माला दो : अकबर बीरबल का मज़ेदार किस्सा | Mala Do Akbar Birbal Ka Majedar Kissa

फ्रेंड्स, इस पोस्ट में हम अकबर बीरबल का मज़ेदार किस्सा “माला दो” (Mala Do Akbar Birbal Ka Majedar Kissa) शेयर कर रहे हैं. इस कहानी में अकबर बीरबल से मसखरी करते हुए उसका मज़ाक उड़ाने की कोशिश करते हैं. बीरबल उसका कैसा मज़ेदार जवाब देता है, जानने के लिए पढ़िये ये किस्सा : 

Mala Do Akbar Birbal Ka Majedar Kissa

Mala Do Akbar Birbal Ka Majedar Kissa
Mala Do Akbar Birbal Ka Majedar Kissa

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बादशाह अकबर और बीरबल सुबह-सुबह यमुना नदी में नौका विहार कर रहे थे. इधर-उधर की बातों के साथ-साथ उनमें हँसी-ठिठोली भी हो रही थी. हँसी-ठिठोली करते हुए अचानक बादशाह अकबर ने गले में पहनी  अपनी माला उतार कर यमुना में डाल दी और बीरबल से बोले, “बीरबल माला दो.”

बीरबल वाकपटु भी था और बुद्धिमान भी. वह तुरंत अकबर की कही बात का अर्थ समझ गया. परन्तु, अपने मन के भाव छुपाकर बोला, “बहने दो.”

यह सुनकर अकबर नाराज़ हो गए और बोले, “तुम मेरी बहनों को मांगते हो?

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बीरबल ने विनय पूर्वक कहा, “जहाँपनाह! आपने भी तो मेरी माँ को माँगा था. तब तो मैं नहीं चिढ़ा. फिर आप इतने खफ़ा क्यों हो रहे हैं?”

बादशाह झट से अपनी कही हुई बात का दूसरा मतलब बताते हुए बोले, “मैंने तो यमुना में गिर गई अपनी माला तुमसे मांगी थी. तुम्हारी माँ को कुछ नहीं कहा था.”

बीरबल भी तपाक से बोल, “मैंने भी तो कहा था कि बहने दीजिये. फिर आपने कैसे समझ लिया कि मैं आपकी बहनों को मांग रहा हूँ.”

अकबर को कोई जवाब सूझा.


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