा करती थी. राजा जब रात को सो जाता, तो वह चुपके से बाहर निकलती और राजा का रक्त पीकर वापस चादरों के बीच छुप जाती. राजा को अपनी शैय्या पर जूं के होने का आभास नहीं था. इस तरह जूं के दिन आराम से कट रहे थे.

एक दिन कहीं से अग्निमुख नामक खटमल उस शयनकक्ष में घुस आया. उस पर दृष्टि पड़ते ही जूं ने उसे भगाने का प्रयास किया. वह उसके कारण किसी विपत्ति में नहीं पड़ना चाहती थी.

किंतु खटमल कहाँ आसानी से मानने वाला था. वह मधुर वाणी में जूं से बोला, “मंद्विसर्पिणी बहन! कोई अपने शत्रु का भी इस तरह अपमान नहीं करता, जिस तरह तुम मेरा कर रही हो. मैं तो तुम्हारा मेहमान हूँ. पहली बार तुम्हारे डेरे में आया हूँ. एक रात तो मुझे यहाँ रहने दो. तुम तो रोज़ यहाँ के राजा के मीठे रक्त का पान करती हो. आज मुझे भी उसका थोड़ा स्वाद ले लेने दो.”

जूं खटमल की चिकनी-चुपड़ी बातों में आ गई. उसने उसे वहाँ रात भर रहने की अनुमति दे दी. किंतु साथ ही उसे आगाह करते हुए बोली, “अग्निमुख! तुम यहाँ रह तो रहे हो. किंतु अपने चंचल स्वभाव पर तुम्हें नियंत्रण रखना होगा. राजा की जब गहरी नींद पड़ जाये, तब मेरे रक्तपान करने के उपरांत ही तुम राजा का रक्त पीना. और ध्यान रखना कि रक्तपान करते समय राजा को कोई पीड़ा ना हो. अन्यथा हम दोनों मारे जायेंगे.”

खटमल ने जूं को वचन दिया कि जब तक वह राजा का रक्तपान नहीं करती, वो भी नहीं करेगा और किसी भी तरह से राजा को कष्ट नहीं पहुँचायेगा. उन दोनों का  वार्तालाप समाप्त ही हुआ था कि राजा शयनकक्ष में आ गया और दीपक बुझाकर चादर तानकर सो गया.

इधर जूं राजा की नींद और गहरी होने की प्रतीक्षा कर रही थी. उधर खटमल की जीभ लोभ से तर हुई जा रही थी. राजा के मीठे रक्त के लोभ में वह अपना वचन भंग कर बैठा और जूं के पहले जाकर राजा पर अपने पैने दांत गड़ा दिए.

अचानक हुई पीड़ा से राजा तड़पकर उठ बैठा. उसने संतरियों को बुलाया और कहा, “इस शैय्या में अवश्य जूं या खटमल है. तत्काल दीपक जलाकर उन्हें खोजो और मार दो.”

संतरियों ने दीपक जलाकर चादर की तहें खंगालनी प्रारंभ की. जूं हमेशा की तरह चादर की तहों में छुपी बैठी थी. खटमल राजा को काटकर पलंग के पायों के जोड़ में जा छुपा था.

संतरियों की दृष्टि जूं पर पड़ गई. उन्होंने उसे पकड़कर मसल दिया. इस तरह खटमल की बातों पर विश्वास कर जूं मारी गई.

सीख अज्ञात या विरोधी स्वाभाव के व्यक्ति की चिकनी-चुपड़ी बातों में आकर उन पर विश्वास करना हानिकर है. उनसे सदैव सावधान रहना चाहिये.      

Panchatantra Tales In Hindi 13# गीदड़ गीदड़ ही रहता है

Panchatantra Stories In Hindi : जंगल की एक गुफ़ा में शेर-शेरनी का जोड़ा रहता था. उनके दो बच्चे थे. शेर प्रतिदिन जंगल जाकर शिकार करता और उसे लेकर गुफ़ा आ जाता. गुफ़ा में दोनों मिलकर शिकार के मांस का भक्षण किया करते थे.

एक दिन पूरा जंगल छान मारने के बाद भी शेर (Lion) के हाथ कोई शिकार नहीं लगा. निराश होकर वह वापस लौट रहा था कि रास्ते में उसे एक गीदड़ (Jackal) का बच्चा दिखाई पड़ा. बच्चा जानकार वह उसे मार नहीं पाया और जीवित ही मुँह में दबाकर गुफ़ा ले आया.

उसे शेरनी (Lioness) को सौंपते हुए वह बोला, “प्रिये! आज कोई शिकार मेरे हाथ नहीं लगा. वापस लौटने हुए ये गीदड़ का बच्चा दिखाई पड़ा, तो मैं इसे उठा ले आया. मैं तो इस बच्चे को दयावश खा नहीं पाया. यदि तुम चाहो, तो इसे खाकर अपनी भूख मिटा लो.”

