लालची नागदेव और मेंढकों का राजा : पंचतंत्र की कहानी ~ लब्धप्रणाश | The Greedy Cobra And The King Of Frogs Panchatantra

फ्रेंड्स, इस पोस्ट में हम पंचतंत्र की कहानी ‘लालची नागदेव और मेंढकों का राजा’ (The Greedy Cobra And The King Of Frogs Panchatantra Story In Hindi) शेयर कर रहे हैं. यह कहानी पंचतंत्र के तंत्र (भाग) लब्धप्रणाश से ली गई है, जो प्रतिशोध की भावना पर रची गई है. मेंढकों का राजा प्रतिशोध भावना से ग्रसित होकर लालची नागदेव से संधि कर लेता है. इसका उसे क्या परिणाम भोगना पड़ता है? जानने के लिए पढ़िए पूरी कहानी :

The Greedy Cobra And The King Of Frogs Panchatantra

The Greedy Cobra And The King Of Frogs Panchatantra
The Greedy Cobra And The King Of Frogs Panchatantra

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एक कुएं में मेंढकों का समूह रहता था. गंगदत्त नामक मेंढक उनका सरदार था. गंगदत्त क्रोधी और झगड़ालु स्वभाव का था. वह किसी न किसी बात पर आवेश में आ जाता और दूसरों से झगड़ा करने लगता था. वह सब पर धौंस जमाता और बस अपनी ही मनमानी किया करता था. उसके कुएं के मेंढक उससे बहुत परेशान थे. परन्तु, वह उनका सरदार था, इसलिए उसकी मनमानी सहा करते थे.

उस कुएं के आसपास कुछ अन्य कुएं भी थे. वहाँ भी मेंढकों का निवास था. हर मेंढक समूह का एक सरदार भी था. गंगदत्त अन्य कुओं के मेंढकों पर भी धौंस जमाने और उन्हें परेशान करने का प्रयास करता था. विरोध किये जाने पर उनसे झगड़ता था. इस तरह गंगदत्त के प्रति सबमें रोष था. वह न ख़ुद चैन से रहता था, न दूसरों को चैन से रहने देता था. 

एक दिन गंगदत्त का पड़ोसी कुएं के मेंढक सरदार से किसी बात पर झगड़ा हो गया. गंगदत्त अपमान की आग में जल उठा. अपमान का बदला लेने के उद्देश्य से उसने अपने कुएं के मेंढकों को बुलाया और उनसे बोला, “साथियों! पड़ोसी कुएं के सरदार ने आज मेरा घोर अपमान किया है. हमें उसे सबक सिखाना होगा, ताकि भविष्य में वह ऐसा साहस न कर सके,”

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मेंढक जानते थे कि झगड़ा गंगदत्त ने ही शुरू किया होगा. वे उसके कारण व्यर्थ में अन्य मेंढकों से उलझना नहीं चाहते थे. इसलिए एक स्वर में बोले, “सरदार! पड़ोसी कुएं के मेंढकों का संख्या बल हमसे अधिक है. ऊपर से, वे हमसे कहीं अधिक हृष्ट-पुष्ट हैं. हम उनसे लड़ेंगे, तो मारे जायेंगे. इसलिए हमारा उनसे न उलझना ही उचित है.”

अपने अनुचर मेंढकों का उत्तर सुन गंगदत्त चकित रह है. उसे आशा नहीं थी कि उसने अपने ही अनुचर उसकी आज्ञा का पालन करने से इंकार कर देंगे. वह कुढ़ गया. उस समय तो वह शांत रहा. किंतु, मन ही मन उसने उनसे बदला लेने की ठान ली.

फिर उसने अपने पुत्रों को बुलाया और बोला, “पुत्रों, आज पड़ोसी कुएं के मेंढक सरदार ने तुम्हारे पिता का घोर अपमान किया है. जाओ उनसे बदला लेकर आओ और सिद्ध कर दो कि हम किसी से कम नहीं है.”

गंगदत्त के पुत्र भी अपने पिता के स्वभाव से परिचित थे. इसलिए, उसकी बात टालते हुए वे बोले, “पिताश्री! हम तो कभी इस कुएं से बाहर नहीं निकले हैं. हममें इतना सामर्थ्य नहीं कि हम उनका सामना कर सकें. इसलिए हमें क्षमा करें. हम आपकी आज्ञा का पालन नहीं कर सकते.”

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यह सुनकर गंगदत्त अपने पुत्रों से भी चिढ़ गया. वह कुएं से बाहर आया और इधर-उधर घूमने लगा. घूमते-घूमते उसकी दृष्टि एक नाग पर पड़ी, जो कुएं के पास ही एक वृक्ष के नीचे बिल बनाकर रहता था. उसने सोचा कि अपनों ने तो मेरी कोई सहायता नहीं की. क्यों न मेंढकों से प्रतिशोध लेने के लिए शत्रु नाग से संधि कर ली जाये?