शेरनी बोली, “जिसे बच्चा जानकार तुम नहीं मार पाए, उसे मैं कैसे मार सकती हूँ? इस निरीह बच्चे को देखकर मेरा हृदय भी ममता से भर उठा है. आजसे यह मेरी तीसरी संतान है. अपने बच्चे की तरह ही मैं इसका पालन-पोषण करूंगी.”

उस दिन के बाद से गीदड़ का बच्चा शेर-शेरनी की गुफ़ा में ही पलने लगा. शेरनी  उसे अपना दूध पिलाती और अपने बच्चे की तरह देखभाल करती थी. गीदड़ का बच्चा शेर-शेरनी को ही अपने माता-पिता समझता और उनके दोनों बच्चों को अपने भाई. वे सभी प्रेम-पूर्वक एक साथ रहते थे.

समय बीतने लगा और शेर-शेरनी के बच्चे बड़े होने लगे. एक दिन वे तीनों जंगल में खेल रहे थे कि एक मद-मस्त हाथी आ गया. हाथी को देखते ही शेर के दोनों बच्चे गुर्राते हुए उसकी ओर लपके. किंतु गीदड़ का बच्चा डर गया.

उसने शेर के दोनों बच्चों को समझाया, “बंधुओं! हाथी हमारा शत्रु है और बहुत बलशाली है. हम उसका सामना करने में सक्षम नहीं है. इसलिए हमें उससे दूरी बनाकर रखनी चाहिये, अन्यथा जान से हाथ धोना पड़ जायेगा. आओ भाग चले.”

शेर के बच्चे उसकी बात मानकर गुफ़ा चले आये. वहाँ उन्होंने शेरनी को जंगल की घटना के बारे में बताया कि कैसे हाथी को देखकर गीदड़ का बच्चा डर गया और कायरता दिखाते हुए हम दोनों को भी भागने को विवश कर दिया. वे दोनों मिलकर गीदड़ के बच्चे का उपहास करने लगे.

अपना उपहास गीदड़ के बच्चे से सहन नहीं हुआ और वह क्रोधित होकर शेर के बच्चों को भला-बुरा कहकर झगड़ने लगा. शेरनी बीच-बचाव करते हुए गीदड़ के बच्चे को समझाने लगी, “ये दोनों तेरे बंधु हैं. इनकी बातों का बुरा मत मान और झगड़ा बंद कर प्रेम से रह.”

किंतु गीदड़ का बच्चा तैश में था. वह बोला, “ये सदा मेरा उपहास करते हैं. बताओ मैं इनसे किस मामले में कम हूँ. मैं भी बहादुर हूँ. मैं चाहूँ, तो अभी इन दोनों को मज़ा चखा सकता हूँ. आज ये मेरे हाथों से बचेंगे नहीं.”

गीदड़ की बातें सुनकर शेरनी समझ गई कि अब उसे वास्तविकता बताने का समय आ गया है. वह बोली, “पुत्र! मेरी बात ध्यान से सुन. तुम बहादुरी में किसी से कम नहीं हो. किंतु जिस कुल में तुम्ह जन्मे हो, वहाँ हाथी से शत्रुता मोल नहीं ली जाती. वास्तव में तुम गीदड़ हो. मैंने तुम्हें अपना दूध पिलाकर अपने बच्चे की तरह पाला है. लेकिन गीदड़ होने के कारण तुममें गीदड़ के ही गुण हैं. अब तुम्हारा भला इसी में है कि तुम अपने कुल में जाकर मिल जाओ. यदि यह बात तुम्हरे दोनों भाइयों को पला चल गई, तो मारे जाओगे.”

शेरनी की बात सुनकर गीदड़ वहाँ से भाग खड़ा हुआ और गीदड़ों के दल में जाकर मिल गया.

Panchatantra Stories In Hindi 14# बोलने वाली गुफ़ा

Panchatantra Stories In Hindi : एक जंगल में खरनखर नामक शेर रहता था. एक दिन वह शिकार की तलाश में बहुत दूर निकल गया. शाम हो चुकी थी. कोई शिकार हाथ नहीं लगा था. ऊपर से वह थक कर चूर हो चुका था. तभी उसे एक गुफ़ा दिखाई पड़ी. वह गुफ़ा के अंदर चला गया.

गुफ़ा खाली थी. शेर ने सोचा – अवश्य यहाँ रहने वाला जानवर बाहर गया है. रात होते-होते वह गुफ़ा में वापस ज़रूर आएगा. ऐसा करता हूँ, तब तक यहीं छुपकर बैठता हूँ. जब वह जानवर आयेगा, तो उसे मारकर खा जाऊँगा और अपनी भूख मिटाऊंगा. वह गुफ़ा में एक कोने में छुपकर बैठ गया.

वह गुफ़ा दक्षिपुच्छ नामक गीदड़ की थी. जब वह लौटकर आया और गुफ़ा के पास पहुँचा, तो देखा कि शेर के पंजों के निशान उसकी गुफ़ा के अंदर जा रहे हैं. लेकिन बाहर आते हुए पंजों के निशान उसे दिखाई नहीं पड़े. वह समझ गया कि उसकी गुफ़ा में कोई शेर गया है. उसे यह भी संदेह था कि वह अब भी अंदर ही बैठा हुआ है.

यह पता लगाने की शेर गुफ़ा में बैठा है या नहीं, उसे एक युक्ति निकाली. गुफ़ा के द्वार पर खड़ा होकर वह तेज आवाज़ में बोला, “मित्र! मैं वापस आ गया हूँ. तुमने कहा था कि मेरे वापस आने पर तुम मेरा स्वागत करोगे. लेकिन तुम तो चुप हो. क्या बात है? तुम कुछ बोल क्यों नहीं रहे हो?”

जब गीदड़ की आवाज़ शेर के कानों में पहुँची, तो उसने सोचा कि ये गुफ़ा अवश्य गीदड़ के आने पर उसका स्वागत करते हुए कुछ कहती है. शायद मेरे यहाँ होने के कारण आज यह चुप है. अगर गुफ़ा कुछ न बोली, तो कहीं गीदड़ को संदेह न हो जाए और वह वापस न चला जाए. इसलिए वह गरज कर बोला, “आओ मित्र! तुम्हारा स्वागत है. जल्दी अंदर आओ.”

शेर की गरज सुनकर गीदड़ डर गया. वह उल्टे पैर वहाँ से भाग गया. इधर शेर बहुत देर तक गीदड़ ने अंदर आने की प्रतीक्षा करता रहा, लेकिन सब व्यर्थ रहा. अंत में उसे समझ आ गया कि गीदड़ उसे मूर्ख बनाकर भाग गया है. शेर को अपनी मूर्खता पर बहुत क्रोध आया, किंतु अब वह क्या करता? शिकार उसके हाथ से निकल चुका था.

सीख – भविष्य के संकट को भांपकर जो बचने की युक्ति निकाल ले, वह बुद्धिमान होता है.  

Panchatantra Stories 15# मूर्ख कछुआ 

Panchatantra Stories In Hindi : एक तालाब में कम्बुग्रीव नामक कछुआ (Tortoise) रहा करता था. वह कछुआ बहुत बातूनी था. दूसरों से बात करते समय बीच-बीच में टोका-टोकी करना उसकी आदत थी.

एक दिन दो हंस (Swan) उस तालाब में उतरे. उन हंसों का नाम संकट और विकट था. उन्हें तालाब के आस-पास का वातावरण बहुत अच्छा लगा. उसके बाद से वे प्रतिदिन वहाँ आने लगे. कम्बुग्रीव कछुआ उन्हें प्रतिदिन देखता. एक दिन उसने उन दोनों हंसों से बात की. वे उसे दोनों भले और सज्जन लगे. शीघ्र ही उनमें गाढ़ी मित्रता हो गई.

हंस रोज़ तालाब में आते और कछुए से मिलते. फिर तीनों बहुत देर तक ना-ना प्रकार की बातें करते. हालांकि बातों के बीच कछुए की टोका-टाका ज़ारी रहती. किंतु सज्जन हंस इसका बुरा नहीं मानते.

एक बार उस क्ष्रेत्र में भयंकर अकाल पड़ा. नदी-तालाब सूखने लगे. वह तालाब भी सूखने लगा, जहाँ कछुआ रहता था. एक शाम जब हंस उससे मिलने आये, तो उसे बताया कि वे दोनों वह स्थान छोड़कर ५० कोस दूर स्थित एक अन्य झील पर जा रहे हैं, जो पानी से लबालब है.

यह सुनकर कछुवा दु:खी हो गया और आँखों में आंसू भरकर बोला, “मित्रों! कुछ ही दिनों में ये तालाब सूख जायेगा. मेरा मरण तो निश्चित है. किंतु इस बात से अधिक दु:ख मुझे इस बात का है कि अपनी अंतिम घड़ी में मैं अपने परम मित्रों को देख नहीं पाऊंगा.”

कछुए की इस बात पर दोनों हंस उदास हो गए. उन्हें कछुए से सहानुभूति थी. वे बोले, “मित्र कम्बुग्रीव! हम तुम्हें यहाँ अकेले छोड़कर नहीं जायेंगे. हम तुम्हें भी अपने साथ ले जायेंगे. हमारी मित्रता और साथ सदा बना रहेगा.”

“लेकिन ये कैसे संभव है मित्रों? तुम दोनों तो उड़कर चले जाओगे. मुझे तो धीरे-धीरे चलकर उस स्थान तक पहुँचने में महीनों लग जायेंगे. हो सकता है कि बीच रास्ते में ही मेरे प्राणपखेरू उड़ जायें. तुम दोनों चले जाओ. मैं तुम्हें याद करके अपने दिन व्यतीत कर लूंगा.”

हंसों ने कछुए की बात नहीं मानी और उसे अपने साथ ले जाने का उपाय सोचने लगे. सोचते-सोचते उन्हें एक उपाय सूझ ही गया और वे प्रसन्न हो गए. उन्होंने तय किया कि वे बांस की एक लकड़ी लेकर आयेंगे. कछुआ उस लकड़ी के मध्य भाग को अपने मुँह से पकड़ेगा और वे दोनों उस लकड़ी के एक-एक सिरे को अपनी चोंच में दबा लेंगे. इस तरह वे कछुए को लेकर उड़ते हुए उस झील तक पहुँच जायेंगे.”