वह नाग के पास गया और बोला, “हे नाग! मेरा प्रणाम स्वीकार करो.”

मेंढक को अपने पास देख नाग फुफकारा, “अरे मेंढक, हम तो जन्म-जन्मान्तर के शत्रु हैं. तू मेरे पास क्यों आया है?”

गंगदत्त बोला, “हे नाग! मेरी अपनी ही जाति के लोग पराये हो गए हैं. उन्होंने मेरा इतना अपमान किया है कि उन्हें सबक सिखाने के लिए मुझे तुम्हारी सहायता की आवश्यकता है. मुझसे संधि कर लो. इसमें तुम्हारा भी लाभ है और मेरा भी.”

नाग ने पूछा, “कैसे?”

गंगदत्त उसे सारी बात बताते हुए बोला, “हे नाग, मेरे शत्रु मेंढकों को मैं तुम्हारा आहार बनाऊंगा. तुम मज़े से उन्हें खाना. मेरा प्रतिशोध पूरा हो जायेगा. हुआ न हम दोनों का लाभ.”

नाग बोला, “किंतु, मैं पानी में जाने में असमर्थ हूँ. मैं उन मेंढकों को कैसे पकडूंगा?”

गंगदत्त बोला, “हे नाग! इसमें मैं तुम्हारी सहायता करूंगा. मेरे द्वारा अपने कुओं से अन्य कुओं तक सुरंग खुदवाई गई है, ताकि मैं दूसरे मेंढकों पर नज़र रख सकूं. मैं तुम्हें उन सुरंगों का मार्ग बता दूंगा, तुम आराम से वहाँ जाना और उन मेंढकों को खा जाना.”

नाग ने अपना लाभ देख गंगदत्त से मित्रता कर ली. प्रतिशोध की आग में जलते गंगदत्त ने अपनी ही जाति से छल करते हुए नाग को उन तक पहुँचने का मार्ग बता दिया.

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नाग सुरंग मार्ग से पड़ोसी कुएं में जाने लगा और उन्हें अपना आहार बनाने लगा. कुछ ही दिनों में उस कुएं के सारे मेंढक समाप्त हो गए. तब वह गंगदत्त के पास आया और बोला, “उस कुएं में अब एक भी मेंढक नहीं बचा है. अब बता कि मैं किसे खाऊं?”

गंगदत्त ने अन्य समस्त कुओं के मार्ग बता दिया. कुछ दिनों में नाग ने वहाँ के भी सारे मेंढकों को अपना आहार बना लिया.

वह फिर गंगदत्त के पास आया और बोला, “अब बता मैं किसे खाऊं?

गंगदत्त ने उत्तर दिया, “हे नाग! अब तो बस मेरे साथी और मेरा परिवार शेष है.”

नाग फुफकारा, “उससे मुझे कोई मतलब नहीं. अगर तूने जल्दी नहीं बताया, तो मैं तुझे खा लूंगा.”

गंगदत्त डर गया. उसने सोचा कि मेरे जिन साथियों ने मेरा तिरस्कार किया था, उनका ही पता मैं इसे बता देता हूँ. मेरे प्राण तो बचेंगे. उसने नाग को अपने साथियों को खाने भेज दिया.

कुछ ही दिनों में उन्हें चट कर नाग फन फैलाकर फिर गंगदत्त के पास आ गया, “वो सारे मेंढक मैंने खा लिए. अब बता कि मैं किसे खाऊं? अगर तूने नहीं बताया, तो फिर तेरी खैर नहीं.”

गंगदत्त की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई. उसने सोचा कि उसके पुत्रों ने भी उनकी अवज्ञा की थी. उन्हें ही नाग का आहार बना देता हूँ. मैं और मेंढकी जीवित रहे, तो और संतान उत्पन्न कर लेंगे. उसने नाग को अपने पुत्रों को खाने के लिए भेज दिया.

नाग उन्हें सफाचट कर फिर गंगदत्त के पास लौट आया और फुफकारने लगा. गंगदत्त क्या करता? उसने सोचा कि मेंढकी ही बची है. वैसे भी अब वह वृद्ध हो चुकी है. मैं किसी अन्य मेंढकी से विवाह कर संतान उत्पन्न कर लूंगा. यह विचार मन में आते ही उसने नाग को मेंढकी को खाने भेज दिया.

नाग मेंढकी को खाकर तुरंत वापस आ गया और गंगदत्त के सामने फन फैला लिया.

अब तो मात्र गंगदत्त शेष था. वह गिड़गिड़ाने लगा, “अब तो बस मैं ही बचा हूँ. मैं तुम्हारा मित्र हूँ. आशा है तुम मुझे बख्श दोगे.”

“कहाँ का मित्र और कैसे मित्रता? हम तो सदा के बैरी हैं.” कहकर नाग ने गंगदत्त को खा लिया.

सीख (Moral Of The Story)

जो प्रतिशोध की ज्वाला में अपनों के विरुद्ध शत्रु का साथ देता है, उसका अंत निश्चित है.


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