कछुआ भी यह उपाय सुनकर प्रसन्न हुआ. अगले दिन हंस लकड़ी लेकर कछुवे के पास आये और उसे लकड़ी के मध्यभाग को मुँह से पकड़ने को कहा. हंस कछुए की बातूनी आदत से भली-भांति परिचित थे. इसलिए उन्होंने उसे समझाया कि जब तक वे झील तक नहीं पहुँच जाते, उसे मौन रहना है. अन्यथा वह नीचे गिर पड़ेगा. कछुए ने उन्हें आश्वासन दिया कि वह मौन धारण करके रखेगा.

इसके बाद दोनों कछुए ने दृढ़तापूर्वक लकड़ी के मध्यभाग को पकड़ लिया. हंस लकड़ी के दोनों सिरों को चोंच में दबाकर आकाश में उड़ने लगे. उड़ते-उड़ते वे एक कस्बे के ऊपर से गुज़रे. तभी किसी ने आकाश के उस विचित्र नज़ारे को देख लिया. वह दूसरे लोगों को बताने लगा, “देखो देखो आकाश में कछुआ उड़ रहा है.” एक मुँह से दूसरे मुँह होते हुए ये बात पूरे कस्बे में फ़ैल गई. लोग घरों के बाहर निकल आये और शोर मचाने लगे.

यह शोर सुन कछुए से न रहा गया और वह हंसों से बोला, “ये लोग हमें देख इतना शोर क्यों मचा रहे हैं?”

बोलते ही कछुए के मुँह से लकड़ी छूट गई और वह सीधे जमीन से आ टकराया. जमीन से टकराते ही उसके प्राणपखेरू उड़ गए.

सीख

१. बुद्धिमान व्यक्ति किसी कार्य के बारे में योजना बनाकर उस पर पूरा अमल करते हुए सफ़लता प्राप्त करते हैं. अन्यथा योजना पर टिके न रहने का दुष्परिणाम भोगना पड़ता है.

२. सामूहिक कार्य में समूह के सदस्यों की राय को महत्व देना आवश्यक है. उनकी राय न मानकर कार्य के नुकसान के साथ-साथ व्यक्तिगत नुकसान भी हो सकता है.

३. मौके की नज़ाकत को देखकर ही मुँह खोलना चाहिए.

Panchatantra Short Stories In Hindi 16# गौरैया और हाथी

Panchatantra Stories In Hindi : एक वन में बरगद के पेड़ की ऊँची डाल पर एक घोंसला था, जिसमें गौरैया (Sparrow) का जोड़ा रहता था. दोनों दिन भर भोजन की तलाश में बाहर रहते और शाम ढले घोंसले में आकर आराम करते थे. दोनों ख़ुशी-ख़ुशी अपना जीवन-यापन कर रहे थे.

मौसम आने पर गौरैया ने अंडे दिये. अब उसका पति भोजन की तलाश में जाता और वह घोंसले में रहकर अंडों को सेती और उनकी देखभाल करती थी. वे दोनों बेसब्री से अंडों में से अपने बच्चों के बाहर निकलने की प्रतीक्षा कर रहे थे.

एक दिन रोज़ की तरह गौरैया का पति भोजन की तलाश में गया हुआ था और गौरैया घोंसले में अंडों को से रही थी. तभी एक मदमस्त हाथी (Elephant) उस वन में आ गया और उत्पात मचाने लगा. वह अपने विशालकाय शरीर से टकराकर और सूंड से हिला-हिलाकर पेड़-पौधों को उखाड़ने लगा.

कुछ ही देर में सारा वन तहस-नहस हो गया. आगे बढ़ते-बढ़ते वह उस बरगद के पेड़ के पास पहुँचा, जहाँ गौरैया का घोंसला था. वह जोर-जोर से पेड़ को हिलाने लगा. लेकिन बरगद का पेड़ (Banyan Tree) मजबूत था. हाथी उसे गिरा नहीं पाया. लेकिन इन सबमें गौरैया का घोंसला टूटकर नीचे गिर पड़ा और उसके सारे अंडे फूट गए.

अपने बच्चों की मृत्यु पर गौरैया विलाप करने लगी. जब उसका पति वापस लौटा, तो गौरैया ने रोते-रोते उसे हाथी की करतूत के बारे में बताया. वह भी बहुत दु:खी हुआ.

दोनों प्रतिशोध की आग में जल रहे थे और हाथी को सबक सिखाना चाहते थे. लेकिन हाथी जैसे विशालकाय जीव के सामने उन जैसे निरीह प्राणियों का क्या बस चलता? उन्हें अपने मित्र कठफोड़वा की याद आई और वे उसकी सहायता लेने का पहुँच गए. कठफोड़वा के दो मित्र थे – मधुमक्खी और मेंढक. वे दोनों भी गौरैया के जोड़े की सहायता को तैयार हो गए.

सबने मिलकर योजना बनाई और हाथी को सबक सिखाने निकल पड़े. पूरे वन को तहस-नहस करने के बाद हाथी एक स्थान पर आराम कर रहा था. उसे देख योजना अनुसार मधुमक्खी ने उसके कानों में अपनी स्वलहरी छेड़ दी.

हाथी स्वरलहरी में डूबने लगा ही था कि कठफोड़वा ने उसकी दोनों आखें फोड़ दी. हाथी दर्द से चीख उठा. इधर हाथी के अंधे होते ही कुछ दूरी पर मेंढक टर्र-टर्र करने लगा. मेंढक के टर्राने की आवाज़ सुनकर हाथी ने सोचा कि अवश्य ही कुछ दूरी पर तालाब है. वह मेंढक की आवाज़ की दिशा में बढ़ने लगा.

योजना अनुसार मेंढक एक दलदल के किनारे बैठा टर्रा रहा था. हाथी तालाब समझकर दलदल में जा घुसा और फंस गया. दलदल से निकलने का भरसक प्रयास करने के बाद भी वह सफ़ल न हो सका और उसमें धंसता चला गया. कुछ ही देर में वह दलदल में समा गया और मर गया.

इस तरह जैसे गौरैया ने अपने मित्रों की सहायता से हाथी से अपने बच्चों की मौत का प्रतिशोध ले लिया.   

सीख  – एकजुटता में बड़ी शक्ति होती है. एकजुट होकर कार्य करने पर कमज़ोर से कमज़ोर व्यक्ति भी बड़े से बड़ा कार्य संपन्न कर सकता है.    

Panchatantra Stories In Hindi 17# दो सिर वाला पक्षी

Panchatantra Stories In Hindi : एक वन में भारंड नामक पक्षी रहता था. उसकी आकृति विचित्र थी. उसका शरीर तो एक था, किंतु सिर दो थे. उन दोनों सिरों की आपस में नहीं बनती थी. समय-समय पर उनमें टकराव होता रहता था.

एक दिन वन में भटकते हुए पक्षी के दांये मुख को एक रसीला फल प्राप्त हुआ. उसने लपककर फ़ल को पकड़ लिया और बड़े ही चाव से खाने लगा.

यह देख बाएं मुख की भी लार टपकने लगी. उसने दांये मुख से कहा, “तनिक मैं भी तो यह फ़ल चखकर देखूं.”

किंतु दांये मुख ने उसे झिड़क दिया, “इसकी क्या आवश्यकता है? मैं खाऊँ या तुम, जायेगा तो हमारे ही पेट में और पेट तो हमारा एक ही है. वह तो भर ही जायेगा.”

यह उत्तर सुन बायें मुख को क्रोध आ गया. वह दांये मुख से अपने अपमान और तिरस्कार का बदला लेने का अवसर खोजने लगा.

यह अवसर उसे प्राप्त हो गया, जब नदी किनारे पड़ा हुआ एक सुनहरा फ़ल उसे प्राप्त हुआ. वह यह फल दांये मुख को जलाते हुए अकेले ही खाना चाहता था. किंतु जैसे ही वह उसे खाने को हुआ, पास ही एक वृक्ष पर बैठा कौवा (Crow) बोल पड़ा, “बंधु उस फल को मत खाना. वह विषाक्त है. उसे खाते ही तुम मर जाओगे.”

यह बात सुन दांयें मुख ने बायें मुख को चेताया और रोकने का प्रयास किया. किंतु बायां मुख प्रतिशोध की ज्वाला में जल रहा था. उसने दांये मुख की एक ना सुनी और वह फल खा लिया. फल खाते ही पक्षी के प्राण पखेरू उड़ गए.

सीख – जो आपस में मिल-जुलकर काम नहीं करते, वे नष्ट हो जाते हैं.    

Panchatantra Stories In Hindi 18# सियार और ढोल

Panchatantra Stories In Hindi : एक समय की बात है. जंगल के किनारे दो राजाओं में मध्य घमासान युद्ध हुआ. इस युद्ध में एक राजा विजयी हुआ, एक पराजित. विजयी राजा के सिपाही और साथ गए भांड व चारण रात भर ढोल पीटकर उत्सव मनाते रहे और वीरगीत गाते रहे.

सुबह-सुबह तेज आंधी आयी और उस आंधी में सिपाहियों का एक ढोल लुड़ककर दूर चला गया और एक पेड़ से जाकर टिक गया.

आंधी थमने के उपरांत राजा और उसके सिपाही अपने राज्य की ओर प्रस्थान कर गये. ढोल वहीं जंगल में पड़ा रह गया.

ढोल जिस पेड़ से टिका पड़ा हुआ था, उसकी सूखी टहनियाँ तेज हवा चलने पर ढोल से टकराती और ढोल बज उठता. उसकी “ढमाढम” की आवाज पूरे जंगल में गूंज उठती.

एक भूखा सियार शिकार की तलाश में उस स्थान से गुजरा, जहाँ ढोल पड़ा हुआ था. ठीक उसी समय तेज हवा चली और पेड़ की सूखी टहनियाँ हिलते हुए ढोल से टकराई. ढोल “ढमाढम” करता बज उठा.

ढोल की आवाज़ सुनकर सियार डर गया. उसने पहले कभी इस तरह की आवाज़ नहीं सुनी थी. वह सोचने लगा कि ये कैसा विचित्र स्वर वाला जीव है.

वह वहाँ से भागने ही वाला था कि उसके दिमाग में एक विचार कौंधा, “ किसी बात की गहराई में जाए बिना डर कर भागना उचित नहीं. मुझे इस विचित्र जीव के निकट जाकर पता करना चाहये कि वास्तव में ये कितना बलशाली है.

वह धीरे-धीरे ढोल के निकट पहुँचा. वहाँ उसने देखा कि पेड़ की टहनियाँ ढोल पर चोट कर रही हैं और उसमें से आवाज़ आ रही है. सियार ने अपनी बुद्धि दौड़ाई और इस नतीज़े पर पहुँचा कि ये तो एक निरीह प्राणी है. पेड़ की शाखाओं की मार से कराह रहा है. वह स्वयं भी ढोल पर चोट करने लगा और ढोल बज उठा.

ढोल का स्पर्श करने के उपरांत सियार ने सोचा कि इन जीव का शरीर विशाल और मांसल है. अवश्य इसमें खूब चर्बी, मांस और रक्त होगा. इसे खाकर तो मैं कई दिनों तक अपनी भूख मिटा सकता हूँ.

उसने ढोल के मोटे चमड़े के बाहरी आवरण पर अपने दांत गड़ा दिए. वह चमड़ा कठोर था. उसे काटने के प्रयास में सियार के सामने के दो दांत टूट गए.

लेकिन अपनी ज़ोरों की भूख शांत करने के लिए वह डटा रहा और किसी प्रकार ढोल में छेदकर उसमें घुस गया. ढोल अंदर से खाली था. उसमें मांस-रक्त-मज्जा ना पाकर सियार बड़ा निराश हुआ. उसकी मेहनत व्यर्थ गई.

सीखजैसे ढोल बाहर से विशाल और अंदर से खोखला था. वैसे ही अपने मुँह से स्वयं की बढ़-चढ़कर बड़ाई करने और शेखी बघारने वाले वास्तव में ढोल की तरह की खोखले होते हैं. इसलिए किसी के बाहरी आवरण और दिखावे से उसके प्रभाव में नहीं आना चाहिए. वास्तविकता  का ज्ञान किसी चीज़ को भली-भांति जानने के बाद ही होता है. 

Panchatantra Kahaniyan 19# मूर्ख मित्र

Panchatantra Stories In Hindi : बहुत समय पहले की बात है. एक राज्य में एक राजा का राज था. एक दिन उसके दरबार में एक मदारी एक बंदर लेकर आया. उसने राजा और सभी दरबारियों को बंदर का करतब दिखाकर प्रसन्न कर दिया. बंदर मदारी का हर हुक्म मनाता था. जैसा मदारी बोलता, बंदर वैसा ही करता था.

वह आज्ञाकारी बंदर राजा को भा गया. उसने अच्छी कीमत देकर मदारी से वह बंदर ख़रीद लिया. कुछ दिन राजा के साथ रहने के बाद बंदर उससे अच्छी तरह हिल-मिल गया. वह राजा की हर बात मानता. वह राजा के कक्ष में ही रहता और उसकी सेवा करता था. राजा भी बंदर की स्वामिभक्ति देख बड़ा ख़ुश था.

वह अपनी सैनिकों और संतरियों से भी अधिक बंदर पर विश्वास करने लगा और उसे महत्व देने लगा. सैनिकों को यह बात बुरी लगती थी, किंतु वे राजा के समक्ष कुछ कह नहीं पाते थे.

एक दोपहर की बात है. राजा अपने शयनकक्ष में आराम कर रहा था. बंदर पास ही खड़ा पंखा झल रहा था. कुछ देर में राजा गहरी नींद में सो गया. बंदर वहीं खड़े-खड़े पंखा झलता रहा.

तभी कहीं से एक मक्खी आई और राजा की छाती पर बैठ गई. बंदर की दृष्टि जब मक्खी पर पड़ी, तो उसने पंखा हिलाकर उसे हटाने का प्रयास किया. मक्खी उड़ गई. किंतु कुछ देर पश्चात पुनः वापस आकर राजा की छाती पर बैठ गई.

पुनः मक्खी को आया देख बंदर अत्यंत क्रोधित हो गया. उसने आव देखा न ताव और पास ही पड़ी राजा की तलवार उठाकर पूरी शक्ति से मक्खी पर प्रहार कर दिया. मक्खी तो उड़ गई. किंतु तलवार के जोरदार प्रहार से राजा की छाती दो टुकड़े हो गई और राजा के प्राण-पखेरू उड़ गए.

सीख – मूर्ख मित्र से अधिक बुद्धिमान शत्रु को तरजीह दी जानी चाहिए.

Hindi Panchatantra Stories 20# ब्राह्मणी और नेवला

Panchatantra Stories In Hindi : एक गाँव में देवशर्मा नामक ब्राह्मण अपनी पत्नि एक साथ रहता था. उसके घर के आंगन में एक नेवली भी रहा करती थी. देवशर्मा की पत्नि गर्भवती थी. जिस दिन उसने पुत्र को जन्म दिया, उस दिन नेवली ने भी एक नेवले को जन्म दिया. नेबले को जन्म देने के उपरांत नेवली चल बसी.

ब्राह्मण की पत्नि स्वभाव से दयालु थी. नवजात नेवले के प्रति उसके ह्रदय में प्रेमभाव उमड़ पड़ा और वह अपने पुत्र के समान ही उसका भी पालन-पोषण करने लगी. नेवला भी ब्राह्मण के परिवार से अच्छी-तरह घुल-मिल गया. वह सदा उनके पुत्र के साथ खेला करता. दोनों में अच्छी मित्रता हो गई थी.

ब्राह्मण और उसकी पत्नि को नेवले और अपने पुत्र की मित्रता में कोई आपत्ति नहीं थी. दोनों का प्रेम देख वे प्रसन्न थे. किंतु ब्राह्मणी का हृदय यदा-कदा चिंतित हो उठता और वह सोच बैठती कि पशु बुद्धि के कारण कभी नेवले ने उसके पुत्र का कुछ अनिष्ट कर दिया तो? यह शंका धीरे-धीरे उसके मन में घर करते गई. उधर ब्राहमण का विश्वास था कि पशुओं में भी प्रेमभाव की समझ होती है और नेवला अभी उसके पुत्र को अनिष्ट नहीं पहुँचाएगा.

एक दिन ब्राह्मणी अपने पुत्र को एक वृक्ष की छांव में सुलाकर नदी में पानी भरने चली गई. उस समय नेवला भी वहाँ खेल रहा था. जाने के पूर्व वह ब्राह्मण से पुत्र का ध्यान रखने को कह गई. उसे भय था कि कहीं नेवला उसे काट न लें?

ब्राह्मणी के जाने के बाद ब्राहमण ने सोचा कि नेवला और उसके पुत्र में गहरी मित्रता है. वह उसे क्यों कटेगा? और वह भिक्षाटन करने गाँव प्रस्थान कर गया.

ब्राहमण वहाँ से गया ही था कि वृक्ष के नीचे बने बिल से एक काला नाग निकल आया और ब्राहमण के पुत्र की ओर बढ़ने लगे. पास ही खेल रहे नेवले की दृष्टि जब काले नाग पर पड़ी, तो वह उस पर टूट पड़ा और मार डाला.

काले नाग को मारने के उपरांत वह घर से बाहर निकला, तो पानी भरकर वापस आती ब्राह्मणी की दृष्टि उस पर पड़ी. नेवले के मुँह में खून लगा हुआ था, जिसे देख ब्राह्मणी घबरा गई. उसने सोचा कि नेवला उसके पुत्र का वध करके आ रहा है. क्रोधवश अपने सिर पर उठाये घड़े को उसने नेवले पर पटक दिया और नेवले के प्राणपखेरू उड़ गए.

भागती हुई ब्राह्मणी जब अपने पुत्र के पास पहुँची, तो उसे वृक्ष की छांव में शांति से सोते हुए पाया. पास ही काले नाग का क्षत-विक्षत शरीर पड़ा हुआ था. उसे समझते देर न लगी कि उसके पुत्र की रक्षा के लिए नेवले ने काले नाग को मारा है. वह दुःख और पछतावे में अपना सिर पीटने लगी.  

तभी ब्राह्मण भिक्षाटन वापस लौटा. ब्राह्मणी ने उसे नेवले की बारे में पूरी बात बताकर कोसने लगी कि यदि मेरी बात मानकर तुम पुत्र के साथ रहते और लोभवश भिक्षाटन को नहीं जाते, तो नेवले की जान नहीं जाती. नेवले के प्राण तुम्हारे लोभवश गए हैं.

सीख – बिना विचारे जो करे, सो पाछे पछिताये.

Panchatantra Stories In Hindi 21# चुहिया का स्वयंवर 

Panchatantra Stories In Hindi : गंगा नदी किनारे स्थित कुटिया में याज्ञवल्क्य नाम मुनि अपनी पत्नि के साथ रहा करते थे. उनकी कोई संतान नहीं थी. दोनों को संतान की कामना थी. अतः वे इस हेतु सदा ईश्वर से प्रार्थना किया करते थे.

एक दिन मुनि नदी किनारे अपने दोनों हाथ फैलाये ईश्वर से संतान प्राप्ति हेतु प्रार्थना कर रहे थे. तभी आकाश में उड़ता हुआ एक कौवा उनके ऊपर से गुजरा. कौवे ने अपनी चोंच में एक नन्हीं चुहिया को दबाया हुआ था.

मुनि के ऊपर से गुजरते समय कौवे की चोंच से छिटककर चुहिया उनकी हथेली में जा गिरी, जिसे देख मुनि ने सोचा कि अवश्य ही ईश्वर ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली है और ये चुहिया संतान स्वरुप प्रदान की है.

चुहिया को एक सुंदर कन्या का रूप दे वे अपने घर ले गए और अपनी पत्नि को सौंपते हुए बोले, “ईश्वर ने यह कन्या हमें प्रदान की है. अब से ये हमारी पुत्री है और इसके पालन-पोषण का संपूर्ण दायित्व हमारा है.”

मुनि पत्नि ने भी उस कन्या को अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार कर लिया. तबसे वह कन्या मुनि की कुटिया में पलने लगी.

समय व्यतीत हुआ और वह कन्या बड़ी हो गई. मुनि की पत्नि को उसके विवाह की चिंता सताने लगी. एक दिन उसने मुनि से अपनी पुत्री के लिए एक सुयोग्य वर ढूंढने को कहा.

कुछ देर विचार उपरांत मुनि इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि कि सूर्यदेव ही उनकी पुत्री के लिए श्रेष्ठ वर हैं. उन्होंने सूर्यदेव की आराधना प्रारंभ की. जब सूर्यदेव के दर्शन दिए, तो साधु ने अपनी पुत्री से पूछा, “क्या तुम्हें सूर्यदेव अपने पति के रूप में स्वीकार है?”

पुत्री ने उत्तर दिया, “क्षमा करें पिताश्री. सूर्यदेव में इतना ताप है कि इनके समक्ष मैं क्षण भर में राख में परिवर्तित हो जाऊंगी. मैं इनसे कैसे विवाह कर सकती हूँ? कृपा कर आप मेरे लिए कोई दूसरा वर ढूंढिए.”

पुत्री के उत्तर सुन मुनि ने सूर्यदेव से पूछा, “सूर्यदेव, अब आप ही बतायें कि मेरी पुत्री के लिए आपसे श्रेष्ठ वर कौन होगा.?”

सूर्यदेव ने उत्तर दिया, “मेरे अनुसार मेघ तुम्हारी पुत्री के योग्य है क्योंकि उसमें मुझे ढक देने का सामर्थ्य है.”

मुनि ने मेघ प्रार्थना प्रारंभ की और उनके दर्शन देने पर अपनी पुत्री से पूछा, “क्या तुझे मेघ अपने पति के रूप में स्वीकार हैं?”

पुत्री ने यह प्रस्ताव भी अस्वीकार कर दिया और बोले, “पिताश्री! मैं इतने काले व्यक्ति से विवाह नहीं करना चाहती. साथ ही इनकी गड़गड़ाहट से भी मुझे डर लगता है.”

मुनि ने मेघ से परामर्श लिया, तो मेघ बोले, “मेरे विचार में वायुदेव तुम्हारी पुत्री के योग्य है क्योंकि उनमें मेघ को उड़ा देने की शक्ति है.”

मुनि ने वायुदेव को आराधना कर प्रसन्न किया और उनके दर्शन देने पर अपनी पुत्री से पूछा, “क्या तुझे वायुदेव स्वीकार हैं?”

मुनि पुत्री बोली, “वायुदेव तो बड़े चंचल हैं. कभी एक स्थान पर स्थिर नहीं रहते. मैं उनसे विवाह नहीं कर सकती.”

मुनि ने वायुदेव से उनसे अच्छे वह के बारे में पूछा, तो वे बोले, “मुझसे अच्छा पर्वत है, जो मजबूती से एक स्थान पर डटा रहता है और तेज हवा, आंधी और तूफ़ान से भी नहीं डिगता.”

मुनि पुत्री सहित पर्वत के पास गया और पुत्री का विचार पूछा, तो वह बोली, “ये बड़े कठोर ह्रदय के हैं. मैं इनसे विवाह नहीं कर पाऊंगी.”

तब पर्वत ने मुनि को सुझाया कि मुझसे योग्य चूहा है. वह कोमल तो है. पर साथ ही पर्वत में भी सुराख़ कर देने की शक्ति रखता है.”

मुनि मूषकराज को बुलाया और अपनी पुत्री से पूछा कि क्या उसे मूषकराज से विवाह स्वीकार है. मूषकराज को देख मुनि की पुत्री को एक अपनत्व भाव का अनुभव हुआ और वह उस पर मुग्ध हो गई. उसने उसने मूषकराज से विवाह करना स्वीकार कर लिया.

तब मुनि अपनी पुत्री से बोला, “यह भाग्य ही है. तुम इस दुनिया में चुहिया के रूप में आई और अब भाग्य से तुम एक चूहे से ही विवाह कर रही हो. मैं तुम्हें तुम्हारा मूल रूप वापस प्रदान करता हूँ.”

मुनि ने अपनी पुत्री को चुहिया में परिवर्तित कर दिया और उसका विवाह मूषकराज से करवा दिया.

सीख – बाह्य स्वरुप परिवर्तित हो जाने से आंतिरक स्वरूप परिवर्तित नहीं होता.


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